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Doctor’s Day: बेजुबानों के लिए ‘भगवान’ हैं ये डॉक्टर, इनका सेवाभाव जानकर आप भी करेंगे ‘सैल्यूट’

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जयपुर

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Nidhi Mishra

Jul 01, 2018

National Doctors Day 2018

जोधपुर/जयपुर। ''अपने सुख-साधन जुटाने में लगी है पूरी दुनिया, जरा उनका हाल पूछो जो बेजुबां कह भी नहीं सकते...।'' किसी शायर की ये पंक्तियां बेजुबां के मसीहा डॉ. श्रवण सिंह राठौड़ पर बिल्कुल सटीक बैठती हैं। जो पिछले कई सालों से उन बेजुबानों की सेवा में दिन-रात एक किए रहते हैं, जो कह कर अपनी परेशानी बयां नहीं कर सकते। जिन्हें देख कर सभ्य समाज का मुखौटा लगाए लोग अक्सर मुंह भी फेर लेते हैं। हजारों की संख्या में जंगल में कुंलाचें भरते चिंकारा हों या रंग बिरंगे पंखों के फैलाव से मन हर्षाने वाले मोर... जंगल के खूंखार शिकारी जानवर जैसे पैंथर, लकड़बग्घा या सियार हों या फिर खेतों को नुकसान पहुंचाने वाली नीलगाय ही क्यों ना हो... इन सबके लिए डॉ. राठौड़ किसी मसीहा से कम नहीं हैं।


इनके ममतामयी स्पर्श से हिंसक जानवर भी दुम हिलाते हुए उनके हाथ पैरों को चाटकर आभार प्रदर्शित करते हैं। पैंथर, लॉयन, चिंकारे भी अपना सखा और पालनहार की तरह आवाज सुनकर उनका सान्निध्य पाने और स्पर्श को लालायित रहते हैं।

दूर से ही उनकी आवाज सुनकर और ममत्व की खुशबू पाते ही अठखेलियां करने लगते हैं। वो मारवाड़ की एकमात्र शख्सियत डॉ. श्रवणसिंह राठौड़ है, जो पिछले नौ वर्षों में समूचे मारवाड़ के जंगलों में रहने वाले हिंसक जानवरों व सड़क दुर्घटनाओं में गंभीर घायल वन्यजीवों के लिए मसीहा साबित हुए हैं।

उम्मेद उद्यान में संचालित रेस्क्यू सेंटर में विगत वर्षों में मारवाड़ संभाग के विभिन्न जिलों में 7 हजार से अधिक घायल वन्यजीवों की चिकित्सा कर उनमें से 35 प्रतिशत को नया जीवन प्रदान किया है। इतना ही नहीं जोधपुर शहर सहित मारवाड़ व थार के विभिन्न रिहायशी क्षेत्रों में पहुंचे हिंसक पैंथरों को भी ग्रामीणों से सुरक्षित बचाकर उन्हें प्राकृतवास में छोड़ने का अनूठा उदाहरण पेश किया है। वे नन्हें घायल छैनों (चिंकारों व हरिणों के बच्चों) का खास तौर पर ख्याल रखते हैं। डॉक्टर्स डे पर आइए जानें इन्हीं की कहानी...


जिले के शेरगढ़ तहसील के गांव केतू में ठाकुर भूरसिंह के घर जन्मे डॉ. राठौड़ ने घायल वन्यजीवों को बचाने के लिए फॉरेस्ट गार्ड को प्राथमिक चिकित्सा प्रशिक्षण देने के बाद की एक रेस्क्यू टीम भी तैयार की है। डॉ. राठौड़ लीग फॉर पैस्टोरल पीपल जर्मनी, लोक हित पशुपालक संस्थान सादड़ी, गोगादेव समाज हितकारिणी संस्थान शेखाला, यूथ अरण्य संस्थान से भी जुड़े हैं।

मरीजों का बड़ा दायरा

सड़क दुर्घटनाओं, खेतों की कंटीली बाड़ और कुत्तों की जद में आने से प्रतिदिन औसतन दो से तीन घायल वन्यजीवों को रेस्क्यू सेंटर में लाया जाता है। वर्ष 2007 से वर्ष 2015 तक 4 हजार 379 गंभीर घायल वन्यजीवों को रेस्क्यू सेंटर लाया गया। इनमें वर्ष 2007 में 235, 2008 में 370, 2009 में 425, 2010 में 490, 2011 में 490, 2011 मे 480, 2012 में 506, 2013 में 518, 2014 में 575 एवं 2015 में 780 गंभीर घायल वन्यजीवों को उम्मेद उद्यान स्थित वन्यजीव चिकित्सालय में लाया गया।

