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झांसी की रानी के बलिदान और साहस की गाथा में हिचकी बनी कंगना की आवाज

फिल्म बनाना आसान नहीं है और जब बात ऐतिहासिक फिल्म की हो तो यह और चुनौतीपूर्ण कार्य बन जाता हैं। कंगना रनौत ने 'मणिकर्णिका' की चुनौती तो ली है, मगर वह उसमें पूरी तरह कामयाब नहीं हो पाई।

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जयपुर

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Aryan Sharma

Jan 26, 2019

Jaipur

झांसी की रानी के बलिदान और साहस की गाथा में हिचकी बनी कंगना की आवाज

डायरेक्शन : कृष, कंगना रनौत
स्टोरी-स्क्रीनप्ले : वी. विजयेन्द्र प्रसाद
डायलॉग्स-लिरिक्स : प्रसून जोशी
म्यूजिक : शंकर एहसान लॉय
सिनेमैटोग्राफी : किरण देवहंस
एडिटिंग : रामेश्वर एस भगत
रनिंग टाइम : 148 मिनट
स्टार कास्ट : कंगना रनौत, जीशु सेनगुप्ता, डैनी डेन्जोंग्पा, मिष्ठी, अंकिता लोखंडे, सुरेश ओबेरॉय, कुलभूषण खरबंदा, मोहम्मद जीशान अयूब, अतुल कुलकर्णी, ताहिर

आर्यन शर्मा/जयपुर. बॉलीवुड की 'क्वीन' कंगना रनौत अब 'मणिकर्णिका : द क्वीन ऑफ झांसी' बनकर पर्दे पर नजर आई हैं। मूवी में कंगना ने साल 1857 की क्रांति में अंग्रेजी हुकूमत से लोहा लेने वाली वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई का किरदार निभाया है। इतना ही नहीं, उन्होंने कृष के साथ इस पीरियड ड्रामा का निर्देशन भी किया है। यों तो तकरीबन सभी लोगों ने बचपन में अपनी पाठ्यपुस्तक में सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता 'खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी...' पढ़ी हुई है। लिहाजा लक्ष्मीबाई के बारे में भली-भांति जानते हैं। इस फिल्म में भी लक्ष्मीबाई की बहादुरी और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के सामने नहीं झुकने के जज्बे को दिखाया गया है। कहानी में बिठुर की मणिकर्णिका उर्फ मनु की शादी झांसी के राजा गंगाधर राव के साथ हो जाती है। परम्परा के अनुसार शादी के बाद उनका नाम बदलकर लक्ष्मीबाई कर दिया जाता है। इधर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की नजर झांसी पर है। इसी बीच लक्ष्मीबाई के बेटे दामोदर और पति गंगाधर राव का निधन हो जाता है। इसके बाद झांसी को अंग्रेजों से बचाने की जिम्मेदारी लक्ष्मीबाई के कंधों पर आ जाती है।

कंगना छाई हुई हैं, बाकी कलाकार नहीं उभरे
फिल्म की कहानी इतिहास के पन्नों से निकली है। स्क्रीनप्ले ठीक है, जो और क्रिस्प हो सकता था। निर्देशक कृष और कंगना रनौत ने इस पीरियड ड्रामा को पर्दे पर उतारने का अच्छा प्रयास किया है। डायलॉग्स अच्छे हैं, पर कहीं न कहीं उन्हें सही से डिलीवर नहीं किया गया। एक्शन और वॉर सीक्वेंस जबरदस्त हैं। वीएफएक्स बढिय़ा हैं, मगर फिल्म की स्लो स्पीड अखरती है। कंगना ने अभिनय तो अच्छा किया है, लेकिन उनकी आवाज दमदार नहीं है, जिससे इस ऐतिहासिक चरित्र के सिनेमैटिक प्रजेंटेशन में झोल आ गया है और पर्दे पर जोश फीका नजर आता है। स्क्रीन पर ज्यादातर समय कंगना ही दिखाई दी है। इस कारण अन्य किरदार उभरकर सामने नहीं आ पाए। डैनी, अतुल कुलकर्णी, जीशु सेनगुप्ता के लिए करने को ज्यादा कुछ नहीं है। झलकारी बाई की भूमिका में अंकिता लोखंडे ओके हैं। सोनू सूद के फिल्म छोडऩे के बाद उनकी जगह लेने वाले मोहम्मद जीशान ने भी खुद को जाया किया है। गीत-संगीत औसत है। बैकग्राउंड स्कोर मूवी में जान डालता है। सिनेमैटोग्राफी अच्छी है।

क्यों देखें : सिनेमैटिक कैनवास पर हिस्टोरिकल ड्रामा को उतारने की कोशिश अच्छी है, लेकिन कलर कॉम्बिनेशन परफेक्ट नहीं है। फिल्म में कई लूपहोल्स हैं, जिससे यह जोश नहीं जगाती। ऐसे में यह सिर्फ टाइमपास फिल्म बनकर रह गई।
रेटिंग : 3 स्टार