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समाज में यदि विनम्र भाषा का लोप होगा तो संवाद कठोर होंगे

-ऋतु सारस्वत समाजशास्त्री बीते दिनों स्टेट रिसोर्स ग्रुप सुपरविजन की ओर से उत्तर प्रदेश के दस हजार छात्र-छात्रों पर किए गए एक विस्तृत अध्ययन से जो सत्य सामने आया वह समाज के एक बहुत बड़े बदलाव की ओर संकेत करता है। इस अध्ययन के मुताबिक बेसिक शिक्षा के विद्यालयों के छात्र शैक्षणिक गतिविधियों गणितीय कौशल […]

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-ऋतु सारस्वत समाजशास्त्री

बीते दिनों स्टेट रिसोर्स ग्रुप सुपरविजन की ओर से उत्तर प्रदेश के दस हजार छात्र-छात्रों पर किए गए एक विस्तृत अध्ययन से जो सत्य सामने आया वह समाज के एक बहुत बड़े बदलाव की ओर संकेत करता है। इस अध्ययन के मुताबिक बेसिक शिक्षा के विद्यालयों के छात्र शैक्षणिक गतिविधियों गणितीय कौशल और तार्किक क्षमता में बेहतरीन प्रदर्शन कर रहे हैं। वे मुश्किल सवालों को हल कर रहे हैं और पढ़ाई में मेधावी साबित हो रहे हैं लेकिन जब बात सामाजिक मूल्यों और संस्कारों की आती है तो रिपोर्ट बेहद निराशाजनक है। रिपोर्ट बताती है कि विद्यार्थियों की बोलचाल में शिष्टाचार के शब्द, 'थैंक यू' 'सॉरी' या 'प्लीज' आदि लुप्त हो चुके हैं। विद्यार्थी अपने शिक्षकों को अभिवादन करने से भी बचना चाहते हैं।

निश्चित रूप से यह केवल किसी एक प्रदेश का मामला नहीं है, देखने में आ रहा है कि अधिकांश युवा संस्कारों को पुरातन मानकर अस्वीकार कर रहे हैं। यह समस्या सिर्फ भारत की ही नहीं, अपितु पूरे विश्व की है। महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि ऐसा क्यों हो रहा है? इस प्रश्न का कोई एक उत्तर ढूंढ पाना संभव नहीं है परंतु अगर सिलसिलेवार देखा जाए तो इसके अनेकानेक कारण हैं जिनको समझना इसलिए भी जरूरी हो जाता है कि वर्तमान कहीं एक ऐसी पीढ़ी का निर्माणकर्ता न बन जाए जहां भविष्य अभद्रता और असंवेदनशीलता को सामान्य व्यवहार के रूप में स्वीकार करने लगे। विकासात्मक मनोविज्ञान के शोधकर्ता लॉरेंस कोहलबर्ग अपने विभिन्न शोधों के जरिये यह स्पष्ट करते हैं कि बच्चों में बड़ों के प्रति सम्मान कोई जन्मजात गुण नहीं होता, बल्कि यह सामाजिक अनुभवों और परिवेश से विकसित होता है। कोहलबर्ग का मानना है कि बच्चों का नैतिक विकास विभिन्न चरणों में होता है, जिनमें वे परिवार, शिक्षकों और वरिष्ठजनों से सामाजिक मर्यादा और व्यवहार सीखते हैं। जर्नल ऑफ प्रैगमैटिक्स में प्रकाशित शोध दर्शाते हैं कि किसी समाज की भाषा उसके सामाजिक संबंधों और मूल्यों को प्रतिबिंबित करती है। भाषा में प्रयुक्त विनम्र शब्द- जैसे 'कृपया', 'धन्यवाद', 'क्षमा कीजिए', 'जी' केवल औपचारिक शब्द नहीं होते, बल्कि दूसरे व्यक्ति के प्रति आदर और सम्मान की भावना को व्यक्त करते हैं।

बाल-विकास और भाषा विज्ञान के क्षेत्र में किए गए शोध यह स्पष्ट करते हैं कि बच्चों की भाषा केवल शब्द सीखने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह इस बात पर भी निर्भर करती है कि उनसे कैसे और किस भाव से बात की जाती है। जर्नल साइकोलॉजिकल साइंस 2013 में प्रकाशित मनोवैज्ञानिक ऐन वीजलाइडर और ऐन फर्नाल्ड का अध्ययन बताता है कि बच्चों के भाषा-विकास में केवल शब्दों की संख्या ही नहीं, बल्कि माता-पिता और देखभाल करने वालों की ओर से किया गया संवेदनशील, संवादात्मक और प्रतिक्रियात्मक संवाद निर्णायक भूमिका निभाता है। अध्ययन के अनुसार, जिन बच्चों से सम्मानपूर्वक और ध्यान देकर बात की जाती है, उनकी भाषा-समझ, शब्दावली क्षमता अधिक मजबूत होती है। बच्चों की भाषा केवल शब्दों से नहीं बनती, बल्कि बोलने के तरीके, स्वर और संबोधन से भी आकार लेती है। जब बच्चों से सम्मानपूर्वक बात की जाती है, तो वे उसी भाषा-शैली को धीरे-धीरे अपने व्यवहार में अपनाने लगते हैं। बच्चे वही भाषा सीखते हैं, जिसे वे रोज सुनते हैं और वही भाव अपनाते हैं, जिसे वे अपने आसपास अनुभव करते हैं।

घर, परिवार, विद्यालय और समाज सभी अमूमन यह मानकर चलते हैं कि बच्चों के भीतर आत्मसम्मान का भाव नहीं होता और इसीलिए वह बच्चों के साथ बेझिझक वह व्यवहार करते हैं जो उन्हें अनुकूल प्रतीत होता है चाहे वह कठोर शब्दावली हो या उपेक्षात्मक भाव-भंगिमा। जब माता-पिता, अभिभावक या शिक्षक बच्चों से आदेशात्मक या उपेक्षापूर्ण भाषा में बात करते हैं, तो बच्चे उसी भाषा को सामान्य मान लेते हैं। परिणामस्वरूप उनके भीतर भी विनम्र और सम्मानजनक भाषा के प्रयोग की प्रवृत्ति कमजोर पडऩे लगती है। अगर समाज में विनम्र भाषा का लोप होगा तो स्वाभाविक रूप से संवाद कठोर होंगे और यह सामाजिक दूरी को बढ़ाएंगे। यदि हमें संवेदनशील, संतुलित और भरोसेमंद समाज चाहिए, तो हमें शब्दों के माध्यम से ही उसकी नींव को मजबूत करना होगा।