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जयपुर। भगवान कृष्ण के जन्मोत्सव को लेकर तैयारियां चल रही है। हर साल की तरह इस बार भी जन्माष्टमी रक्षाबंधन के बाद मनाई जाएगी। कान्हा के जन्म को लेकर श्रद्धालुओं में संशय है। दो या फिर तीन सितंबर को जन्माष्टमी का व्रत रखने को लेकर लोग उलझन में हैं। राधा-गोविंद की नगरी जयपुर में भी कृष्ण जन्मोत्सव परवान पर है। भगवान श्रीकृष्ण की लीलाएं गोविंद देवजी मंदिर में रंग बिखेर रही है। बता दें कि जन्माष्टमी का पर्व भाद्रपद में कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाई जाता है।
जन्मोत्सव के दिन ऐसे करें भगवान कृष्ण की पूजा
कृष्ण जन्माष्टमी के दिन सबसे पहले मंदिर को साफ करें और गंगाजल से पवित्र कर लेवें। साथ ही मंदिर को फूलों की महक और रोशनी से गुलजार करें। इसके बाद मंदिर में इत्र का छिड़काव कर वातावरण को सुगंधमय बना लेवें। अब बाल कृष्ण को पालने में विराजमान करें। भगवान को स्नान-भोग लगाने के साथ ही भजन कीर्तन का दौर भी शुरू कर दें। इसके चलते मंदिर परिसर का माहौल पूरी तरह से भक्तिमय बनाएं। रात्रि के 12बजे प्रभु बाल कृष्ण के जन्म के बाद कान्हा को स्नान कराएं और सुंदर वस्त्र धारण कर श्रृंगार करें।
ये हैं व्रत को मानने के आधार
दरअसल, हिंदू धर्म में दो तरह की तिथियों को मानने वाले लोग रहते हैं। इनमें से एक उदया तीथी है। कुछ लोग उदया तिथी को नहीं मानते हैं तो कुछ इसे मानते हैं। इस बार दो सितम्बर को कृष्ण भगवान का जन्मोत्सव धूमधाम से मनाया जाएगा। लेकिन कई लोग इस त्योहार को तीन सितंबर को भी मनाएंगे। व्रत के दिन स्नान आदि से निवृत्त होकर रोहिणी नक्षत्र व अष्टमी के दिन व्रत का पारण किया जाएगा।
दो तिथियों में बंटा व्रत
ज्योतिषाचार्यों के अनुसार जन्माष्टमी का व्रत इस बार दो दिनों का है। साधु सन्यासी और ग्राहस्थ धर्म में रहने वाले लोग व्रत भी अलग-अलग तिथी को रखेंगे। परिवार में रहने वाले लोग स्मार्त की श्रेणी में आते हैं। वैष्ण में यानि वैष्ण सम्प्रदाय को मानने वाले लोग आते हैं। इसके चलते व्रत भी स्मार्त और वैष्णव के हिस्सों में बांटा गया है। 2 सितंबर के दिन स्मार्त यानि परिवार में रहने वाले लोग व्रत रखेंगे। वहीं 3 सितंबर को जन्माष्टमी का व्रत वैष्ण धर्म के लोग रखकर भगवान की पूजा करेंगे।