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अंग्रेजों ने छल से पकड़ा था पिता पुत्र को, तोप के मुंह से बांधकर उड़ा दिया था, रोंगटे खड़ी कर देती है ये शहादत

कविताओं से विद्रोह की आज जलाते थे राजा शंकरशाह, रघुनाथ शाहगृहमंत्री अमित शाह देंगे श्रद्धांजलि

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shankar shah raghunath shah

shankar shah raghunath shah

जबलपुर। मुगलों से लोहा लेना हो या फिर अंग्रेजों की गुलामी की जंजीरों को तोडऩे का साहस, जबलपुर के वीरों, वीरांगनाओं ने इसमें बढ़-चढकऱ हिस्सा लिया और अपना नाम सदा के लिए अमर कर गए। ऐसे ही वीर राजा शंकर शाह, उनके पुत्र रघुनाथ शाह ने मातृभूमि के लिए इसी वीर धरती पर अपना बलिदान दिया था। उनकी यादें आज भी शहरवासियों समेत यहां आने वालों को दिखाई देती हैं और उन्हें देशभक्ति के लिए प्रेरित भी करती हैं।

कविताओं से जगाई विद्रोह की अलख
राजा शंकर शाह, पुत्र रघुनाथ शाह अच्छे कवि माने जाते थे, वे कविताओं के माध्यम से अपनी प्रजा में देशभक्ति का जज्बा जगाया हुआ था। राजा शंकर शाह का राज्य गोंडवाना (वर्तमान जबलपुर) से लेकर मंडला समेत आसपास के जिलों तक फैला था। सन् 1857 में जबलपुर में तैनात अंग्रेजों की 52वीं रेजिमेंट का कमाण्डर क्लार्क बहुत ही क्रूर माना जाता था। वह छोटे राजाओं, जमीदारों एवं जनता को बहुत परेशान करता था। यह देखकर गोंडवाना (वर्तमान जबलपुर) के राजा शंकरशाह ने उसके अत्याचारों का विरोध करने का निर्णय लिया। राजा एवं राजकुमार दोनों ने कविताओं द्वारा विद्रोह की आग पूरे राज्य में सुलगा दी। इसी बीच राजा ने एक भ्रष्ट कर्मचारी गिरधारीलाल दास को निष्कासित कर दिया था। वह क्लार्क को कविताओं का अर्थ अंग्रेजी में समझाता था। क्लार्क समझ गया कि राजा किसी विशाल योजना पर काम रहा है। उसने हर ओर गुप्तचर तैनात कर दिए। कुछ गुप्तचर साधु वेश में महल में जाकर सारे भेद ले आए। उन्होंने क्लार्क को बता दिया कि दो दिन बाद छावनी पर हमला होने वाला है।

14 सितम्बर को पकड़ा, 18 को तोप से उड़ा दिया
अंग्रेज अफसर क्लार्क ने आक्रमण के पहले ही 14 सितम्बर को राजमहल को घेर लिया वहीं राजा की तैयारी अभी अधूरी थी, अत: धोखे के चलते राजा शंकरशाह और उनके 32 वर्षीय पुत्र रघुनाथ शाह बन्दी बना लिए गए। जहां पिता-पुत्र को मृत्यु से पूर्व बंदी बनाकर रखा गया था वर्तमान में ये जबलपुर डीएफओ कार्यालय है। चार दिन बाद 18 सितम्बर 1858 को दोनों को अलग-अलग तोप के मुंह पर बांध दिया गया। मृत्यु से पूर्व दोनों ने अपनी प्रजा को एक-एक छन्द सुनाए, पहला छन्द राजा ने सुनाया और दूसरा उनके पुत्र ने-

मलेच्छों का मर्दन करो, कालिका माई।
मूंद मुख डंडिन को, चुगली को चबाई खाई,
खूंद डार दुष्टन को, शत्रु संहारिका ।।

दूसरा छन्द पुत्र ने और भी उच्च स्वर में सुनाया।

कालिका भवानी माय अरज हमारी सुन
डार मुंडमाल गरे खड्ग कर धर ले...।

छंद के पूरा होते ही जनता में राजा एवं राजकुमार की जय के नारे गूंज उठे। जिससे क्लार्क डर गया। उसने तोप में आग लगवा दी। भीषण गर्जना के साथ चारों ओर धुआं भर गया और महाराजा शंकर शाह और राजकुमार रघुनाथ शाह वीरगति को प्राप्त हो गए। लेकिन तब तक जनता में अंग्रेजों को प्रति गुस्सा उबल चुका था और यह लड़ाई आजादी मिलने तक चलती रही।

धोखे से अंग्रेजों ने राजा-राजकुमार को घेर लिया
जबलपुर में 1857 में तैनात अंग्रेजों की 52वीं रेजीमेंट का कमांडर क्लार्क बहुत क्रूर था। उसकी क्रूरता को देखकर गोंडवाना (वर्तमान में जबलपुर) के राजा शंकर शाह ने उसके खिलाफ मोर्चा खोल दिया। राजा और राजकुमार दोनों अच्छे कवि थे। उन्होंने अपनी वीर रस की कविताओं से अंग्रेजों के खिलाफ गोलबंदी कर दी। विद्रोह की आग पूरे राज्य में सुलग गई। अंग्रेजों ने 14 सितंबर की रात को शंकर शाह के महल को चारों ओर से घेर लिया। धोखे से राजा शंकर शाह और उनके 32 साल के पुत्र रघुनाथ शाह बंदी बना लिए गए।

अंग्रेजों ने तोप के सामने बांधकर उड़ा दिया था
जबलपुर शहर में अब भी वह स्थान है, जहां पिता-पुत्र को बंदी बनाकर रखा गया था। अब यहां वन विभाग का ऑफिस है। 18 सितंबर, 1857 को दोनों को अलग-अलग तोप के मुंह पर बांध उड़ा दिया गया था। दोनों ने हंसते-हंसते मौत को गले लगा लिया, लेकिन अंग्रेजों के सामने झुकना पसंद नहीं किया। इस घटना के बाद पूरे गोंडवाना साम्राज्य में अंग्रेजों के खिलाफ बगावत शुरू हो गई। शंकर शाह-रघुनाथ शाह के बलिदान ने लोगों के मन में अंग्रेजों के खिलाफ एक ऐसी चिंगारी को जन्म दे दिया जो बाद में शोला बन गई।