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अनुभवहीन ठेकेदारों के हवाले प्रदेश के एनएच, अयोग्य एजेंसियों को मिला ठेका

- निर्माण में अनावश्यक देरी और दो से ढाई सौ करोड़ परियोजना लागत बढ़ी- बीओटी माध्यम से निर्माण का लक्ष्य पूरी तरह नाकाम- सात साल देरी के बावजूद अब भी डिवाइडर और साइड रोड का काम अधूरा- निर्माण एजेंसियों की योग्यता जांची न आर्थिक क्षमता का आकलन किया- जिमेदारों ने गड़बडिय़ों पर कोई ठोस कार्रवाई भी नहीं की

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जबलपुर। प्रदेश के चमचमाते एनएच पर आप बड़े मजे से वाहन चला सकते हैं, लेकिन ये सुख आपको और बनने वाले एनएच में मिले ये कहा नहीं जा सकता है। क्योंकि अभी जो एनएच बने हैं वे योग्य व अनुभवी एजेंसियों के द्वारा बनाए गए थे, लेकिन अब अयोग्य व अनुभवहीन ठेकेदारों के हवाले ये काम कर दिया गया है। जिसके बाद पुराने एनएच की याद आना तय माना जा रहा है, जहां चलना किसी चैलेंज से कम नहीं होता था।
हैरानी की बात है कि एजेंसियों की कार्य क्षमता का आकलन किए बिना ही जबलपुर संभाग ही नहीं प्रदेश के अन्य जिलों की पांच अन्य परियोजनाओं को भी इसी तरह से अयोग्य ठेकेदारों के हवाले कर दिया गया। नतीजा यह हुआ कि अनुभवहीन कंपनियों ने उन्हें बनाने में न केवल जरूरत से ज्यादा समय लिया, बल्कि परियोजना लागत भी कई गुना बढ़ गई। जाहिर है कि परियोजनाओं को बिल्ड ऑपरेट एंड ट्रांसफर (बीओटी) माध्यम में पूरा करने का विभागीय लक्ष्य पूरी तरह नाकाम रहा। आखिरकार राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण को निर्माण के अन्य फार्मेट का सराहा लेने पड़ा। फिर भी कई काम अब भी अधूरे हैं।

ऐसे की गई अनुभवहीनों पर मेहरबारी
केंद्र सरकार के आर्थिक कार्य विभाग के पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) अनुभाग ने सडक़ परियोजना को 100 किमी के तीन पैकेज में बांटने का निर्देश दिया। जांच एजेंसियों का स्पष्ट मत है कि इसके लिए अनुबंधित निर्माण कंपनी को सात सौ करोड़ से अधिक के कार्य करने का कोई अनुभव ही नहीं था। इसके पैनल में एक सदस्य रूसी मूल का भी था, जिसने पांच वर्षों के दौरान दो परियोजना पूरा करने की योग्यता का जो दावा दस्तावेजों में किया था, वह भी गलत निकला। फिर भी चार्टर्ड अकाउंटेंट फर्म ने दावा संबंधी छानबीन में बड़ी चूक की। उनकी वेबसाइट पर स्पष्ट रूप से पांच साल पुराना अनुभव दर्शाया गया था। फर्म की अनुशंसा को बिना किसी जांच-पड़ताल के स्वीकार कर लिया गया। यदि कंपनी ने परियोजना को उचित तरीके से क्रियान्वयन किया होता तो केंद्र सरकार की ओर से करीब चार सौ करोड़ सालाना अनुदान प्राप्त होता। इस गड़बड़ी चलते ही परियोजना सात वर्ष देरी से जैसे-तैसे पूरी की गई। परियोजना को बीओटी माध्यम से क्रियान्वयन का उद्देश्य असफल रहा। इतने के बावजूद जिमेदार अधिकारियों ने गड़बड़ी की समीक्षा की बात कह कर मामले का आया-गया कर दिया।

ये हुईं गंभीर गड़बडिय़ां
- नियमों की अनदेखी के चलते परियोजना की समयसीमा और निर्धारित बजट में निर्माण पूरा नहीं हो सका। इसके बाद बीओटी की जगह ईपीसी माध्यम से काम कराना पड़ा।
- इससे राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण की कुल 236 करोड़ की परियोजना की लागत बढ़ गई। जिमेदार अधिकारियों ने ठोस कार्रवाई के बजाए भविष्य में अनियमिताओं को रोकने का वादा करके मामले से इतिश्री कर ली गई।
- जबलपुर सहित प्रदेश की हाल में ही पूरी हुईं 12 परियोजनाओं में से पांच के ठेके में कोन्कास्ट इन्फ्रोटेक लिमिटेड शामिल थी। वह निर्धारित तकनीकी और आर्थिक योग्यता नहीं रखती थी।
- बीओटी माध्यम नाकाम होने के बाद इंजीनियरिंग खरीद और निर्माण (ईपीसी) के जरिए पांच परियोजनाओं और रीवा एनएच-75 (1) को पूर्ण करने के लिए नियुक्त ठेकेदार कोन्कास्ट इन्फ्रोटेक लिमिटेड के पास परियोजना लागत का 20 प्रतिशत अथवा 5 करोड़ से अधिक की परियोजनाओं को पूर्ण करने का कोई अनुभव नहीं था।
- कंपनी की क्षमता का आकलन किए बिना ही उसे यह उक्त सभी परियोजनाएं आवंटित कर दी गईं।
- इसी तरह की गड़बड़ी ग्वालियर-8 परियोजना के निर्माण में सामने आई। ठेका कंपनी की विशेषज्ञता को जांचे बिना ही उसे परियोजना की स्पेशल परपस वेहिकल (एसपीवी) में शामिल किया गया।

जिम्मेदारों का ये है कहना -
जबलपुर-भोपाल के बीच एनएच-12 का निर्माण कार्य लगभग पूर्ण हो गया है। टोल प्लाजा का भी निर्माण हो गया है, कुछ जगह पर बोर्ड लगाने का काम रह गया है, जो कराया जा रहा है। प्रोजेक्ट की डीपीआर 2012 में बन गई थी, लेकिन पहली बार जिस कंपनी को निर्माण का ठेका मिला उसकी निर्माण की गति सुस्त होने के कारण उसे टर्मिनेट कर दिया गया। दोबारा जिस कंपनी को ठेका मिला उसने काम ही नहीं किया। इसलिए प्रोजेक्ट में विलंब हुआ। हालांकि लागत नहीं बढ़ी है। तीसरी बार प्रोजेक्ट 2018 में बांगर कंपनी को मिला, जिसने निर्माण कार्य लगभग पूर्ण कर लिया है।
- संतोष शर्मा, प्रोजेक्ट मैनेजर एनएच-12, एमपीआरडीसी

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