गोल गप्पे बेच कर खरीदा बेट-cricketer yashasvi jaiswal
जयपुर। यूपी के भदोही के cricketer yashasvi jaiswal ए लिस्ट के मैच में दोहरा शतक लगाने वाले विश्व के सबसे युवा खिलाड़ी बन गए हैं। उन्होंने बैंगलुरु में विजय हजारे ट्रॉफी में खेलते हुए 154 गेंद में दोहरा शतक लगाया है। वे मुम्बई की टीम से खेलते हैं और सबसे बड़ी बात कि उन्होंने गोल गप्पे बेचते हुए क्रिकेट में सितारा बनने की ख्वाब देखें। क्रिकेट की पिच के साथ उन्होंने जीवन की पिच पर संघर्षो से खेला है।
cricketer yashasvi jaiswal आज cricket की दुनिया में देश ही नहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नाम कमा रहे हैं, वजह है कि उन्होंने लिस्ट ए से खेलते हुए दोहरा शतक लगाने वाले विश्व के सबसे युवा खिलाड़ी का खिताब अपने नाम कर लिया है। यशस्वी ने हाल ही में बेंगलुरु में आयोजित विजय हजारे ट्रॉफी में खेलते हुए 154 गेंद में दोहरा शतक लगाया। उन्होंने 17 वर्ष 292 दिन की उम्र में यह रिकॉर्ड अपने नाम किया जबकि इससे पहले यह रिकॉर्ड द अफ्रीका के खिलाड़ी एलेन बेरो के नाम था, जिन्होंने 20 वर्ष 275 दिन की उम्र में दोहरा शतक बनाया था। लिस्ट ए मैचों में यशस्वी दोहरा शतक मारने वाले नौवें खिलाड़ी हैं। इससे पहले लिस्ट ए में रोहित शर्मा ने तीन दोहरे शतक बनाए हैं, सहवाग-सचिन के नाम एक एक दोहरा शतक है। यशस्वी, विजय हजारे ट्राफ़ी में दोहरा शतक लगाने वाले तीसरे बल्लेबाज हैं। उनके इस रिकॉर्ड की खबर से यूपी के भदोही जनपद के लोग उत्साहित हैं और यशस्वी के परिवार में खुशी की लहर है। यशस्वी की मां कहती हैं कि अभी यशस्वी को और भी आगे जाना है।
बाइट मां
क्रिकेट में यशस्वी को यह उपलब्धि यों ही नहीं मिल गई। क्रिकेट की पिच से पहले जीवन की पिच पर उन्होंने मुश्किलों मैदान से बाहर करने की कोशिश की है। कम उम्र में क्रिकेट का सपना देखना मुश्किल नहीं है, लेकिन अभावों में बड़े सपने देखना मुश्किलों को बढ़ाने जैसा है। लेकिन यशस्वी ने यह हिम्मत दिखाई। अपने सपनो को जुनून में बदलने के लिए इस खिलाड़ी को मुम्बई में टेंट में सोना कीड़े—मकोड़ों के बीच सोना पड़ा। खर्च के लिए गोलगप्पे भी बेचना पड़ा था। आपको बता दें कि यशस्वी जायसवाल उत्तर प्रदेश के सबसे छोटे जिलों में शुमार भदोही के सुरियावां बाजार के रहने वाले हैं। उनके पिता भूपेंद्र जायसवल पेंट की दुकान चलाते हैं तो मां कंचन जायसवल गृहणी हैं। यशस्वी के पिता खुद एक क्षेत्रीय क्रिकेटर रहे और उनका सपना बड़े स्तर के मैचों में खेलना था लेकिन पारिवारिक परिस्थितियों के कारण उनका सपना सपना ही रह गया। उन्होंने अपने सपने दोनों बेटों को दिए। छोटे बेटे यशस्वी के क्रिकेट के प्रति जुनून देखकर उन्होंने उसे 11 साल की उम्र में मुम्बई क्रिकेट की ट्रेनिंग लेने भेज दिया। मुम्बई में यशस्वी अपने चाचा के साथ रहते थे। उनका घर छोटा था और यशस्वी को प्रैक्टिस के लिए दादर से आजाद मैदान जाने में भी काफी दिक्कत होती थी। इसके बाद चाचा ने आजाद मैदान में बने टेंट में यशस्वी की एंट्री करा दी। यहां वह सुबह पांच बजे उठ जाता और क्रिकेट प्रैक्टिस करता। यहां जमीन पर सोने और कीड़े—मकोड़ों के बीच रहने को यशस्वी ने आदत बना लिया, लेकिन मुश्किल तब भी कम नहीं हुई। उसे यहां घर से खर्च के तौर पर कुछ पैसे भेजे जाते लेकिन वह उसके लिए नाकाफी होते। इस वजह से यशस्वी आजाद मैदान के बाहर ही एक गोलगप्पे की दूकान पर काम करने लगा। पूरा दिन वो यहां काम करता। सुबह शाम प्रेक्टिस के बाद वो जितना हो पाता, उतना खाना अपने लिए बनाता। लेकिन इन दिक्कतों के बारे में यशस्वी कभी घर पर नहीं बताता था। उसकी नजर इन मुश्किलों पर नहीं, सिर्फ क्रिकेट पर थी। यही वजह है कि अपने स्कूल की तरफ से खेलते हुए यशस्वी ने एक मैच में रिकॉर्ड 319 रन बनाए। उसकी इस धुआंधार पारी ने उसकी किस्मत बदल दी। इस मैच को आजाद मैदान पर खेलते हुए कोच ज्वाला सर की नजर यशस्वी पर गयी और उन्होंने यशस्वी के बेजोड़ खेल को देखते हुए ट्रेनिग देने की ठानी। इसके बाद यशस्वी के जीवन मे बदलाव आना शुरू हो गया।
जल्द ही यशस्वी का चयन अंदर 19 भारतीय क्रिकेट टीम में हो गया। खास बात यह कि उसी समय उनके साथ सचिन तेंदुलकर के बेटे अर्जुन भी अंडर 19 टीम में चयनित थे। जब अर्जुन ने अपने पिता सचिन तेंदुलकर से यशस्वी के बारे में बताया, तब यशस्वी की कहानी सुनकर सचिन काफी प्रभावित हुए। उन्होंने यशस्वी को घर बुलाकर अपना बल्ला गिफ्ट किया और उन्हें शुभकामनाएं भी दी। यशस्वी ने श्रीलंका, इंग्लैंड में भी अच्छी पारी खेली लेकिन उन्होंने जब फिर एक नया रिकॉर्ड अपने नाम कर लिया तो उनकी चर्चा पूरे विश्व मे होने लगी।
Published on:
21 Oct 2019 08:08 pm
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