करीब 95 प्रतिशत मामले सड़क दुर्घटनाओं, खेतों की कंटीली बाड़ और कुत्तों की जद में आने से गंभीर घायल हुए मामले थे। घायल वन्यजीवों में पैंथर, लकड़बग्घा, सियार, चिंकारा, काले हरिण, पाटागोह, कछुए, नीलगाय, जंगली खरगोश, बंदर, लंगूर तथा प्रवासी व जलीय पक्षी शामिल हैं।

इनमें 35 से 40 प्रतिशत को बचाने के बाद पुन: प्राकृतवास में छोड़ा गया। बारिश के मौसम में नमभूमि पर दौड़ने में असमर्थ चिंकारों व हरिणों पर कुत्तों के हमले के मामले में घायलों की संख्या सर्वाधिक है।

उस्ताद को शिफ्ट करने व ठीक करने में योगदान

सज्जनगढ़ बॉयोलॉजिकल पार्क में बीमार बाघ उस्ताद याने टी-24 टाइगर को भी स्वस्थ करने में डॉ. श्रवणसिंह राठौड़ का महत्वपूर्ण योगदान रहा। उसे रणथम्बौर से शिफ्ट भी डॉ. राठौड़ ने ही किया था। उस्ताद बीमार होने के बाद जोधपुर से 28 नवम्बर 2015 को डॉ. राठौड़ को खास तौर पर उदयपुर बुलाया गया। डॉ. राठौड़ के साथ चिकित्सकों की टीम ने उस्ताद की जांच कर रिपोर्ट दी थी।

दस पैंथरों को सुरक्षित पकड़ चुके हैं राठौड़

वन्यजीव चिकित्सक डॉ. श्रवणसिंह राठौड़ ने बताया कि हर रेस्क्यू ऑपरेशन रोमांचपूर्ण, जोखिमपूर्ण व यादगार रहा। आश्चर्य की बात तो यह है कि पकड़े गए सभी पैंथर नर थे। कई बार भूखे प्यासे होने के साथ पैंथर नई टेरेटरी की तलाश में प्राकृतवास छोड़ कर भटकने से रिहायशी क्षेत्रों में जा पहुंचते हैं और गांव वाले पीट—पीट कर मार डालते हैं। रेस्क्यू ऑपरेशन में हमारा दायित्व पैंथर को बचाने के साथ पब्लिक को भी बचाना है।

पत्रिका से बातचीत में बताया कि सीजेडए नियमों के तहत रेस्क्यू सेंटर में ठीक होने वाले वन्यजीवों को पुन: जंगल में स्वतंत्र विचरण के लिए छोड़ते समय वन्यजीवों से बिछोह की वेदना के साथ जो खुशी मिलती है उसे बयां नहीं किया जा सकता। सूखे कुओं में गिरने वाले रोजड़ों और पैंथर को जीवित बाहर निकालना काफी रोमांचक रहा है।

कहां-कहां पकड़े जीवित पैंथर

1.जोधपुर शहर के औद्योगिक क्षेत्र स्थित ग्वारगम की फैक्ट्री में 29 जनवरी 2010 को
2. जैतारण तहसील के बर घाट में 28 जनवरी 2010
3.पाली जिले के आईजीपी की ढाणी में 24 दिसम्बर 2011 को
4. पाली जिले के नेतड़ा गोशाला के पास 31 दिसम्बर 2011
5. पाली जिले के नाणा के पास 17 फरवरी 2012 को पैंथर शावक
6.जोधपुर शहर के निकट विनायकिया में 27 फरवरी 2012 को
7.बीकानेर के कंवरसैन कैनाल क्षेत्र में 2 अक्टूबर 2014 को
8. जालोर जिले के रानीवाड़ा तहसील के कुड़ा पांजला में 12 जनवरी 2015 को
9. धवा क्षेत्र में 16 अप्रेल को 2015 को
10. सिरोही के शिवगंज रिहायशी क्षेत्र से गंभीर घायल-20 जुलाई 2015 को

मृत्यु दर कम करने का प्रयास

रेस्क्यू सेंटर में गंभीर घायल वन्यजीवों को बचाने के करीब 8 हजार मामलों में अब तक करीब 35 प्रतिशत ही सफलता मिली है। घायलों की मृत्यु दर को कम करने के लिए देश-विदेश के वन्यजीव व पक्षी विशेषज्ञों की भी सेवाएं लेने का प्रयास किया जा रहा है। -डॉ. श्रवणसिंह राठौड़, चिकित्सक वन्यजीव चिकित्सालय

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