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कहानी – छोटी सी भूल

काश भावनाओं में बहने के स्थान पर उसने अपने पिता की तर्कसंगत बात मान ली होती एक लोभी परिवार में शादी तोडऩे की तो आज खुशहाल जिंदगी जी रही होती।

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कहानी - छोटी सी भूल

कहानी - छोटी सी भूल

विनय कुमार पाठक

कहा जाता है कि औरतों की छठी इंद्रिय काफी संवेदनशील होती है। वे समझा जाती हैं सामने वाले की नीयत। पर यह बात सही नहीं है। सजीली को यह बात सही नहीं लगती। उसका अपना अनुभव इस बात को सही मानने से इनकार करता है। उसकी छठी इंद्रिय ने उसे नकुल को समझाने में कोई सहयता नहीं की। उसका मस्तिष्क नहीं समझा पाया उसकी चिकनी चुपड़ी बातों को और वह उलझा कर रह गई एक ऐसे भंवर में जिसमें आज भी चक्कर काट रही है। आज सजीली के विवाह की छठी वर्षगांठ है और उसका पति उससे दूर है। भौगोलिक रूप से तो वह सिर्फ कुछ हजार किलोमीटेर की दूरी पर है। वह यूरोप में रहता है और सजीली दिल्ली में। मानसिक रूप से वह कितनी दूर है कह नहीं सकती। यदि छठी इंद्रिय वास्तव में संवेदनशील होती तो वह नकुल की चाल में न फंसती। और वही क्यों न जाने कितनी लड़कियां अपने देहलोलुप प्रेमियों के प्रेमजाल में फंसकर अपना जीवन बर्बाद कर देती हैं।

वैसे अब उसकी चाहत नहीं है नकुल के साथ रहने की। न उससे तालाक लेने की चाहत है। नकुल भी तलाक के लिए नहीं कहता पर उसके साथ संपर्क न के बराबर है। रेल की पटरियों की तरह दोनों की जिंदगी समानांतर चल रही है बगैर एक दूसरे से मिले, बराबर दूरी बनाए हुए। जैसे किसी परिचित को पर्व त्योहार पर बधाई सधाई दे दी जाती है वैसे ही वे एक दूसरे को बधाई दे देते हैं।
पर वर्षगांठ पर नकुल से शादी से मिले जख्म की जो गांठ बन गई है उसमें एक टीस तो उठती ही है। नकुल से शादी जब टूटने वाली थी तो उसने ही पापा को मना किया था। वह दृश्य उसके सामने अक्सर आ जाता है।

'हमें यह रिश्ता तोडऩा ही होगा। उनके अभी से ऐसे तेवर हैं तो आगे चलकर क्या होगा? बड़े ही लालची किस्म के इंसान हैं ये लोग।' उसके पिता देवराज ने उसकी मां कांता से कहा था।
उसकी मां उधेड़बुन में पड़ गई थी। उनकी बेटी सजीली की शादी में तीन दिन रह गए थे। सारी तैयारियां हो चुकी थीं। नजदीकी रिश्तेदार आ चुके थे। वह चुपचाप देवराज को देखती रह गई। उसकी समझा में नहीं आया वह क्या बोले।

देवराज समझा सकते थे अपनी पत्नी की मनोस्थिति। पर बेटी को जानबूझाकर ऐसे परिवार में देना भी उचित नहीं था। उन्होंने बात आगे बढ़ाई, 'जब शादी के पहले उनकी मांग बढ़ रही है तो आगे क्या होगा। मांगने का तरीका भी तो देखो। एक तो चोरी ऊपर से सीनाजोरी। पहले बात हुई थी पांच लाख रुपए की गाड़ी देने की। अब बीस लाख रुपए की गाड़ी मांग रहे हैं।'
'पापा, मेरी नकुल से बात हुई है। वह ऐसा नहीं है। आप गाड़ी वही दो जो आपने वादा किया है। नकुल सब संभाल लेगा।' सजीली बीच में आकर बोली थी।
सजीली देवराज की इकलौती बेटी थी। उसकी किसी बात को उन्होंने आज तक टाला नहीं था। सजीली थी भी बड़ी ही समझादार। काम में आगे पढ़ाई में अव्वल।
'बेटी मुझो संदेह है, तुम्हें शादी के बाद तंग किया जाएगा। उनकी मांग बढ़ती जाएगी। मैं उसे पूरा नहीं कर पाऊंगा। तुम्हारी जिंदगी नरक बन जाएगी।' उसके पापा ने कहा था।
'नकुल बिल्कुल अलग है पापा। वह मेरे बिना रह नहीं सकेगा। सगाई के बाद से वह प्रतिदिन मुझो दो बार फोन करता है। वह अपने घर वालों को समझाा लेगा। आप निश्चिंत रहो। सब ठीक हो जाएगा।' सजीली की बात पर पापा चुप रह गए थे और निर्धारित दिन सजीली और नकुल की शादी हो गई थी। हालांकि शादी के दिन भी नकुल के पापा ने काफी खरी खोटी सुनाई थी देवराज को।

