
जयपुर। जो शिक्षक खुद पीएचडी नहीं हैं, वे दूसरों की पीएचडी को नौकरी के लिए प्रमाणित कर रहे हैं। राजस्थान विश्वविद्यालय के कॉमर्स फैकल्टी में कुछ ऐसी ही अजीब स्थिति बनी हुई है। फैकल्टी ऑफ कॉमर्स के डीन खुद पीएचडी नहीं हैं। जबकि वर्ष २००९ से पहले विभाग से पीएचडी करने वाले छात्रों की उपाधि को वे वैध कर नौकरी के लिए सर्टिफिकेट दे रहे हैं। ये सर्टिफिकेट विवि के असिस्टेंट प्रोफसर में भी लगाए जाएंगे।
यह है मामला
विवि में फैकल्टी ऑफ कॉमर्स के डीन विनय कुमार शर्मा सांभर लेक में सरकारी कॉलेज के प्रिंसीपल हैं। विनय खुद पीएचडी नहीं हैं। उन्हें ३१ अक्टूबर २०१७ को विवि ने फैकल्टी ऑफ कॉमर्स के डीन पद पर नियुक्त किया। विनय अब विवि में वर्ष २००९ से पीएचडी के लिए नामांकित हो चुके छात्रों की पीएचडी को प्रमाणित कर सर्टिफिकेट दे रहे हैं। गौरतलब है कि सीनियर प्रोफेसर होने के बावजूद विनय की नियुक्ति डीन पद पर करने को लेकर भी सवाल उठे थे।
इस नियम से बनी है स्थिति
विवि और देश के दूसरे कई विश्वविद्यालयों में असिस्टेंट प्रोफेसर की भर्ती हो रही हैं। यूजीसी के नियमानुसार नेट (राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा) पास अभ्यर्थी ही असिस्टेंट प्रोफेसर की भर्ती के लिए पात्र है। मगर जो अभ्यर्थियों ने वर्ष २००९ से पहले पीएचडी के लिए रजिस्टर हैं, वे नेट पास किए बिना भी असिस्टेंट प्रोफेसर के लिए पात्र हैं। उन्हें संबंधित विवि के संबंधित विभाग के डीन से 'नॉन नेट एक्जम्पशन सर्टिफिकेटÓ लेना होता है। सर्टिफिकेट में अभ्यर्थी की पीएचडी को प्रमाणित किया जाता है।
भर्ती चयन समिति में नहीं शामिल
प्रोफेसर व पीएचडी नहीं होने के कारण इन्हें विवि की भर्ती चयन समिति से भी बाहर रखा गया है। डीन के स्थान पर कुलपति ने सेवानिवृत्त प्रोफेसर को समिति में शामिल कर एसोसिएट प्रोफेसर की स्क्रूटनी की। जल्द ही होने वाले असिस्टेंट प्रोफेसर के इंटरव्यू में चयन समिति से भी बाहर रखा जाएगा। मामले पर विनय कुमार से बातचीत की तो उन्होंने बात करने से मना कर दिया।
Published on:
07 May 2018 07:51 pm
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