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UP Electricity bill: बिजली बिल में 10% फ्यूल सरचार्ज पर सख्त हुआ नियामक आयोग, पावर कॉरपोरेशन से सात दिन में जवाब तलब

UP Power Corporation: उत्तर प्रदेश में फरवरी के बिजली बिलों में 10 प्रतिशत फ्यूल सरचार्ज जोड़े जाने के मामले पर विद्युत नियामक आयोग ने कड़ा रुख अपनाया है। पावर कॉरपोरेशन प्रबंधन से सात दिन के भीतर स्पष्टीकरण मांगा गया है। महंगी दरों पर बिजली खरीद और उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त बोझ को लेकर जांच तेज हो गई है।

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लखनऊ

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Ritesh Singh

Feb 04, 2026

बिजली बिल में 10% फ्यूल सरचार्ज पर सख्त हुआ नियामक आयोग (फोटो सोर्स : WhatsApp News Group)

बिजली बिल में 10% फ्यूल सरचार्ज पर सख्त हुआ नियामक आयोग (फोटो सोर्स : WhatsApp News Group)

UP Power Bills Shock: उत्तर प्रदेश में फरवरी माह के बिजली बिलों में जोड़े गए 10 प्रतिशत ईंधन अधिभार (फ्यूल सरचार्ज) के मामले ने तूल पकड़ लिया है। इस पर उत्तर प्रदेश विद्युत नियामक आयोग (UPERC) ने गंभीर रुख अपनाते हुए पावर कॉरपोरेशन प्रबंधन से सात दिन के भीतर स्पष्टीकरण मांगा है। आयोग ने यह भी पूछा है कि अनुमोदित दरों से अधिक कीमत पर बिजली खरीदने की स्थिति क्यों बनी।

क्या है फ्यूल सरचार्ज

फ्यूल सरचार्ज यानी ईंधन अधिभार शुल्क वह अतिरिक्त राशि होती है, जो बिजली उत्पादन में ईंधन (कोयला, गैस आदि) की लागत बढ़ने पर उपभोक्ताओं से वसूली जाती है। यह शुल्क नियामक आयोग की अनुमति और निर्धारित फॉर्मूले के तहत लगाया जाता है। लेकिन इस बार उपभोक्ताओं को मिले बिजली बिलों में अचानक 10 प्रतिशत की वृद्धि ने सवाल खड़े कर दिए हैं।

उपभोक्ताओं में नाराजगी

फरवरी के बिलों में बढ़े हुए फ्यूल सरचार्ज को लेकर उपभोक्ताओं में असंतोष देखा जा रहा है। मध्यमवर्गीय परिवारों और छोटे व्यापारियों का कहना है कि पहले से बढ़ती महंगाई के बीच बिजली बिलों का बोझ और बढ़ गया है।
कई उपभोक्ताओं ने शिकायत की कि उन्हें इस वृद्धि की पूर्व जानकारी नहीं दी गई।

नियामक आयोग का हस्तक्षेप

मामले की गंभीरता को देखते हुए उत्तर प्रदेश विद्युत नियामक आयोग ने स्वतः संज्ञान लेते हुए पावर कॉरपोरेशन प्रबंधन से पूछा है कि 10% फ्यूल सरचार्ज की गणना किस आधार पर की गई। क्या यह वृद्धि आयोग की स्वीकृति के अनुरूप है। 
अनुमोदित दर से अधिक कीमत पर बिजली खरीदने की नौबत क्यों आई।  क्या महंगी बिजली खरीदने के अन्य विकल्पों पर विचार किया गया था। आयोग ने स्पष्ट किया है कि उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त आर्थिक भार डालने से पहले पारदर्शिता आवश्यक है।

महंगी बिजली खरीदने पर सवाल

सूत्रों के अनुसार, आयोग विशेष रूप से इस बात की जांच कर रहा है कि बिजली कंपनियों ने अनुमोदित दरों से अधिक कीमत पर बिजली क्यों खरीदी।  यदि समय रहते दीर्घकालिक अनुबंधों और वैकल्पिक स्रोतों का उपयोग किया जाता, तो यह स्थिति टाली जा सकती थी। ऊर्जा क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि कोयले की कीमतों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उतार-चढ़ाव,परिवहन लागत में वृद्धि, बिजली मांग में अचानक बढ़ोतरी। इन कारणों से उत्पादन लागत बढ़ी हो सकती है। लेकिन इसके बावजूद उपभोक्ताओं पर सीधा बोझ डालने से पहले नियामक स्वीकृति और सार्वजनिक सूचना जरूरी होती है।

उपभोक्ता हित बनाम वित्तीय दबाव

पावर कॉरपोरेशन पर उत्पादन लागत और वितरण खर्च का दबाव रहता है। लेकिन आयोग का दायित्व उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करना भी है। इस मामले में आयोग का हस्तक्षेप यह संकेत देता है कि वह बिना स्पष्ट औचित्य के किसी भी अतिरिक्त वसूली को स्वीकार नहीं करेगा।

 कॉरपोरेशन को देना होगा जवाब 

पावर कॉरपोरेशन को सात दिन के भीतर विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी। इसमें खरीद दर, ईंधन लागत, अनुबंध शर्तें और फ्यूल सरचार्ज गणना का पूरा विवरण देना होगा। यदि जवाब संतोषजनक नहीं हुआ, तो आयोग संशोधित आदेश जारी कर सकता है या उपभोक्ताओं को राहत देने के निर्देश दे सकता है। ऊर्जा विभाग के अधिकारियों का कहना है कि वे नियामक आयोग के साथ समन्वय में काम कर रहे हैं और सभी तथ्यों को स्पष्ट किया जाएगा। उपभोक्ताओं के हितों की अनदेखी नहीं की जाएगी।

आम जनता पर असर

बिजली बिलों में बढ़ोतरी सीधे घरेलू बजट को प्रभावित करती है। छोटे दुकानदार, किराएदार और मध्यम वर्ग के परिवार विशेष रूप से प्रभावित होते हैं। विशेषज्ञों का सुझाव है कि उपभोक्ता अपने बिलों की जांच करें और यदि कोई विसंगति दिखे तो शिकायत दर्ज कराएं।

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