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रेडीमेड बन रहे, विवाह के खम्ब भी आर्टिफिशियल
जबलपुर।
परम्परागत विवाह समारोहों के लिए ख्यात संस्कारधानी में भी बदलते दौर के साथ बीते कुछ वर्षों में शादियों का अंदाज बदल गया है। विवाह आयोजन में नवाचारों का इस्तेमाल किया जा रहा है। परम्परागत विवाह के मंडपों का स्वरूप भी आधुनिकता के चलते बदल गया है। अब रेडीमेड और रंगीले और चमकदार मंडप बनाए जा रहे हैं। दिखावे में यकीन रखने वालों की तड़क भड़क ने तो मानों विवाह के मंडप को फिल्मी सेट में तब्दील कर दिया है। भव्य शामियाना, चकाचौंध करती लाइटिंग, शानदार डेकोरेशन और जानदार आतिशबाजी के बीच राजसी वैभव, कैटरिंग के परदों से लेकर बर्तन तक सब कुछ भव्यतम। लेकिन इस चकाचौंध में परम्पराएं पीछे छूटती नजर आ रही हैं।
मंडप बने औपचारिकता-
विवाह संस्कार कराने वाले पुरोहित जनार्दन शुक्ला कहते हैं कि धार्मिक रीति-रिवाजों के मुताबिक शादी की रस्मों की शुरुआत मंडप से होती है। इसके लिए पुरोहित दिन व समय निश्चित करते हैं। उचित समय व मुहूर्त पर गाड़े गए मंडप शादी होने के बाद शुभ मुहूर्त में ससम्मान विसर्जित होते हैं। मान्यता है कि शादी के शुभ मुहूर्त पर पुरोहित के आवाहन पर सभी देवता मंडप के नीचे विराजमान रहते हैं और वैवाहिक जोड़े के लिए सुखी वैवाहिक जीवन के द्वार खोलते हैं। शुक्ला कहते हैं कि फेरों के लिए अब मंडप औपचारिकता भर रह गया है।
आननफानन में होते हैं तैयार-
विवाह आयोजनों से जुड़े गढ़ा निवासी आशीष साहा कहते हैं कि आजकल शहर में सीमित जगहों के कारण मंडप कहीं मैरिज हॉल के किसी कोने में रेडिमेड तरीके से खड़ा किया जा रहा है। कहीं खुले मैदान में ऐसी जगह मंडप बनाया जा रहा है,जहां सिर्फ वर-वधू पक्ष के सीमित लोग ही मौजूद रह सकें। मंडप में सिर्फ फेरे होते हैं। शादी के अन्य इंतजामों के साथ-साथ टेंट वाले को मंडप का भी जिम्मा सौंप दिया जाता है, जिसके कारीगर आनन-फानन तैयार करके चले जाते हैं। वे कहते हैं कि अब लकड़ी, पेड़ों की टहनियों और पत्तों से बने परम्परागत विवाह मंडप नजर नही आते।
चाकी, लोढ़ा, चूल्हा गायब-
पुरोहित जनार्दन शुक्ला बताते हैं कि रेडीमेड विवाह मंडप में चाकी, लोढ़ा व चूल्हा अब नही नजर आते। चाकी, लोढ़ा इसलिए रखा जाता है कि यह समृद्ध गृहस्थी का प्रतीक है। चूल्हा इसलिए रखा जाता है कि यह हमें भोजन बनाकर देता है। कलश की स्थापना इसलिए की जाती है कि इसमें देवताओं का वास होता है और उसकी पूजा कर हम देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। साथ ही कलश के सामने पति-पत्नी संकल्प लेते हैं कि हमेशा एक-दूसरे के सहयोगी बने रहेंगे और कभी झूठ नहीं बोलेंगे। शुक्ला ने बताया कि आजकल स्थान के अभाव में कृत्रिम मंडप बनाकर विवाह की रस्म पूरी की जा रही है जो उचित नहीं है।
मंडप में नही होती अब रस्में-
भागमभाग जिंदगी ने अब शादियों को भी फटाफट स्वरूप दे दिया है। कभी विवाह समारोह घर परिवार में सप्ताह भर तक चलते थे। अब उसका स्थान चंद घंटों ने ले लिया है। तिलक, लगन, हल्दी, तेल , मेहंदी, मातापूजन, वरमाला, सात फेरे, कुंवर कलेऊ, बड़ाहार से लेकर विदाई तक की पचासों रस्में अब फटाफट होने लगी है। इनमे से अधिकतर रस्मे मंडप के नीचे होती थीं। लेकिन सब एक हॉल में ही सब कुछ हो रहा है।
ऐसे बनता है मंडप-
हिन्दू परम्परा के अनुसार साल के पेड़ की 9 बड़ी लकडियों और आम व जामुन की टहनियों, पत्तियों से विवाह का मंडप तैयार होता है। इसकी लकड़ी से बने पाटे पर बैठकर वर-वधू वैवाहिक रस्में पूरी करते हैं। जहां साल की लकड़ी और पत्ते नहीं मिलते हैं, वहां विवाह के लिए इस पेड़ के टुकड़े से भी काम चलाया जाता है। वहीं, विवाह का खम्ब आम की लकड़ी से बनाया जाता है। इसमे वंश वृद्धि के लिए बांस व ऊमर की लकड़ियां भी जोड़ी जाती थीं। पुरोहित शुक्ला कहते हैं कि अब मंडप व खम्ब रेडीमेड आ रहे हैं। यह उचित नही है।
Published on:
12 Jan 2023 12:05 pm
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