
जयपुर। पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी की काव्य कृति ‘मैं ही राधा, मैं ही कृष्ण’ पर शुक्रवार को संवाद किया गया। इसमें विशेषज्ञों ने कहा कि माता-पिता की सेवा छोड़कर मंदिर जाना, न कर्म है और न धर्म। विशेषज्ञों ने कहा कि रिश्वत खूब ली और राशि को मंदिर में चढ़ाया, तो क्या वह धर्म है। कृति में इसको लेकर स्पष्ट किया कि व्यक्ति का व्यवहार ही उसका धर्म है और उसके स्वभाव से इंगित होता है।
राजस्थान पत्रिका की ओर से जवाहर कला केन्द्र में आयोजित पुस्तक मेले में यह संवाद हुआ। मूर्तिदेवी सम्मान प्राप्त काव्य कृति ‘मैं ही राधा, मैं ही कृष्ण’ का श्री कल्लाजी वैदिक विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. ताराशंकर शर्मा ने संस्कृत अनुवाद किया है। संस्कृत अनुवाद अहमेव राधा, अहमेव कृष्ण को केन्द्रीय साहित्य अकादमी ने पुरस्कार प्रदान किया। प्रो. शर्मा ने कहा कि कृति में पूर्व जन्म से लेकर अगले जन्म तक की यात्रा को समझाया गया है। कई विद्वानों ने खंड काव्य कहा, किन्तु यह पूरे जीवन के बारे में कृति है अत: मैं इसे महाकाव्य मानता हूं। कृति में पिता के धर्म, मां के धर्म और मित्र सहित अन्य के धर्म के बारे में बताया है।
कवि एवं चिंतक प्रो. अजहर हाशमी ने संवाद को वीडियो के माध्यम से संबोधित किया। प्रो. हाशमी ने कृति के लेखक गुलाब कोठारी को ऋषि पुरुष बताते हुए कहा कि उनके पास पुरुषार्थ का धन है, कृति में लेखक ने धर्म, कर्म और मोक्ष की बेहतर व्याख्या की है। उन्होंने कृति में वर्णित जैसा खावे अन्न, वैसे होवे मन कहावत का उल्लेख करते हुए कहा कि आहार का हमारे विचार और व्यवहार से सीधा संबंध है।
वेद विज्ञान अध्ययन एवं शोध संस्थान के सुकुमार वर्मा ने कहा कि कृष्ण शक्तिमान है तो राधा उनकी शक्ति है, दोनों अलग नहीं किए जा सकते। कृष्ण को पाना है तो हरेक को राधा बनना ही पड़ेगा। डॉ. श्वेता तिवारी ने कार्यक्रम का संचालन किया।
Q. राजनीति में धर्म होना चाहिए या नहीं?
जवाब- राजनीति को अवसर के अनुरूप नीतिगत फैसला करना चाहिए और यह राजनीति कर्म करने वाले के विवेक पर छोड़ना चाहिए। आज उलटा हो रहा है कि मेरे लाभ के लिए किसी का भी नुकसान हो, इसकी मुझे परवाह नहीं। धर्म सबका अलग है, निजी व्यवहार की बात है वह सार्वजनिक नहीं होता।
Q. माया को हराकर परमात्मा को कैसे प्राप्त कर पाएंगे?
जवाब- माया को समझने के लिए पहले स्वयं को समझना पडेगा। माया मेरा ही अंग है। जो ब्रह्म है वही माया है। मेरी कामना का नाम माया है। कामना के पीछे ज्ञान है। इसका मतलब है मैं ही कामना हूं, मैं ही ज्ञान हूं और मैं ही कर्म कर रहा हूं। मन को समझना पड़ेगा तभी कामना स्पष्ट होगी।
काव्य कृति में पुरुषार्थ चतुष्टय धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के अध्याय हैं। लेखक ने एक जीव के माध्यम से बताया कि धर्म व्यक्ति का व्यवहार या स्वभाव है। कृति में बताया है कि आज मानव कैसे अर्थ के पीछे दौड़ रहा है। कामना को माया का स्वरूप बताते हुए स्पष्ट किया कि माया के आवरण अविद्या भाव में बांधे रखते हैं।
संवाद के दौरान लेखक और पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी ने श्रोताओं की जिज्ञासाओं को भी शांत किया।
जवाहर कला केंद्र के शिल्पग्राम में शुक्रवार को पत्रिका फेयर के दौरान फ्यूचर ऑफ डिजिटल रीडिंग पर चर्चा हुई। इसमें लेखक मनीष वैद्य ने कहा कि मोबाइल के दौर में मानवता खत्म हो रही है। किताबें समाज को जोड़ती हैं। इसलिए अधिक से अधिक किताबें पढऩी चाहिए।
आज के दौर में लोग रील देखना पसंद करते हैं जिनका सामाजिक जीवन में कोई उपयोग नहीं है। अच्छी किताबें पढ़ेंगे तो अच्छी आदतें घर करेंगी। व्यक्तित्व निखरेगा। एक सवाल के जवाब में वैद्य ने कहा कि डिजिटल रीडिंग युवाओं के लिए अच्छा विकल्प है। साहित्य हिन्दी का हो या अंग्रेजी का अच्छा होना चाहिए। सीखने के लिए भाषा को बैरियर नहीं बनाना चाहिए।
Updated on:
22 Feb 2025 09:29 am
Published on:
22 Feb 2025 07:41 am
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