मप्र हाईकोर्ट ने तंग करने वाली मुकदमेबाजी निवारण अधिनियम 2015 को चुनौती देने वाली दूसरी जनहित याचिका भी खारिज कर दी है। चीफ जस्टिस एएम खानविलकर की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने जबलपुर के वकील आलोक कुमार द्वारा दायर की गई याचिका का मंगलवार को निराकरण करते हुए कहा कि इसमें निहित अधिनियम की संवैधानिकता पर उठाया गया सवाल खुला छोड़ा जाता है। इससे पहले डॉ. पीजी नाजपांडे द्वारा दायर याचिका भी खारिज की जा चुकी है।
अधिवक्ता आलोक कुमार ने याचिका में कहा था कि 26 अगस्त को यह अधिनियम अधिसूचित किया गया। इस अधिनियम के चलते कोई भी याचिका दायर करने से पहले उसके सम्बंध में महाधिवक्ता की अनुमति लेना जरूरी कर दिया गया। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि अधिकतर याचिकाओं में राज्य सरकार की नीतियों, नियमों व कार्यकलापों को चुनौती दी जाती है, लिहाजा इन याचिकाओं में राज्य सरकार एक पक्षकार होती है। एेसे में अनावेदक पक्षकार से ही राय लेना व्यवहारिक नहीं है। यह भी दलील दी गई कि एेसे में पीडि़त व्यक्ति को अनिवार्य मामलों में अनुमति लेते-लते ही विलंब हो जाएगा।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता विवेक रंजन पांडे ने कोर्ट को बताया कि संविधान के तहत रिट याचिका, जमानत की अर्जियां जैसे मूल अधिकार अधिनियम के जरिए एक तरह से छीन लिए गए हैं। उन्होंने कहा कि इसके लिए संविधान में संशोधन करना चाहिए, जो राज्य सरकार का विषय नहीं है। इस पर राज्य सरकार की ओर से बताया गया कि लॉ कमीशन ने 2005 में पेश की गई 192वीं रिपोर्ट में तंग करने वाली मुकदमेबाजी पर रोक लगाने की अनुशंसा की थी। इसके आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों को इस पर अधिनियम बनाने के निर्देश दिए थे, ताकि एेसे मुकदमों में अदालतों का बेशकीमती समय नष्ट न हो।
सुनवाई के बाद कोर्ट ने अधिनियम की संवैधानिकता के प्रश्न पर फिलहाल विचार न करते हुए इसे खुला छोड़ दिया। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता पांडे ने कहा कि हाईकोर्ट के इस निर्णय से भविष्य में इस अधिनियम की संवैधानिकता को चुनौती देने का रास्ता खुल गया है। उन्होंने कहा कि यदि महाधिवक्ता किसी प्रकरण में अनुमति नहीं देते हैं तो इस फैसले के आधार पर इस संबंध में हाईकोर्ट में चुनौती दी जा सकेगी।