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सीएम का पद ठुकराने वाले माखन लालचतुर्वेदी जब इस स्कूल में पढ़ाते थे तो आते थे कई गांव के बच्चे, आज है इस हाल में

जिस स्कूल में पढ़ाते थे माखनलाल चतुर्वेदी, वहां स्कूल में 300 से 400 विद्यार्थी पढऩे आते थे

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सीएम का पद ठुकराने वाले माखन लालचतुर्वेदी जब इस स्कूल में पढ़ाते थे तो आते थे कई गांव के बच्चे, आज है इस हाल में

अनिल राठौर/मसनगांव। जिस स्कूल ने बड़े अफसर, मंत्री, नेता दिए। साथ ही सरकारी नौकरी देने वाले कई बड़े अधिकारी भी दिए हैं, अब उस स्कूल में कोई पढऩा नहीं चाहता है। यह स्कूल है, मसनगांव का प्राइमरी स्कूल। इसी स्कूल में मशहूर कवि और स्वतंत्रता सेनानी माखनलाल चतुर्वेदी भी कभी शिक्षक रहे थे। तब सैकड़ों विद्यार्थी यहां पढऩे के लिए लालायित रहते थे, अब यहां हालात बदल चुके हैं। स्कूल में 68 विद्यार्थी हैं। करीब आठ साल पहले इस स्कूल में पहली क्लास में ढाई दर्जन विद्यार्थी थे, वहीं स्कूल में 300 से 400 विद्यार्थी पढऩे आते थे।

उच्च पदों पर पहुंचे विद्यार्थी
गांव के प्राइमरी स्कूल की पहली कक्षा में इस साल केवल 9 बच्चों ने प्रवेश लिया। पिछले साल यहां 13 बच्चों ने प्रवेश लिया था। स्कूल में प्रवेश लेने वाले बच्चों की संख्या पिछले कई सालों से लगातार घट रही है। बच्चों और अभिभावकों की अरुचि के कारण यह आशंका भी बढ़ रही है कि कहीं यह स्कूल भी बंद होने की कगार पर न पहुंच जाए। यह स्थिति तब है जबकि यहां के विद्यार्थी देश-विदेश में गांव का नाम रोशन कर चुके हैं। स्कूल के कई विद्यार्थी बड़े सरकारी पदों पर हैं। कई विद्यार्थी सफल राजनेता भी बने। यहां तक कि प्रदेश सरकार में मंत्री के पद पर भी पहुंचे। मसनगांव प्राइमरी स्कूल के विद्यार्थी रहे रामेश्वर अग्रिभोज मध्यप्रदेश गठन के बाद बनी सरकार में पीडब्लूडी मंत्री रहे थे। स्कूल के ही गोपीकिशन जोशी जनपद पंचायत के पहले अध्यक्ष बने थे। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के रूप में भी गोपीकिशन सदैव अंग्रेज सरकार से लोहा लेते रहे थे। जिला पंचायत के पहले अध्यक्ष गौरीशंकर मुकाती भी इस स्कूल के विद्यार्थी थे।

माखन दादा ने स्कूल को बनाया मशहूर
वैसे इस स्कूल की सबसे ज्यादा ख्याति इस बात को लेकर है कि यहां एक भारतीय आत्मा के रूप में जाने जाते माखनलाल चतुर्वेदी शिक्षक के रूप में पदस्थ रहे थे। गांव के लोग बताते हैं कि माखन दादा के कारण यहां पढऩे के लिए हर कोई बेकरार रहता था। आसपास के करीब एक दर्जन गांवों के विद्यार्थी यहां पढऩे आते थे। डोमनमऊ, सालावैड़ी आदि गांवों के साथ कई किमी दूर से बच्चे यहां आकर पढ़ाई करते थे।

संख्या बढ़ाने के हर संभव प्रयास कर रहे
स्कूल में बच्चोंं की घटती संख्या को लेकर शिक्षक भी चिंतित हैं। बच्चों की संख्या बढ़ाने के हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं। शाला के शिक्षक सुरेंद्र जोशी ने बताया कि इस वर्ष निजी स्कूल की तर्ज पर यहां प्री प्राइमरी स्कूल का शुभारंभ किया गया जिसमें 3 वर्ष तक के बच्चों को प्रवेश देकर पढ़ाया जा रहा है। सभी विद्यार्थियों को चाकलेट देकर प्रवेश कराया गया।

ऐसे थे माखनलाल चतुर्वेदी
महान कवि माखनलाल चतुर्वेदी वरिष्ठ हिंदी कवि, लेखक और पत्रकार के साथ ओजपूर्ण भावनाओं के हिंदी रचनाकार थे। उन्होंने शिक्षण और लेखन जारी रखने के लिए सीएम पद को ठुकरा दिया था। उनका कहना था कि 'मैं पहले से ही शिक्षक और साहित्यकार होने के नाते 'देवगुरु' के आसन पर बैठा हूं। तुम लोग मेरा ओहदा घटाकर मुझे 'देवराज' के पद पर बैठना चाहते हो जो मुझे कभी स्वीकार नहीं है'। उनका जन्म 4 अप्रैल, 1889 को मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले के बावई में हुआ था। पिता नंदलाल चतुर्वेदी प्राइमरी स्कूल में अध्यापक थे। चतुर्वेदी प्राथमिक शिक्षा के बाद घर पर ही संस्कृत, बंगला, अंग्रेजी, गुजरती आदि भाषाओं का सीखने लगे। माखनलाल चतुर्वेदी के व्यक्तित्व के कई पहलू देखने को मिलते हैं।

लेखक के साथ पत्रकार रहे
वह एक ज्वलंत पत्रकार थे लेकिन आत्मा से एक शिक्षक थे। माखनलाल चतुर्वेदी ने प्रभा, कर्मवीर और प्रताप का संपादन किया। देश की आजादी के लिए लड़ाई भी लड़ी और कई बार जेल गए। उन्होंने 1913 में 'प्रभा पत्रिका' का संपादन किया। आजादी आंदोलन के दौरान वह स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी के संपर्क में आए, जिनसे वह बेहद प्रभावित हुए। 1918 में प्रसिद्ध 'कृष्णार्जुन युद्ध' नाटक की रचना की और 1919 में जबलपुर में 'कर्मयुद्ध' का प्रकाशन किया।

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