
नई दिल्ली। कवि मिर्जा गालिब का जन्म 27 दिसंबर 1797 को उत्तर प्रदेश के आगरा में हुआ। शायरी का शौक रखने वाला हर इंसान मिर्जा ग़ालिब के नाम से अच्छी तरह वाकिफ होगा। मिर्ज़ा ग़ालिब को शायरी शब्द का पर्यायवाची भी कह सकते हैं। उनकी लिखी शायरियां बच्चे-बच्चे की जुबान पर रहती है। मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरियां ना केवल भारत और पाकिस्तान बल्कि विश्व के कई देशों में मशहूर हैं। ग़ालिब ने अपने 70 साल के जीवन में कई शायरियां लिखीं। जिन कवियों के कारण उर्दू अमर हुई, उसमें मीर के साथ-साथ मिर्ज़ा ग़ालिब का सबसे अधिक योगदान था।
मिर्ज़ा ग़ालिब की कुछ मशहूर शायरियां
1-सारी उम्र
तोड़ा कुछ इस अदा से तालुक़ उस ने 'ग़ालिब'
के सारी उम्र अपना क़सूर ढूँढ़ते रहे
2- इश्क़ ने हमें
इश्क़ ने 'ग़ालिब' निकम्मा कर दिया
गैर ले महफ़िल में बोसे जाम के
हम रहें यूं तश्ना-ऐ-लब पैगाम के
खत लिखेंगे गरचे मतलब कुछ न हो
हम तो आशिक़ हैं तुम्हारे नाम के
इश्क़ ने “ग़ालिब” निकम्मा कर दिया
वरना हम भी आदमी थे काम के
3- पीने दे शराब मस्जिद में बैठकर ए ग़ालिब
या वो जगह बता जहा खुदा नहीं
4-बाद मरने के मेरे
चंद तस्वीर-ऐ-बुताँ, चंद हसीनों के खतूत
बाद मरने के मेरे घर से यह सामान निकला
5-हसरत दिल में है
सादगी पर उस के मर जाने की हसरत दिल में है
बस नहीं चलता की फिर खंजर काफ-ऐ-क़ातिल में है
देखना तक़रीर के लज़्ज़त की जो उसने कहा
मैंने यह जाना की गोया यह भी मेरे दिल में है
6-बेखुदी बेसबब नहीं 'ग़ालिब'
फिर उसी बेवफा पे मरते हैं
फिर वही ज़िन्दगी हमारी है
बेखुदी बेसबब नहीं 'ग़ालिब'
कुछ तो है जिस की पर्दादारी है
7-कागज़ का लिबास
सबने पहना था बड़े शौक से कागज़ का लिबास
जिस कदर लोग थे बारिश में नहाने वाले
अदल के तुम न हमें आस दिलाओ
क़त्ल हो जाते हैं , ज़ंज़ीर हिलाने वाले
8-हो चुकी ‘ग़ालिब’ बलायें सब तमाम
कोई दिन गैर ज़िंदगानी और है
अपने जी में हमने ठानी और है
आतशे-दोज़ख में, यह गर्मी कहाँ,
सोज़े-गुम्हा-ऐ-निहनी और है
बारहन उनकी देखी हैं रंजिशें,
पर कुछ अबके सिरगिरांनी और है
Published on:
27 Dec 2017 09:17 am

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