20 जनवरी 2026,

मंगलवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

हल्दियों का रास्ता गवाह है रजवाड़े की पहली ‘कन्या पाठशाला‘ का, 150 साल पहले खुली थी हवेली में

उस समय लोग लड़कियों को पढ़ाना तो दूर बाहर निकालना भी गलत मानते थे...

2 min read
Google source verification

जयपुर

image

Dinesh Saini

Sep 22, 2017

girls school

जयपुर। रजवाड़े की पहली कन्या पाठशाला मई, 1866 में हल्दियों का रास्ता की हवेली में खोली गई। उस समय लोग लड़कियों को पढ़ाना तो दूर बाहर निकालना भी गलत मानते थे। प्रधानमंत्री कांतिचन्द्र मुखर्जी की रिपोर्ट के मुताबिक पहली कन्या पाठशाला में शिक्षिका सदा कौर व जीवनी देवी को दस रुपए माह पर रखा गया। रुकमा देवी को चपरासन और राम कुंवरी को जलधारी बनाया। कन्या शाला में दो दर्जन बालिकाएं ही भर्ती हुई।

बालिका शिक्षा की अलख जगाने में लगी बड़ौदा महारानी चिमन बाई और कूच बिहार की महारानी सुनीता देवी ने ढूंढाड़ में कन्या शिक्षा को बढ़ावा देने के लिहाज से महारानी जादूनजी को 18 अक्टूबर 1906 को पत्र लिख कर कोलकाता में आयोजित बैठक में बुलाया था। तब जादूनजी ने यह कहते हुए आने से मना कर दिया कि पूरे राजपूताना में ही पर्दा प्रथा के कारण कन्या शिक्षा में सफलता मिलना मुश्किल है।

सन् 1867 में कोलकाता की मिस ओकलटन ने कन्या स्कूल की कमान संभाली तब कम उम्र में विवाह होने से लड़कियां बीच में पढाई छोड़ कर चली जाती। अंग्रेज महिलाओं ने भी स्कूल भेजने के लिए घरों में माता-पिता से समझाइश की। मुसलमानों की लड़कियां आने लगीं तब उर्दू भी पढ़ाने लगे। सन् 1873 में सुश्री जेन जोयसी ने हैडमास्टर बनने के बाद विधवाओं के लिए सिलाई, बुनाई व कढ़ाई प्रशिक्षण शुरु किया।

अध्यापिकाओं के नहीं मिलने से सन् 1888 में लड़कियों की संख्या घट गई। ईसाई मिशनरी ने पानो का दरिबा और पुरानी बस्ती में कन्या स्कूल खोले। सन् 1900 में भिंडों का रास्ता के पंडित शिवनन्द शर्मा व उनकी पत्नी अपनी हवेली में बिना फीस कन्याओं को पढ़ाने लगे।

जनवरी 1911 में उन्होंने कन्या सदाचार पाठशाला खोली, जिसे रियासत दस रुपए मासिक अनुदान देने लगी। रिकार्ड के मुताबिक सन् 1879 में कन्या शिक्षा पर 6283 रुपए खर्च किए। सुश्री हेमिंग के बाद कन्या शिक्षा की कमान यमुना देवी ने संभाली। वर्ष 1930 में सुश्री दामले के समय 16 कन्या स्कूल खुले, जिनमें 772 लड़कियां पढऩे लगी। लतिका रुद्र व सुश्री कटरसी के बाद 1938 में सावित्री भारतीया के समय बालिका हाई स्कूल व कॉलेज खुलने लगे। लड़कियों ने 1933 में पहली बार बोर्ड की परीक्षा दी।

मंदिरों की चटशालाओं के शिक्षक जोशीजी के पास भी बालिकाएं पढऩे को जाने लगी। सेठों व सामंतों की लड़कियों को मौलवी व जोशीजी घर पर पढ़ाने जाते। सबसे पहले जैन समाज ने व इसके बाद अग्रवाल, माहेश्वरी, खंडेलवाल आदि समाजों ने कन्या स्कूला खोलने की पहल की।