
जबलपुर। उसका मन उत्साह और उमंग से भरा हुआ था। सपना था कि सोमवार को बहन उसकी कलाई पर नेह का धागा सजाएगी, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। पाटन के समीप हुए दर्दनाक हादसे के बाद शशांक के सपने अधूरे रह गए। यहां रानीताल मुक्तिधाम में शशांक के ही बगल में दो और सगे-भाई बहनों की चिताएं भी एक साथ जलीं। ये शशांक के ही बहनोई के पिता राजेन्द्र और उनकी बहन संगीता के शव थे। इन दोनों भाई-बहनों ने भी एक-दूसरे की अंगुली थाम कर जीवन का संघर्ष सीखा। किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि उनकी जुदाई इस तरह होगी। रक्षा बंधन के ठीक एक दिन पहले इनकी चिताओं के साथ जलती खुशियों को देखकर हर आंख छलछला आयी। परिजनों का तो ये हाल है कि उनकी आंखों से आंसू नहीं थम रहे हैं। हर तरफ माहौल गमगीन है।
चार की मौके पर मौत
उल्लेखनीय है कि सोमवार सुबह पाटन से करीब १ किलोमीटर आगे तेज रफ्तार कार क्रमांक एमएच ३१-ईके 9588 पत्थर से टकराकर २० फीट नीचे नहर में जा गिरी। इसमें चार लोगों की मौके पर मौत हो गई। इनमें एक बृजेन्द्र धरपुरिया गंभीर रुप से घायल हैं। इनका इलाज चल रहा है। बताया गया है कि कचनार सिटी निवासी बृजेन्द्र धरमपुरिया नागपुर में नौकरी करता है। वह कुछ दिन पहले ही घर आया था। यहां से वह पिता राजेन्द्र धरमपुरिया (७२), बुआ संगीता धरमपुरिया (५८) मां मीरा (६५), व साला शशांक के साथ नागपुर जा रहा था। सभी कार में सवार थे। कार को शशांक चला रहा था। लगभग साढ़े नौ बजे वे पाटन से एक किलोमीटर आगे पहुंचे ही थे कि कार अनियंत्रित होकर सीधे नहर में जा गिरी। सूचना मिलते ही पुलिस और स्थानीय लोग वहां पहुंचे। काफी मशक्कत की, लेकिन तब तक चार लोगों ब्रजेन्द्र के पिता राजेन्द्र धरमपुरिया, मां मीरा धरपुरिया, ब्रजेन्द्र की कटंगी निवासी बुआ संगीता व बीटी तिराहा निवासी **** शशांक की सांसें थम चुकी थीं। केवल बृजेन्द्र को ही बचाया जा सका।
जा रहे थे राखी बंधवाने
शायद ही कोई साल गुजरा हो, जब संगीता ने भाई राजेन्द्र की कलाई पर रक्षा सूत्र न बांधा हो। इसलिए जैसे ही उसे पता चला कि राजेन्द्र नागपुर जा रहे हैं, तो वह शनिवार को ही कटंगी से कचनार सिटी भाई के घर आ गईं। हमेशा की तरह इस बार भी संगीता रक्षा बंधन को लेकर काफी उत्साहित थी। संगीता ने शहर से ही राखी ले ली थी। जिसके बाद सभी सुबह नागपुर के लिए रवाना हुए। संगीता और राजेन्द्र के बीच अथाह प्रेम था। भाई-बहन के इस रिश्ते की सभी मिशाल दिया करते थे, लेकिन वक्त और किस्मत ने इस बार संगीता को यह मौका नहीं दिया, कि वह भाई की कलाई को राखी से सजा सके।
पिता की मौत ने तोड़़ा
राजेन्द्र और संगीता के दो बेटे आशीष और बृजेन्द्र व एक बेटी नारायणी है। राजेन्द्र और संगीता की मौत ने जहां बृजेन्द्र को तोड़कर रख दिया था, आशीष का भी रो-रो कर बुरा हाल था। मुंबई में विवाही नारायणी को जैसे ही एक साथ मात-पिता और बुआ की मौत का पता चला, तो वह अवाक रह रही थी। वह समझ नहीं पाई कि आखिर एेसा कैसे हो गया। वहीं बृजेन्द्र की पत्नी सोनल का भी हाल कुछ एेसा ही था।
इकलौता भाई
हादसे का शिकार हुआ बीटी तिराहा निवासी शशांक दुबे (२९) दो बहनों सोनल धरमपुरिया व मीनल का इकलौता भाई था। बहनोई के साथ नागपुर स्थित आईटी कंपनी में पार्टनर था। मीनल की अभी शादी नहीं हुई है। वो भी शशांक के साथ नागपुर में रह रही थी। शनिवार को वह नागपुर से जबलपुर बहनोई बृजेंद्र धरमपुरिया के साथ आया था। दोनों बहनें रक्षाबंधन के लिए पहले ही राखी खरीद ली थीं। सुबह सात बजे शशांक ने जबलपुर से नागपुर निकलने की फोन पर बड़ी बहन सोनल को खबर भी दी थी। मगर दो घंटे बाद ही ये हृदय विदारक सूचना पहुंची तो दोनों सन्न रह गईं। नागपुर से जबलपुर का रास्ता आंसुओं में पूरा हुआ। भाई का शव देख दोनों बहनों का चित्कार कलेजा चीर रहा था। मीनल भाई के शव से लिपटकर रोते हुए कहे जा रही थी कि 'अब किसके कलाई पर राखी बाधूंगी।'
मां-पिता का भी रो-रोक कर बुरा हाल
शशांक के पिता संतोष दुबे एसबीआई से सेवानिवृत्त हुए हैं। पत्नी सरोज के साथ वे गढ़ा स्थित बीटी तिराहा में ही रह रहे थे। बेटे **** तीनों संतान सेट हो चुके थे। बस मीनल की जिम्मेदारी बची है। नागपुर में आईटी कंपनी में बहनोई के साथ जुडऩे के बाद शशांक सेट हो चुका था। बेटे का शव देख रुधे गले से बोले जा रहे थे कि सुबह नागपुर के लिए निकल रहा था तो उसे पहुंच कर फोन करने को बोला था। मुझे क्या पता था कि मेरा बेटा मुझसे बहुत दूर चला जाएगा।
एक साथ हुआ चारों का अंतिम संस्कार
जिस भाई की अंगुली पकड़कर संगीता का बचपन बीता, जिसके साये में न जाने कितने उतार चढ़ाव देखे। कभी पिता बनकर किसी मुसीबत से बाहर निकाला, तो कभी मां बनकर दुलार भी किया। उसी भाई राजेन्द्र के साथ संगीता ने अंतिम सांसे भी लीं। रानीताल मुक्तिधाम में रविवार को जब संगीता और राजेन्द्र के अलावा मीरा और शशांक का अंतिम संस्कार हुआ, तो वहां मौजूद लोगों की रूह कांप गई। शमशान में हर तरफ सिर्फ सन्नाटा पसरा था। हर एक आंख नम थीं। शायद ही कोई एेसा होगा, जिसने उस पल को न कोसा हो, जिस पल दो-दो परिवारों की खुशियां उजड़ गईं। आशीष के हाथ उस वक्त कांप उठे, जब उसने पिता राजेन्द्र, मां मीरा और फिर बुआ संगीता के शवों को मुखाग्नि दी।

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