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मैं केवल देह हूं

नारी के हालात को चित्रित कर रही हैं ये रचनाएं

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मैं केवल देह हूं

मैं केवल देह हूं

कविताएं
राजेन्द्र जोशी

वह कौन चित्रकार है
उतारता है मेरे जैसा चेहरा
मैं वह नहीं हूं
किसी और की देह जो हूं
चरित्र होती हूं
चेहरे में

नहीं जानती मैं
किसकी भूमिका में हूं
नहीं बदलती देह
बदल जाता चेहरा
पल भर में मेरा

सचमुच ईमान नहीं बेचती देह
मर जाती
चेहरा बदलती
देह कहां बदली है मेरी

उतारता है वह मेरे चित्र
तो क्या हुआ
देह बनी रहती
उसके बनाए चित्र में
दिशाओं में बदल जाते
चित्र के चेहरे
बनाता है मेरे जैसा चेहरा ।

गहरे घाव
=======
भूल जाती हो
अपना दर्द
कहां छुपा लेती हो
मुझसे मिलते ही

प्रायश्चित नहीं करने देती
घावों को छुपाकर
जख्म के बाद
और गहरे हो जाएंगे यह घाव

क्षमा कर देती हो
प्रत्येक घाव के उद्घाटन पर
वेदना जो तुमने भोगी
घावों के साथ

दिखाती क्यों नहीं क्रोध
प्रतिशोध नहीं दिखाती

तुम्हारा दर्द
हरना चाहता हूं
यदि समझ सको मेरी भी पीड़ा
जिन्हें छुपा कर रखती हो तुम

अब मेरे रोम रोम में बसी है
तुम्हारी पीड़ा

भोग्या हूं
======
नारी हूं! भोग्या हूं
पीड़ा के साथ रहना
नियति है मेरी
मेरा अपना क्या है

यह घाव ही तो है
घृणा तो नहीं
मैं पांचाली नहीं
राधा नहीं
सीता नहीं
पर पीड़ा में कमी नहीं

जीना होता है पीना होता है
मुझे अकेले में
यही सार है
मेरे होने का...


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