पीर की दरगाह के चलते नाम पड़ा पीरकामडिय़ा- आओ गांव चलें
हनुमानगढ़ जिले की टिब्बी तहसील मुख्यालय से करीब दस किलोमीटर दूर हनुमानगढ-बणी सड़क मार्ग पर स्थित गांव पीरकामडिय़ा अपनी ऐतिहासिकता व साम्प्रदायिक सौहार्द के लिए जाना जाता है। घग्घर नदी तथा एनजीसी नहर के बीच उपजाऊ भूमि पर १२६५ हैक्टेयर क्षेत्र पर बसे पीरकामडिय़ा गांव में छह राजस्व गांव शामिल है। बताया जाता है कि करीब चार सौ साल पहले इस गांव को सबसे पहले मुसलमानों ने बसाया था। उसके बाद चाहर जाटों ने यहां की साढे १२ हजार बीघा जमीन ४२ सौ रूपए में खरीदी तथा यहां चाहर, बैनीवाल, सहारण, सियाग, खीचड़, गोदारा, डूडी के साथ मेघवाल, वाल्मीकी, नायक, जटसिख व अन्य जाति व धर्म के लोग आकर बसने लगे। फिलहाल इस गांव में सभी जाति व धर्म के लोग निवास करते है जिसके चलते इस गांव में सर्व धर्म समभाव के दर्शन होते है।
गांव के बुजुर्ग श्री राम चाहर, जयनारायण बैनीवाल, जगदीश प्रसाद शर्मा आदि के अनुसार ऐतिहासिकता को समेटे इस गांव में वर्तमान में एक हजार से अधिक घर है, गांव की आबादी सात हजार है तथा यहां ४३०० मतदाता है। गांव में धार्मिक स्थल के तौर पर सबसे पुरानी पीर की दरगाह के अलावा ठाकुर जी का मंदिर, हनुमान जी का मंदिर, बाबा रामदेव मंदिर, गोगामेड़ी, शिवमंदिर, महर्षि वाल्मीकी मंदिर, दो गुरूद्वारा व मस्जिद मौजूद है। जिनमें आए दिन धार्मिक कार्यक्रम चलते रहते है। गांव में ही बाबा भोला गिरी महाराज की कुटिया भी है जो सभी लोगों के लिए श्रद्धा का स्थल है।
वर्तमान में यहां कलावती देवी चाहर सरपंच है। गांव में बच्चों की शिक्षा के लिए उच्च माध्यमिक स्कूल के अलावा दो प्राथमिक व एक बालिका उच्च प्राथमिक स्कूल है। इसके अलावा गांव में पशु चिकित्सा केन्द्र, आयुर्वेदिक औषधालय, उपस्वास्थ्य केन्द्र, पटवार घर, ग्राम सेवा सहकारी समिति, ग्राम पंचायत, सैंट्रल बैक ऑफ इण्डिया की शाखा आदि सरकारी कार्यालय संचालित है। गांव में प्राचीन कुएं के साथ चार जोहड़ भी है जिनमें बरसाती व गंदे पानी की निकासी होती है। गांव की श्री शिव गौशाला में ग्रामीणों के सहयोग से करीब सात सौ गोवंश की सेवा की जा रही है।
पीर की मढिया से बना पीरकामडिय़ा
पीरकामडिय़ा गांव का नाम यहां बनी पीर की दरगाह पर रखा गया है। शुरू में पीर की दरगाह के कारण इसे पीर की मढिया कहा जाता था जिसका धीरे धीरे परिवर्तित होकर नाम पीरकामडिय़ा बन गया। ग्रामीणों के अनुसार गांव में पीर की दरगाह में करीब एक दर्जन कब्रे बनी है। इसके अलावा दरगाह से कुछ दूरी पर प्राचीन कब्र भींत व एक कुंआ भी बना हुआ है। ग्रामीणों की मान्यता है कि पीर बाबा के आशीर्वाद के चलते घग्घर नदी के उफान पर होने के बावजूद इस गांव में कभी बाढ का पानी प्रवेश नही कर पाया। ग्रामीणों के अनुसार १२६६ ईस्वी में दिल्ली पर गुलाम वंश के शासक बलवन के शासनकाल के दौरान उसके पुत्र गुगरा खां ने विद्रोह कर दिया था। विद्रोह के बाद गुगरा खां का भाई मोहम्मद शाह व कई सूफी संतो ने भटनेर दुर्ग में शरण ली थी। बाद में विद्रोहियों व मोहम्मदशाह की पीरकामडिय़ा के पास हुए संघर्ष में मोहम्मद शाह व सूफी संत शहीद हो गए। जिसके बाद बलवन ने सूफी संतों की कब्रे पीरकामडिय़ा में बनवाई थी जो आज दरगाह के रूप में यहां मौजूद है। यही दरगाह गांव के सभी धर्मो के लोगों के लिए आस्था का प्रतीक है। इस दरगाह पर प्रत्येक अमावस्या को मेला भरता है तथा प्रत्येक गुरूवार को भी श्रद्धालुओं की भारी भीड़ रहती है।
