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amazing stone mixi गजब है ये पत्थर की मिक्सी, बढ़ा देती है खाने का स्वाद, जानें इसकी खूबी

सदियों पुराना एक ऐसा मिक्सर भी चलन में है, जिससे बना मसाला या पीसी गई चटनी का स्वाद कई गुना बढ़ जाता है जो कि इलेक्ट्रिक मिक्सी में नहीं मिलता  

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Kitchen tips in hindi amazing stone mixi in india

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जबलपुर। मॉडर्न लाइफ में किचन भी मॉडल होते जा रहे हैं। हर दिन एक नया प्रोडक्ट सुविधा के अनुसार लॉन्च होता है। इंटरनेशनल लेवल पर यह बहुत बड़ा मार्केट बनता जा रहा है। किचन में ब्रांडेड कंपनियां अपना दबदबा कायम रखने के लिए नए-नए प्रोडक्ट लॉन्च कर रही हैं। इनमें एक कॉमन प्रोडक्ट है मिक्सी। जो हर सब्जी व्यंजन में काम आती है। चटनी पीसना हो या मसाले बनाना हो या फिर नॉन वेज के लिए स्पेशल डिश तैयार करनी है मिक्सर ग्राइंडर का बड़ा ही महत्व है। लेकिन समय के साथ जहां आधुनिकता किचन में प्रवेश कर रही है वही सदियों पुराना एक ऐसा मिक्सर भी चलन में है।
जिससे बना मसाला या पीसी गई चटनी का स्वाद कई गुना बढ़ जाता है जो कि इलेक्ट्रिक मिक्सी में नहीं मिलता। इसे पत्थर की मिक्सी भी कहा जाता है। हम देसी भाषा में कहें तो इसे सिल और बट्टा कहा जाता है। जबलपुर में सिलबट्टा बनाने वाले आज भी मिल जाते हैं। मेडिकल अस्पताल के पास इनका है डेरा दशकों से है। यहां सिल और बट्टा डांटने वाले अपना काम करते देखे जा सकते हैं। यह आज भी पत्थरों की मिक्सी बनाने में दिन रात छोटे रहते हैं। जिसे शहरवासियों द्वारा पसंद किया जाता है। इन पसंद करने वालों में झुग्गी झोपड़ी से लेकर मुझे बंगले वाले भी शामिल हैं।

अभी भी चलन में पत्थर की मिक्सी

बढ़ते दौर में आज भी लजीज खानपान के शौकीनों से पाकशाला में इस्तेमाल होने वाले पुरातन पत्थर के उपकरण जीवित हैं। एेसे उपकरणों को बनाने वाले चंद ही परिवार बचें हैं, जिनकी रोजी-रोटी इसी से चल रही है। आर्थिक कठिनाईयों में भी एेसे परिवारों का मोह पुस्तैनी धंधे से नहीं छूटा है। मेडिकल, रानीताल, अधारताल में एेसे परिवार हैं, जो आज भी सिल-बट्टा बनाकर जीवन यापन कर रहे हैं। इन परिवारों में बच्चों से लेकर बूढ़ों तक यहीं काम कर रहे हैं।

हुनरमंद इस परिवार को शासन की ओर से कोई मदद नहीं है। परिवार के मुखिया से बात की गई तो उन्होंने दो टूक कहा है कि ये हमारा पुस्तैनी धंधा है। इस धंधे से आज हम बड़े हुए हैं। यह जरूर है कि अब यह चलन में कम हो गया है, जिसका आर्थिक शिकार हम लोगों को होना पड़ता है लेकिन भगवान हमें दो समय की रोटी दे रही देता है।

पहले से अब सिल-बट्टा चलन में कम हो गया है। पाकशाला में व्यंजन बनाने के शौकीनों की आज भी यह पहली पसंद है। रोजाना दो-चार सिल बिक जाती है।
- धर्मेंद बर्मन, कारीगर
हमें कई लोगों ने आश्वासन दिया है लेकिन हम इसी धंधे पर निर्भर है। कोई कुछ नहीं करता है। हमारा परिवार का खर्च इसी से चल रहा है।
- आशा बाई, कारीगर