शादी के बाद पहली बार जब सजीली आई थी तभी से सास और ननद का व्यवहार दुश्मनी लिए हुए था। पर सजीली को नकुल के प्यार पर पूरा भरोसा था। सगाई के बाद से ही मोबाइल पर नकुल से बातें होती थी और नकुल उससे प्यार जताता था। उसकी तारीफ के पुल बांधता था। साथ जीने साथ मरने की कसमें खाता था।
नकुल के मुंह से अपनी तारीफ सुन सजीली फूले न समाती थी। 'तुम मॉडलिंग की दुनिया में जाओगी तो छा जाओगी। तुम्हें जो एक बार देखता होगा दुबारा देखने से रोक नहीं पाता होगा। तुम्हारा ड्रेस सेंस गजब का है। कितनी क्यूट लगती हो तुम। आज तो बिजली गिरा रही हो।' और न जाने क्या क्या कहता था नकुल जब विडियो कॉलिंग करता था वह। उसकी बातें सुन सजीली को लगता था कि जो आदमी उससे इतना प्रेम करता है, उसकी इतनी तारीफ करता है वह हमेशा उसका साथ देगा। और वह भी हमेशा उसका साथ देगी। पर शादी के बाद नकुल के व्यवहार में शनै: शनै: परिवर्तन होता चला गया।

शादी के तीसरे दिन ही दोनों निकले थे केरल हनीमून मनाने। वहां पहुंचते ही सास ने नकुल को फोन किया था- 'वह कुछ शिकायत तो नहीं कर रही थी हमारी?' नकुल ने उस समय यह सोच कर बात टाल दी थी कि सजीली उसकी बात सुन रही है। पर बाद में नकुल का व्यवहार बदलता चला गया। उसकी मांगें बढ़ती चली गईं। उसे अपनी मां और अपनी बहन की सारी बातें सही लगती थी। उसकी बातें तो बिलकुल ही नहीं सुनता था वह।

इसी क्रम में सजीली गर्भवती हो गई थी। दिनभर नौकरी की थकान और सुबह शाम घर का काम। सास ननद ऐसे बैठी रहती थीं मानो वे घर की मालकिन हों और सजीली नौकरानी। नकुल को ऑफिस से फुर्सत नहीं मिलती थी। अगर कभी मिलती भी तो उस समय का सदुपयोग वह सजीली को शारीरिक और मानसिक रूप से परेशान करने में करता था। ससुर जी को पूजा करने से फुर्सत ही नहीं मिलती थी। कभी कभार मिलती तो अपने समधी समधन की निंदा में उसका सदुपयोग करते थे।
शुरू में सजीली ने कोशिश की मामले को अपने स्तर पर सुधारने की और मैके वालों को कुछ न बताने की। पर अत्याचार बढ़ता ही गया और उसके पास कोई चारा नहीं रहा अपने पिता को बताने के अलावा। बेचारे देवराज कह भी नहीं पाए कि हमने तो पहले ही मना किया था इस शादी के लिए। कहकर भी क्या फायदा होना था। सजीली को और भी दुख होता।

अंत में सजीली गुडग़ांव से नोएडा आ गई अपने माता पिता के पास। गर्भ सात महीने का हो गया था। नकुल ने भी विदेश में नौकरी पा ली थी और वहीं चला गया था। पर मानसिक यंत्रणा का असर बच्चे पर भी पडऩे लगा था। आठवें महीने में डॉक्टर ने साफ कह दिया कि बच्चे का शारीरिक विकास नहीं हो रहा और उसके मानसिक विकास पर भी असर पड़ सकता है। सिजेरियन कर बच्चे को जन्म दिया गया।
उसके बाद से आज करीब पांच वर्ष बीत गए हैं। नकुल को उसकी तो याद नहीं ही आती अपने बच्चे से भी कोई प्यार नहीं है उसे।

काश उसने एक छोटी से भूल नहीं की होती नकुल के तारीफों को प्यार समझाने की। काश भावनाओं में बहने के स्थान पर उसने अपने पिता की तर्कसंगत बात मान ली होती एक लोभी परिवार में शादी तोडऩे की तो आज खुशहाल जिंदगी जी रही होती।
आज भी न जाने कितनी ही लड़कियां स्वार्थी लड़कों की चिकनी चुपड़ी बातों का शिकार हो खुद की जिंदगी तबाह कर लेती है।