
फिसल रहा है हाथों से वक्त
कविताएं
उदयसिंह
फिसल रहा है हाथों से वक्त
बेहिसाब, बेलगाम
आने वाले कल में इसका कोई मुकाम तो होगा
इस पल है ढेरों चाहतें मेरी लेकर आने वाले कल को
आने वाले पल में इनका कुछ अंजाम तो होगा।
सुबह की महक से शाम तक की दीवानगी
दिन में सूरज का इम्तिहान तो होगा
हर घड़ी नजर घड़ी पर और बैचैनी सी है
मंजिलों को पाने की
इस अन्नंत दौड़ में ठहराव का
कोई इंतजाम तो होगा।
कुछ रिश्तों के नाम है
जमाने में पहचान के लिए
जो पहचान ले बिना किसी पहचान के तुम्हें
उस रिश्ते का कोई नाम तो होगा।
ये दिल है कि पा लेना चाहे बहुत कुछ
दिमाग वालों के जहां में इसका भी
कोई तो काम होगा
दिल दिमाग की जंग और फैसला
फैसला कुछ ऐसा
कि खुलकर आजादी को मना लें,
जी भर जी यहां और मौत का भी जश्न मना ले
जब जिंदगी की शाम आए और
रोशनी का दीपक कुछ यूं जल जाए
अंधेरा बाहर हो कितना भी गहरा
दिल के अंदर रोशनी का इंतजाम तो होगा।
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मंजिल, रास्ते और जिंदगी
नादां है वो जो मंजिलों पर नजरें टिकाए हुए हैं
उन्हें क्या मालूम रास्तों ने क्या गुल खिलाए हुए हैं
जिंदगी नाम है जिंदादिली से जीने का
फिर भी वो लोग बहुत कुछ पाने की रट लगाए हुए हैं
कभी ख़ुशी कभी गम जिंदगी के साए हैं
फिर भी वो हमेशा खुश रहने की जिद लगाए हुए हैं
यहां दिल सिर्फ भावनाओं से जीते जा सकते हैं
फिर भी लोग यहां तोहफों की प्रथा चलाए हुए हैं
मानो तो सभी अपने हैं वरना सभी पराए हैं
फिर भी न जाने क्यों लोग
अपने पराए का भेद बनाये हुए हैं
कहते हैं सब मालूम है कि जिंदगी को कैसे जीया जाए
फिर भी दिखावे के भ्रम में भरमाए हुए हैं
एक ख़ुशी की चाहत में इतने पगलाए हुए हैं
कि झाूठ बोलते बोलते खुद को झाुठलाए हुए हैं
भरे बाजार में बोलना आता है यहां लोगों को
पर खुद से नजरें मिलाने पर घबराए हुए हैं
यह सब देख समझा में नहीं आता कि जिंदगी क्या है
इसे जीने के लिए यहां आए हंै या दिखाने के लिए आए हुए हैं
नादान है वो जो मंजिलों पर नजरें टिकाए हुए हैं
उन्हें क्या मालूम रास्तों ने क्या गुल खिलाए हुए हैं
कवि मोटिवेशनल स्पीकर हैं
Published on:
08 Aug 2020 01:24 pm
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