
बबली बाउंसर... 'मधुर' सिनेमा की 'तमन्ना' अधूरी
आर्यन शर्मा @ जयपुर. 'चांदनी बार', 'पेज 3', 'ट्रैफिक सिग्नल', 'फैशन' सरीखी फिल्मों से मधुर भंडारकर ने 'वास्तविक' सिनेमा दिखाने वाले निर्देशक के रूप में पहचान बनाई है। उनकी 'बबली बाउंसर' ऊपरी तौर पर महिला बाउंसर की कहानी लगती है, लेकिन यह बुलबुला फूटते देर नहीं लगती। मधुर खुद के बेंचमार्क से कोसों दूर हैं। आइडिया कमाल का है और इसे एक्सप्लोर करने की संभावनाएं काफी हैं, मगर उसे कहानी में ढालने में चूक हो गई। ढीला लेखन 'विचार' के उद्देश्य पर पानी फेर देता है। स्क्रीनप्ले में वह जादू नदारद है, जो एंगेज रख सके। महिला बाउंसर की चुनौतियां दिखाने के बजाय रोमांटिक एंगल देने से सारा मजा किरकिरा हो गया है। मधुर का निर्देशन 'आउट ऑफ फॉर्म' है। उन्होंने निश्चित 'फॉर्मूला' के चक्कर में अपनी यूएसपी से कॉम्प्रोमाइज किया है। फिल्म को कॉमेडी टच दिया है, मगर हास्य में वह बात नहीं है, जो गुदगुदा सके। पूरी फिल्म में 'बबली' कहती रहती है कि वह बहुत फनी है, लेकिन कॉमिक पंच हर स्थिति में काम नहीं करते। म्यूजिक भी रंग जमाने में कामयाब नहीं है। सिनेमैटोग्राफी साफ-सुथरी है।
यह कहानी है दिल्ली के पास स्थित 'बाउंसर्स का गांव' के नाम से मशहूर असोला-फतेहपुर बेरी की बिंदास और फनी गर्ल बबली की, जो पांच प्रयास में भी 10वीं की परीक्षा पास नहीं कर पाई है। उसके पिता बॉडी बिल्डर्स को ट्रेनिंग देते हैं। बबली भी फिजिकली स्ट्रॉन्ग है। जमकर परांठे और रोटी खाती है। लस्सी का बड़ा गिलास भी एक बार में पूरा गटक जाती है। गांव में एक शादी में उसकी मुलाकात अपनी स्कूल टीचर के बेटे विराज से होती है, जो दिल्ली में जॉब करता है। बबली को तुरंत विराज पर क्रश हो जाता है। वह उसके पास दिल्ली जाने के लिए तिकड़म लगाना शुरू करती है। इधर, उसके माता-पिता उसकी शादी के लिए लड़का देखने में जुटे हैं। इस बीच, बबली को दिल्ली के नाइट क्लब में बाउंसर की जॉब का पता चलता है और वह अपनी चालबाजी से पेरेंट्स को इस नौकरी के लिए मना लेती है...।
तमन्ना भाटिया ने 'बबली' का किरदार निभाने के लिए अच्छी मेहनत की है। हालांकि उनका चरित्र चित्रण कमजोर लेखन का शिकार है। बबली का दिल्ली जाने का जो उद्देश्य है, वही पूरी फिल्म को कमजोर बना देता है। भावनात्मक दृश्य कनेक्ट नहीं कर पाते। सौरभ शुक्ला हमेशा की तरह भरोसेमंद हैं। साहिल वैद का काम ठीक-ठाक है, पर उनका किरदार एक दायरे में सीमित है। अभिषेक बजाज सभ्य हैं। अश्विनी कालसेकर का कैमियो अच्छा है। सुप्रिया शुक्ला, प्रियम साहा, यामिनी दास, सानंद वर्मा, राजेश खेरा और अन्य सपोर्टिंग कास्ट ओके है। बहरहाल, 'बबली बाउंसर' में आइडिया रूपी अच्छा 'बीज' प्रॉपर खाद-पानी और देखभाल के अभाव में 'फल' देने वाला 'पेड़' नहीं बन पाया। यह मधुर की कमजोर और नीरस पेशकश है, जो शुरू होने के थोड़ी देर बाद ही पकाने लगती है।
Published on:
23 Sept 2022 08:27 pm
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