
मंदबुद्धि कहलाया जाने वाले बालक आगे चलकर बना महान वैज्ञानिक
इनका जन्म 1822 में फ्रांस के डोल नामक स्थान पर हुआ था। पिता चमड़े के साधारण व्यवसायी थे। घर के हालात अच्छे नहीं थे, इसलिए बेटे को लेकर पिता के यही सपने थे उसका जीवन गरीबी में न निकले। पिता की इच्छा थी कि बेटा पढ़-लिखकर बड़ा आदमी बने। इसीलिए उन्होंने इनका दाखिला अरबोय की एक स्कूल में करवाया। पिता इनकी शिक्षा के अतिरिक्त कर्जा उठाने के लिए भी तैयार थे लेकिन इनका मन पढ़ाई में कहां लगता था। इन्हें तो चित्रकारी और मछली पकडऩे में आनंद आता था। बाकी में समय में पिता की मदद करवाने की कोशिश किया करते थे। इस तरह पढ़ाई से यह धीरे-धीरे पिछड़ते जा रहे थे और इसका नतीजा यह हुआ को उनका एकेडमिक रिकॉर्ड खराब होने लगा। अब तो स्कूल के साथी मंदबुद्धि कहकर उनका मजाक बनाने लगे। अध्यापक की उनकी उपेक्षा करने लगे। इन सबसे ये इतने दुखी हुए कि बीच में ही स्कूल छोड़ दिया। इस दौरान पिता ने ही इनके हौंसले बढ़ाए और इन्हें आगे की शिक्षा के लिए पेरिस भेजा। हालांकि पेरिस भेजना पिता के लिए इतना आसान नहीं था। उन्हें बहुत कर्ज लेना पड़ा। पेरिस में वैसाको के एक कॉलेज में एडमिशन लिया और आगे की पढ़ाई शुरू की। इनकी रुचि रसायन शास्त्र में थी और वे रसायन शास्त्र के विद्वान डॉ. ड्यूमा से विशेष प्रभावित हुए।
नई-नई खोज में मिलती गई कामयाबी
जीवाणु की रोकथाम के लिए इन्होंने जो तरीका अपनाया था उसी सिद्धांत पर आगे चलकर पाश्चुरीकृत दूध भी चलन में आया। जीवाणु की खोज के बाद इन्होंने जीवाणु पर रिसर्च करना शुरू किया। उसी बीच फ्रांस में मुर्गीपालन केंद्रों में हैजे की बीमारी का प्रकोप बढ़ गया था। इनका मानना था कि जीवाणु रक्त में भी हो सकते हैं। इन्होंने मरे हुए चूजों के रक्त में से जीवाणुओं को निकालकर एक इंजेक्शन तैयार किया और इस इंजेक्शन के इस्तेमाल से मुर्गीयों में फिर से ये रोग नहीं हुआ। इसके बाद इन्होंने गाय और भेड़ों के एन्थ्रैक्स नामक रोग के लिए वैक्सीन तैयार की। इसमें भी संक्रमण को रोकने में यह कामयाब रहे। इसके बाद इनका अगला अध्ययन जानवरों से मनुष्यों में संक्रमण को रोकना था। इस तरह उन्होंने एक नई खोज की। यह कोई और नहीं, बल्कि कुत्ते के काटने पर होने वाले संक्रमण की रोकथाम के लिए रेबीज रोग का टीका बनाने वाले महान वैज्ञानिक लुई पाश्चर थे। इनकी इस महान खोज की वजह से लाखों लोगों की जिदंगी बच जाती है। इनकी खोजे मानव जीवन की सबसे अहम खोजों में से थी। 1868 में उन्हें एक स्ट्रोक का सामना करना पड़ा और 1895 में दुनिया ने इस महान वैज्ञानिक को खो दिया।
Published on:
05 May 2020 04:00 pm
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