
अमिताभ बच्चन आज भी जहां खड़े होते हैं, लाइन वहीं से शुरू होती है...
दिनेश ठाकुर @ जयपुर. अमिताभ बच्चन ने 41 साल पहले अपने दोस्त टीनू आनंद की फिल्म 'कालिया' में 'हम जहां खड़े हो जाते हैं, लाइन वहीं से शुरू होती है' बोलकर खूब तालियां बटोरी थीं। तब शायद उन्होंने भी नहीं सोचा होगा कि यह फिल्मी संवाद अभिनेता के रूप में उनका प्रतिनिधि-वाक्य बन जाएगा। आज उम्र के 80 साल पूरे करने के बाद भी मनोरंजन की दुनिया में वह जहां खड़े होते हैं, लाइन वहीं से शुरू होने लगती है।
यह करिश्मा भारतीय सिनेमा में किसी और अभिनेता को नसीब नहीं हुआ। न भूतो न भविष्यति। अभिनय के बादशाह दिलीप कुमार 70 साल की उम्र में फिल्मों से दूर हो गए थे। वह तो फिर भी अमिताभ से काफी पहले की पीढ़ी के थे। अमिताभ के समकालीन और बाद के ज्यादातर अभिनेता रिटायर हो चुके हैं। अमिताभ इस उम्र में भी 'तुम भी चलो हम भी चलें, चलती रहे जिंदगी' की अलख जगाए हुए हैं। उम्र की चढ़ती-ढलती धूप पर कोई रिमोट कंट्रोल काम नहीं करता, लेकिन हिम्मत और हौसले से सतत कर्म में जुटे रहने की भावना इंसान को कैसे संबल देती है, अमिताभ बच्चन इसकी मिसाल हैं। वह नई पीढ़ी के आदर्श-नायक हैं। यह चमकता-दमकता सितारा न जाने कितनों को मंजिल का पता दे रहा है।
अमिताभ बच्चन की कामयाबी का राज यह है कि उन्होंने उम्र के अलग-अलग पड़ाव पर नाकामियां झेलकर भी हार नहीं मानी। शुरुआती दौर की कई फिल्मों की नाकामी के बाद भी वह डटे रहे। फिर नाकामी की 'जंजीर' ऐसी टूटी कि नायक के रूप में नब्बे के दशक तक फिल्मी दुनिया में उन्हीं का नाम सबसे ज्यादा जपा जाता रहा। जयपुर में 'खुदागवाह' की शूटिंग के दौरान मुलाकात में उन्होंने बताया था कि गलतियों ने उन्हें काफी कुछ सिखाया। शुरुआती दौर की फिल्में आंख मूंदकर चुनना उनकी गलती थी। राजनीति से जुड़ना भी उनका गलत फैसला था। इसे उन्होंने जल्द सुधार लिया। एक और बड़ी गलती उन्होंने अपनी कंपनी (एबीसीएल) बनाकर की। इस गलती ने भी उन्हें सबक दिया कि वह खुद अपने ब्रांड राजदूत हैं, उन्हें खुद की कंपनी खड़ी करने की कोई जरूरत नहीं है।
हालात से जूझना और बाजी पलटना
इस उम्र में अमिताभ की सक्रियता इसलिए भी उल्लेखनीय है कि वह 32 साल से मियासथीनिया ग्रेविस से जूझ रहे हैं। इस बीमारी में मांसपेशियां लगातार कमजोर होती जाती हैं और जरा-सी मेहनत थकान पैदा कर देती है। हेपेटाइटिस बी (यह संक्रामक बीमारी लिवर को कमजोर करती है) ने भी उन्हें गिरफ्त में ले रखा है। खुद अमिताभ ने सोशल मीडिया पोस्ट में बताया था कि उनका लिवर 75 फीसदी खराब हो चुका है। फिर भी उनका हालात से जूझने और बाजी को अपने पक्ष में करने का जज्बा बरकरार है। इसी जज्बे के दम पर वह हारी हुईं कई बाजियां पलट चुके हैं।
उत्तर भारतीयों को दी पुख्ता इमेज
कई दूसरे पहलुओं की तरह अमिताभ बच्चन का यह योगदान भी महत्त्वपूर्ण है कि उन्होंने हिन्दी सिनेमा में उत्तर भारतीयों को नई और पुख्ता इमेज दी। वह चाहे जिस किरदार में नजर आएं, उनकी अदाकारी में अवधी और भोजपुरी की मिली-जुली संस्कृति तथा हाव-भाव का असर खुद-ब-खुद छलक पड़ता है। 'शराबी को शराबी नहीं तो क्या पुजारी कहोगे और गेहूं को गेहूं नहीं को क्या ज्वारी कहोगे' (शराबी) जैसे आम संवाद भी उनकी अदायगी से खास हो जाते हैं। निर्देशक रवि टंडन ने 'मजबूर' (1974) की शूटिंग के दौरान ही कह दिया था कि अमिताभ के व्यक्तित्व में जो इलाहाबादी रंग-ढंग हैं, एक दिन वही उनकी सबसे बड़ी ताकत होंगे।
दोहराव में भी नई बात
सत्तर से नब्बे के दशक तक बतौर नायक सक्रिय रहने के बाद अमिताभ बच्चन आज भी फिल्मों में केंद्रीय भूमिकाओं में नजर आ रहे हैं। उनके नायक के दौर की फिल्मों में कुछ मसाले हमेशा दोहराए जाते थे। अमिताभ की खासियत यह रही कि बार-बार दोहराई जाने वाली बातों में भी वह कोई न कोई नई बात पैदा कर देते थे। नई पीढ़ी के फिल्मकार उनके इसी हुनर के कायल हैं।
तजुर्बों का सफर
हॉलीवुड में मेल ब्रुक्स (95), वेन डाइक (96), लेजली फिलिप्स (98), माइक नसबॉम (98), लैरी स्ट्रॉच (99) और बॉब बार्कर (98) जैसे कई बुजुर्ग अभिनेता आज भी सक्रिय हैं, लेकिन बॉलीवुड में अमिताभ बच्चन अकेले अभिनेता हैं, जिनकी पारी केंद्रीय भूमिकाओं में 80 साल की उम्र में भी जारी है।
Updated on:
11 Oct 2022 12:33 am
Published on:
11 Oct 2022 12:22 am
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