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प्रो-कबड्डी से नाखुश हैं वो, जो कभी थे कबड्डी के सरताज, आज अपनी पहचान को ही हैं मोहताज

लोग जर्सी के नंबरों से खिलाडिय़ों को पहचानते थे और शर्त भी लगाते थे...

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जयपुर

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Dinesh Saini

Oct 07, 2017

Kabaddi

जयपुर। गुलाबी शहर में इन दिनों भले ही प्रो कबड्डी लीग में खेल रही पिंक पैंथर्स की टीम का चर्चा है। शहर और प्रशासन ने 60 के दशक में कबड्डी के मैदान में हूतूतू और कबड्डी-कबड्डी की आवाजों के बीच लोगों की तालियां बटोरने वाले कबड्डी के खिलाडिय़ों को भुला चुका है। किशनपोल बाजार में अजायबघर के रास्ते में बने महावीर पार्क में होने वाले नेहरु मेमोरियल टूर्नामेंट हो या सोढाला में आयोजित होने वाला शास्त्री टूर्नामेंट... लोगों के जेहन में उस वक्त के कबड्डी खिलाडिय़ों के दांव-पेंच भले ही ताजा न हों लेकिन ये खिलाड़ी आज भी उन मैचों को अपने दिलों में जिंदा रखे हैं।

प्रो कबड्डी में आज भले ही पैसा बरस रहा हो लेकिन इन खिलाडिय़ों को इस बात का मलाल है कि अगर प्रशासन और खेल विभाग थोड़ी कोशिश करता तो उन्हें भी जायज़ मुकाम मिल सकता था।

ज्यादातर गुमनाम
कभी लोगों के रियल हीरो रहे ये खिलाड़ी आज गुमनामी की जिंदगी जी रहे हैं। 60 और 70 के दशक में भूर सिंह, मोहम्मद रफीक, दुलीचंद जैन, कल्याण चौधरी, गोपाल सिंह, देवा जैन, प्रेम सागर, मनमोहन, जगदीश बागड़ा, रूपनारायण, हरिराम यादव, अलाउद्दीन, मोहन, रामकिशन, शंकरलाल, रमेश सिंह और विजय पूनिया जैसे नाम आज भी बुजुर्गों की जुबान पर हैं। इनमें से अलाउद्दीन, मोहन जैसे कबड्डी प्लेयर अब नहीं रहे। विजय पूनिया के लिए कहा जाता था कि वो जिसे पकड़ लेते थे वो तिल भर भी नहीं हिल पाता था। ऐसे ही रेडर के रूप में भूर सिंह का नाम बहुत इज्जत से लिया जाता था।

जर्सी नंबर से पहचाने जाते थे खिलाड़ी
अपने ज़माने के मशहूर रेडर और कबड्डी खिलाड़ी भूर सिंह बताते हैं कि जब 1965 के करीब उन्होंने कबड्डी क्लब से जुडक़र टूर्नामेंट में हिस्सा लेना शुरू किया था उस वक्त तक जयपुर में 8 से 10 बड़े क्लब थे जिनका कबड्डी में डंका बजता था। खासकर महावीर क्लब, आजाद नवयुवक मण्डल, राजस्थान यूथ एसोसिएशन और एनबीसी की टीम का दबदबा देखते ही बनता था। लोगों की हूंटिंग के बीच पालों के बीच शरीरिक चुस्ती-स्फूर्ति और ताकत के साथ कारगर रणनीति के बीच हार-जीत का फैसला देखने लोगों का हुजूम छतों पर उमड़ आया करता।

हर टीम के दो से तीन स्टार खिलाड़ी हुआ करते थे। हर एक की अपनी खासियत और अपना एक खास नाम होता था। लोग जर्सी के नंबरों से खिलाडिय़ों को पहचानते थे और शर्त भी लगाते थे।

प्रो-कबड्डी से नाखुश
इन पुराने खिलाडिय़ों का कहना है कि प्रो-कबड्डी लीग से इस देसी खेल को बूस्ट करने में मदद तो मिली है लेकिन जयपुर के कबड्डी प्लेयर्स को इससे ज्यादा फायदा नहीं हो रहा। अच्छे कोच और नए टैलेंट के आगे न आने से टीम में स्थानीय खिलाड़ी के नाम पर केवल नवीन गौतम ही शामिल हैं। वो भी अभी तक एक्स्ट्रा में ही हैं। वहीं ज्यादातर खिलाड़ी बाहर के हैं।