-जनवरी 2020 में डॉक्टर ने साध्वी को बारूद में लिपटा धमकी भरा पत्र भेजा था
जबलपुर. सांसद प्रज्ञा ठाकुर को बारूद में लिपटा धमकी भरा पत्र भेजने वाले नांदेड़ के डॉक्टर की जमानत अर्जी हाईकोर्ट ने खारिज कर दी है। कोर्ट ने कहा है कि जिस तरह आवेदक ने अपनी मां और भाई को फंसाने के लिए षड़यंत्र रचा, उसे देखते हुए जमानत अर्जी स्वीकार किए जाने योग्य नहीं है।
बता दें कि 13 जनवरी, 2020 को प्रज्ञा ठाकुर के भोपाल स्थित बंगले पर एक धमकी भरी चिट्ठी पहुंचने से हड़कंप मच गया था। साध्वी ने इसे आतंकी साजिश करार दिया था और अपनी जान को खतरा बताया था। पुलिस ने अज्ञात के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज की थी। मामला एक जनप्रतिनिधि से जुड़े होने और आतंकी कनेक्शन की आशंका के चलते एटीएस ने जांच के बाद नांदेड़, महाराष्ट्र के आरोपी डॉक्टर अब्दुल रहमान को गिरफ्तार किया। पूछताछ में आरोपित डॉक्टर ने चौंकाने वाले खुलासे किए। वह पेशे से होम्योपैथिक डॉक्टर है, जो नांदेड़ में प्राइवेट क्लीनिक चलाता है।
आरोपी डॉ. रहमान ने पूछताछ में एटीएस को बताया कि उसका अपने भाई हफीजुर्र रहमान और मां नासेहा बेगम के साथ शादी और संपत्ति की वजह से विवाद चल रहा है। इसी विवाद में भाई ने 2014 में डॉ. रहमान के खिलाफ हत्या की कोशिश की एफआईआर दर्ज करायी थी। उस केस में रहमान को 18 दिन जेल में रहना पड़ा था।
भाई, मां, रिश्तेदारों और पड़ोसियों से बदला लेने की नीयत से रहमान ने जाली दस्तावेज तैयार कर जगह-जगह धमकी भरे पत्र भेजे थे। आरोपित डॉ. सैयद अब्दुल रहमान ने पहला पत्र अंसार उल मुसलमीन संगठन के नाम से अपने भाई के चांसलर को सितंबर 2019 में भेजा था। जिस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। उसके बाद दूसरा पत्र नांदेड़ के पुलिस अधीक्षक और डीएसपी को अगस्त 2019 में भेजा। इस पर भी कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। तीसरा पत्र अक्टूबर 2019 में इंटरनेट पर सर्च कर कश्मीर के बीजेपी नेता और सांसद प्रज्ञा ठाकुर को भेजा। लिफाफे में आरोपित ने उर्दू भाषा का एक पत्र, भाई की मार्कशीट, अन्य दस्तावेज के साथ मां नासेहा बेगम का वोटर आईडी कार्ड भेजा था। लिफाफे में वॉट्सएप के साथ इंटरनेट के जरिए रिश्तेदार और पड़ोसियों के फोटो भेजे थे। आरोप है कि पत्र के साथ उसने जो पाउडर भेजा वो पटाखों में इस्तेमाल होने वाला बारूद है।
इसी मामले में जमानत पाने के लिए आरोपित की ओर से अधिवक्ता नीरज जैन ने हाई कोर्ट के समक्ष यह अर्जी पेश की। सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति सुबोध अभ्यंकर की एकलपीठ ने इसे खारिज कर दिया।