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तीन विग्रह करा रहे श्रीकृष्ण के सम्पूर्ण साक्षात दर्शन

भगवान श्रीकृष्ण के प्रपोत्र ब्रजनाभ की ओर से बनाए गए गोविंददेवजी के श्रीविग्रह जयपुर के आराध्य बन गए। गोविंद की नगरी के आराध्य गोविंददेवजी (Govinddev Temple Jaipur) श्रीकृष्ण के सम्पूर्ण दर्शन करा रहे है। हालांकि एक ही शिला से बनाए गए श्रीकृष्ण के तीन विग्रह अलग—अलग रूप में पूजे जा रहे है। पहले श्रीविग्रह श्रीकृष्ण के चरणों के रूप में करौली में मदनमोहनजी (Madan Mohanji Karauli) के रूप में पूजे जा रहे है।

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तीन विग्रह करा रहे श्रीकृष्ण के सम्पूर्ण साक्षात दर्शन

तीन विग्रह करा रहे श्रीकृष्ण के सम्पूर्ण साक्षात दर्शन

तीन विग्रह करा रहे श्रीकृष्ण के सम्पूर्ण साक्षात दर्शन
— गोविंददेवजी : श्रीकृष्ण के मुखारविंद दर्शन
— गोपीनाथजी : श्रीकृष्ण के कटि व वक्ष स्थल
— करौली के मदनमोहनजी : श्रीकृष्ण के चरण दर्शन

जयपुर। भगवान श्रीकृष्ण के प्रपोत्र ब्रजनाभ की ओर से बनाए गए गोविंददेवजी के श्रीविग्रह जयपुर के आराध्य बन गए। गोविंद की नगरी के आराध्य गोविंददेवजी (Govinddev Temple Jaipur) श्रीकृष्ण के सम्पूर्ण दर्शन करा रहे है। हालांकि एक ही शिला से बनाए गए श्रीकृष्ण के तीन विग्रह अलग—अलग रूप में पूजे जा रहे है। पहले श्रीविग्रह श्रीकृष्ण के चरणों के रूप में करौली में मदनमोहनजी (Madan Mohanji Karauli) के रूप में पूजे जा रहे है, वहीं दूसरे श्रीविग्रह श्रीकृष्ण के कटि व वक्ष स्थल के रूप में जयपुर के पुरानी बस्ती में पूजे जो रहे है। जबकि श्रीकृष्ण के मुखारविंद के रूप में शहर के आराध्य गोविंददेवजी पूजे जा रहे है। इतिहासकारों की मानें तो गोविंददेवजी के आने के 17 साल बाद जयपुर की नींव रखी गई।

गोविंददेवजी मंदिर महंत अंजन कुमार गोस्वामी ने बताया कि जिस शिला पर कंस ने माता देवकी की संतानों का वध किया था, उसी शिला के तीन खंड करके श्रीकृष्ण के प्रपोत्र ब्रजनाभ ने अपनी दादी के कहे अनुसार तीन श्रीविग्रहों का निर्माण करवाया, पहले विग्रह का निर्माण चरण के रूप में किया गया, जो श्रीकृष्ण के चरणों के समकक्ष थे, ये श्रीविग्रह मदनमोहनजी के रूप में करौली में विराजित है। दूसरा श्रीविग्रह ठाकुर श्रीकृष्ण के कटी व वक्ष स्थल के स्वरूप थे, जो अभी जयपुर के पुरानी बस्ती में गोपीनाथजी मंदिर में विराजित है। वहीं तीसरे श्रीविग्रह का निर्माण मुखारविंद के रूप में हुआ, जो श्रीकृष्ण की सम्पूर्ण छवि के समान है, वे शहर के आराध्य गोविंददेवजी के रूप में विराजित है। इस तरह गोविंददेवजी का प्रादूर्भाव हुआ।

गोमा टीला में किया प्रकट...
महंत अंजन कुमार गोस्वामी ने बताया कि कालांतर में ये श्रीकृष्ण के तीनों श्रीविग्रह कहीं लुप्त हो गए। बाद में गौरांग महाप्रभु ने अपने शिष्य रूप गोस्वामी को इन्हें प्रकट करने के लिए कहा, लेकिन कहीं नहीं मिले। एकदिन स्वप्न में योग माया देवी ने दर्शन देकर कहां कि गोमा टीला नामक स्थान है, जहां गौमाता रोजाना दुग्ध वर्षा करती है, उसी स्थान पर ठाकुरश्री के दर्शन होंगे, स्वपन अनुसार गोमा टीला से रूप गोस्वामी ने गोविंददेवजी को प्रकट किया।

भक्तमाल की कथा सुन मिर्जा राजा मानसिंह हुए भक्त

जयपुर फाउंडेशन के संस्थापक अध्यक्ष सियाशरण लश्करी ने बताया कि गोविंददेवजी को गोमा टीला से प्रकट कर अपने आश्रम में ले आए, वहां झोपड़ी में विराजित किया। तब रूप गोस्वामी भक्तमाल की कथा करते थे, उस कथा को आमेर महाराज मिर्जा राजा मानसिंह सुनते थे। तब मिर्जा राजा मानसिंह ने उसी स्थान पर सात मंजिल का लाल पत्थर का मंदिर बनवा लिया। बंसत पंचमी के दिन ठाकुरजी के पाटे बिठाया गया। औरंगजेब के समय वृंदावन में मूर्तियों व मंदिरों को खंडित करने के दौरान 16वीं सदी के अंत में श्रीकृष्ण के श्रीविग्रहों को आमेर नरेश के संरक्षण में वृंदावन से जयपुर लाया गया, जो 70 साल बाद कई स्थानों से होते हुए ठाकुरजी जयपुर पधारे। जयपुर में गोविंददेवजी सबसे कनकघाटी में विराजित किए गए। इसके 17 साल बाद जयपुर की नींव रखी गई। फिर गोविंददेवजी को कनकघाटी से वर्तमान जगह लाया गया।


7 विग्रह आए थे जयपुर...
वृंदावन से 7 विग्रह जयपुर आए, जिनमें गोविंददेवजी, गोपीनाथजी, मदनमोहनजी के अलावा विनोदीलालजी और राधा दामोदरजी विग्रह जयपुर लाग गए। इनमें मदनमोहनजी करौली में विराजित है, जबकि विनोदीलालजी व राधा दामोदरजी जयपुर के चौड़ा रास्ता में विराजित है। वहीं श्याम सुंदरजी और राधारमणजी आज भी वृंदावन में विराजमान है।