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आप भी देते हैं बच्चों को ऐसे खिलौने तो सावधान, वर्ना होगा बड़ा नुकसान

आप भी देते हैं बच्चों को ऐसे खिलौने तो सावधान, वर्ना होगा बड़ा नुकसान

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kids toys

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जबलपुर. खिलौने हर बच्चे को पसंद होते हैं। बच्चों के जन्म के बाद से ही घरों में उन्हें अलग-अलग तरह के खिलौने दिए जाते हैं, ताकि वे खेलने के साथ उनसे कुछ सीख सकें, लेकिन इन खिलौनों का बच्चे के मन पर क्या प्रभाव पड़ता है, ये कोई भी पैरेन्ट्स खिलौने खरीदने से बच्चे को देने तक नहीं सोचता है। यही वजह है कि कई बार बच्चे खेल खेल में ऐसी आदतें सीख जाते हैं जो पैरेन्ट्स के लिए चिंता का विषय बन जाती है। जानकारों का मानना है कि खिलौनों का बच्चों के मन पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है। इसलिए उन्हें उम्र के अनुसार बहुत सोच-समझकर खिलौने आदि देना चाहिए।

बच्चों के मन को प्रभावित कर रहे खेल-खिलौने

हिंसक होना आम

आजकल बच्चों का गुस्सैल व हिंसक होना आम बात हो गई है। वे बात बात में गुस्सा दिखाते हैं और कई बार स्वयं को चोट पहुंचाने से लेकर दूसरों पर हाथ उठा देते हैं। इसका मुख्य कारण उनके हाथों में खिलौने वाली गन, तलवार, फाइटिंग टॉयज, सुपर हीरोज के साथ-साथ मोबाइल के वॉर गेम्स, टीवी पर आने वाले हिंसक कार्टून कैरेक्टर भी बच्चों के मन को काफी प्रभावित कर रहे हैं।

खिलौने देते समय असर का सोचें

एक्सपर्ट्स का कहना है कि बच्चों को खिलौने देते समय उनके प्रभाव को जरूर जानें, कि वह बच्चे के मन पर क्या प्रभाव छोड़ेगा। माइंड गेम्स, पजल्स, फिजिकल एक्टिविटी पर ज्यादा फोकस करें। इसके अलावा मोबाइल, टीवी पर बच्चा कितना समय और क्या देखकर बिता रहा है, इस पर नजर जरूर रखें। पैरेन्ट्स बच्चों के साथ ज्यादा से ज्यादा समय दें तो वे गुस्सैल नहीं होंगे।

मिट्टी के खिलौने देते थे अच्छी सीख

मनोविज्ञानी पायल चौरसिया के अनुसार डेढ़ दशक पहले तक मिट्टी के खिलौने आया करते थे। इनमें वाइल्ड एनिमल्स, बर्ड्स, गुल्लक, नेचर के कई रूप शामिल होते थे। वे बच्चे को एक तरह से प्रकृति और आसपास की चीजों को समझने व सीखने का अवसर देते थे। फिर रबर के खिलौने आए तो उनमें भी गुड्डे गुड़िया, फनी गेम्स, माइंड गेम्स, पजल्स होता था जो बच्चे की मानसिक क्षमताओं को बढ़ाने का काम करते थे। इससे बच्चे शांत होते थे।

केस -1

विजय नगर के ठाकुर परिवार का 6 वर्षीय बालक बात बात पर गुस्सा होने लगा था, उसकी बदमाशी इतनी बढ़ गई कि वह पैरेन्ट्स के डांटने पर स्वयं को मारने लगा था। मनोविज्ञानी के पास जब बच्चे को लेकर पैरेन्ट्स पहुंचे तो पता चला कि वह अधिकतर समय टॉय गन, फाइटिंग सुपर हीरोज टॉय और ऐसे ही हिंसक कार्टून देखकर बिताता है। वे तीन साल से ऐसे ही खिलौनों व कार्ट्ून देखने का आदि है। जिनका बच्चे पर मानसिक प्रभाव बुरा पड़ा है।

केस -2

सुहागी निवासी एक 9 वर्षीय बच्ची को मारपीट वाले खेल पसंद हैं। उसे बचपन से ही अन्य बच्चों के साथ लड़ने झगड़ने से उसके पैरेन्ट्स ने नहीं रोका। उसे गन, फाइटिंग टॉयज खेलने के साथ ही पैरेन्ट्स के साथ वह एक्शन मूवीज भी देखती रही। अब किसी गलती या कोई काम नहीं करने पर उसे कोई डांटता है तो वह गुस्सा करने के साथ जोर जोर से चिल्लाने लगती है। उसके स्वभाव में चिड़-चिड़ापन आ गया है।