सम्पन्न गांवों में शुमार
गांव पीरकामडिय़ा तहसील के सम्पन्न गांवों की श्रेणी में शामिल है। घग्घर नदी तथा एनजीसी नहर के बीच उपजाऊ भूमि पर बसे इस गांव के खेतों से भरपूर अनाज उत्पन्न होता है। घग्घर किनारे बसे होने के कारण नलकूपों से पर्याप्त मीठा सिंचाई पानी मिल जाने की वजह से खेतों में सिचाई पानी की समस्या भी नही है जिसके कारण पीरकामडिय़ा क्षेत्र अनाज का भण्ड़ार कहलाता है। यहां पर सर्वाधित धान उपजाने के साथ गेहूं, सरसों व नरमा-कपास की फसल उपजाई जाती है। पूर्व सरपंच रविन्द्र शर्मा के अनुसार पीरकामडिय़ा क्षेत्र को राइस बैल्ट घोषित करने की जरूरत है इससे यहां के धान उत्पादक किसानों को ओर ज्यादा सुविधाएं मिल पाएगी।
शिक्षा व खेल में अग्रणी
पीरकामडिय़ा गांव के ग्रामीण शिक्षा व खेल क्षेत्र में अग्रणी है। यहां पर ९० प्रतिशत साक्षरता है। जिसमें पुरूष ९५ व महिला ८५ प्रतिशत साक्षर है। इस गांव में १९४८ में ही प्राथमिक स्कूल की स्थापना हो गई थी तथा १९५५ में लाइब्रेरी बन गई थी। वर्तमान में स्थित उच्च माध्यमिक विद्यालय के भवन निर्माण व अन्य सुविधाओं को जुटाने के लिए ग्रामीण हरसमय तत्पर रहते है। यहां के खिलाड़ी टेबल टेनिस व सॉफ्टबॉल में अपनी प्रतिभा स्टेट, नेशनल व इंटरनेशनल स्तर पर प्रदर्शित कर चुके है। यहां के स्व. चरणजीत सिंह ने सॉफ्टबॉल में भारतीय टीम का प्रतिनिधित्व किया था। तथा गांव के संजीव बैनीवाल की बेटी आरजेएस बनी।
ये है समस्याएं
गांव में नशावृत्ति की समस्या सबसे बड़ी है। गांव का युवा वर्ग नशे की चपेट में आ रहा है जिसे रोकने के लिए प्रयासों की आवश्यकता है इसके अलावा गांव को हनुमानगढ व चंदूरवाली कैंचिया से जोडऩे वाली सम्पर्क सड़क के पूरी तरह क्षतिग्रस्त होने के कारण परेशानी हो रही है।
यह है उपलब्धियां
पीरकामडिय़ा के सरपंच प्रतिनिधि रोहिताश चाहर के अनुसार ग्राम पंचायत की बरसाती पानी निकासी की योजना को सर्वत्र सराहना मिली है। गांव तथा आसपास की ढाणियों में पेयजल उपलब्ध कराया गया है। गांव के स्कूल में ग्राम शिक्षा समिति ने ग्रामीणों के सहयोग से भवन निर्माण करवाया गया है। इसके साथ ही जिला प्रमुख, विधायक व प्रधान कोटे से बजट प्राप्त कर गांव में अनेक विकास कार्य करवाए गए है
हनुमानगढ़ जिले के अश्व गांव के नाम से है देश-विदेश में प्रसिद्ध
पीरकामडिय़ा. गांव जहां ऐतिहासिक व धार्मिक सौहार्द के लिए जाना जाता है वहीं यह गांव हनुमानगढ जिले का एकमात्र अश्व गांव भी है। हनुमानगढ जिले में सबसे ज्यादा अश्वो का पालन व्यावसायिक तौर पर इसी गांव में होता है। पीरकामडिय़ा गांव के मारवाड़ी नस्ल के अश्वो की राजस्थान के अलावा पंजाब, महाराष्ट्र व हरियाणा के साथ विदेशों में भी खरीद फरोख्त होती है। पहले गांव में अश्व मेला आयोजित होता था जिसे अब बड़ा आकार प्रदान करते हुए हनुमानगढ में आयोजित किया जा रहा है। इस गांव के अश्वो के पालन के लिए बने स्टड फार्म देखने के लिए विदेशी भी यहां का दौरा कर चुके है। गांव को अश्व गांव के रूप में स्थापित करने का श्रेय यहां के अश्वपालक संजीव बैनीवाल, कृष्ण चाहर, सत्यदेव सुथार आदि को जाता है। इस गांव का एक अश्व राष्ट्रपति भवन की भी शोभा बढा चुका है।