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ईद मीलादुन्ननबी : पैगंबर मुहम्मद के जन्म का महत्व

'रबीउल अव्वल' इस्लामी केलेण्डर का तीसरा महीना है। यह महीना इस लिए विशेष है कि इस महीने में अन्तिम ईश-दूत हजरत मुहम्मद सल्ल.* का जन्म हुआ था। सही तारीख के बारे में इतिहासकारों के बीच मतभेद है परन्तु अधिकांशत: मान्यता यही है कि वे रबीउल अव्वल की 12 तारीख को पैदा हुए थे, यद्यपि इस में अधिकांश एकमत हैं कि उनकी मृत्यु 12 रबीउल अव्वल को हुई थी।

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Eid Milad-Un-Nabi

Eid Milad-Un-Nabi

'रबीउल अव्वल' इस्लामी केलेण्डर का तीसरा महीना है। यह महीना इस लिए विशेष है कि इस महीने में अन्तिम ईश-दूत हजरत मुहम्मद सल्ल.* का जन्म हुआ था। सही तारीख के बारे में इतिहासकारों के बीच मतभेद है परन्तु अधिकांशत: मान्यता यही है कि वे रबीउल अव्वल की 12 तारीख को पैदा हुए थे, यद्यपि इस में अधिकांश एकमत हैं कि उनकी मृत्यु 12 रबीउल अव्वल को हुई थी।12 रबीउल अव्वल को पूरी दुनिया में ईद मीलादुन्ननबी (Eid Milad-Un-Nabi) (ईश-दूत के जन्म की ख़ुशी) के रूप में मनाया जाता है। इस अवसर पर ईश-दूत की शिक्षाओं और उनके जीवन के विभिन्न पहलुओं को याद किया जाता है तथा इसके लिए विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

अन्तिम ईश-दूत हजरत मुहम्मद सल्ल.(Prophet Muhammad) को भ्रान्तिवश मुसलमानों का धर्मगुरु और इस्लाम का संस्थापक समझा जाता है। परन्तु वे सारी मानवता के कल्याण के लिए संसार में आए थे और ईश्वर की ओर से मानव मात्र के मार्गदर्शन के लिए नियुक्त किए गए दूतों की अन्तिम कड़ी थे। ईश्वर की ओर से सबसे पहले मनुष्य आदम (उन पर शान्ति हो) को ही पहला ईश-दूत नियुक्त किया गया। उनके बाद जहां जहां मनुष्य बसते गए हर दौर में ईश्वर ने उन्ही में से एक ईश-दूत नियुक्त किया। इनमें से कई का नाम हम सुनते रहते हैं, जैसे नूह, इबराहीम, मूसा, ईसा (उन सभी पर शान्ति हो) आदि। हजऱत मुहम्मद सल्ल. इसी श्रंखला की अन्तिम कड़ी हैं।

ईश-दूतों को नबी, रसूल और पैगम्बर भी कहा जाता है। कुरआन के अनुसार प्रत्येक मानव समुदाय में ईश-दूत भेजे गए थे जिन्हें विभिन्न भाषाओं में विभिन्न नामों से जाना जाता है। भारतीय धर्म ग्रंथों में उन्हें ऋषि, मुनि, भी कहा गया है और कहीं अवतार भी। ये सभी मनुष्य थे जिन्हें ईश्वर ने अपना संदेश मनुष्यों तक पहुंचाने और स्वयं आदर्श बन कर उन शिक्षाओं के अनुसार आदर्श समाज की स्थापना करने के लिए चुना था। उन्होंने अपना पूरा जीवन ईश्वरीय मार्गदर्शन को लोगों तक पहुँचाने और उसके अनुसार एक आदर्श मानव-समाज की स्थापना के लिए समर्पित किया।

ईश-दूत क्यों आते थे?
ईश्वर ने मनुष्य को बनाया, उसकी सभी आवश्यकताओं की पूर्ति का प्रबन्ध किया। उसे ज्ञान दिया फिर बुद्धि एवं विवेक प्रदान किया। धरती को रहने के लिए उपयुक्त बनाया, आकाश से पानी बरसाया, धरती से वनस्पति उगाई, भिन्न-भिन्न प्रकार के पशु-पक्षी एवं समुद्री जीव उत्पन्न किये जिनसे मनुष्य आपने जीवन के लिए बहुत सी उपयोगी वस्तुएं प्राप्त करता है। धरती, जल और अब तो आकाश में भी आवागमन को सम्भव किया। अपने ज्ञान, बुद्धि एवं विवेक का इस्तैमाल कर के मनुष्य ने अनेक आविश्कार किये जिनसे उसका जीवन और भी सुगम हो गया। परन्तु अपनी बुद्धि से वह यह नहीं जान सकता था कि वह कौन है? कहाँ से आया है? उसे कहाँ जाना है? उसके धरती पर रहने का उद्देश्य क्या है? क्या उसे किसी ने बनाया है?

यदि हाँ, तो उस रचयिता से उसका क्या सम्बन्ध है? मृत्यु के बाद वह कहाँ जाएगा और उसके साथ क्या होगा? आदि। इन सब प्रश्नों के उत्तर वही दे सकता था जो उसे उसके जन्म से पहले भी जानता हो, मृत्यु के बाद भी और जो स्वयं काल से परे हो। स्पष्ट है कि वह केवल ईश्वर ही है जो इन प्रश्नों के उत्तर दे सकता है। अत: अत्यंत दयालु ईश्वर ने मनुष्यों पर कृपा करके उन्ही में से अपने दूत नियुक्त किये और उन्हें परोक्ष का वह ज्ञान प्रदान किया जिसे वह स्वयं प्राप्त करने में अक्षम था। इन ईश-दूतों ने ईश्वरीय मार्गदर्शन के अनुसार एक आदर्श समाज की स्थापना की जिसमें सभी के लिये समान न्याय था। मनुष्य को जीने का ढंग सिखाया।

ईश्वर का संदेश दिया और बताया कि इस सृष्टि का एक रचयिता है जो सर्व शक्तिमान है, सब कुछ जानने वाला है, वही हमारी और हर प्राणी की आवश्यकताएं पूरी करता है, वही जीवन देता है, वही मृत्यु देता है और मरने के बाद सभी को उसी की ओर लौटना है। उन्होंने बताया कि यह संसार स्थायी नहीं है। इसे ईश्वर ने एक विशेष योजना के तहत बनाया है अत: यह पूरी दुनिया एक दिन नष्ट हो जाएगी, सारे मनुष्य और जानदार मर जाएंगे।

फिर ईश्वर सारे मनुष्यों को पुन: जीवित करेगा और उनके कर्मों का हिसाब लेगा। जो ईश्वरीय विधान के अनुसार सत्य मार्ग पर जीवन बिता कर आए होंगे उन्हें स्वर्ग में स्थान दिया जाएगा जहाँ वे सदैव रहेंगे और अनन्त सुख पाएंगे। परन्तु जो लोग ईश्वर की अवज्ञा कर असत्य मार्ग पर चले होंगे वे पापी ठहराए जाएंगे और उन्हें अनन्त दु:ख के स्थान नर्क में रखा जाएगा।

अन्तिम ईश-दूत से पहले अरब का हाल
जब अन्तिम ईश-दूत सल्ल. का जन्म हुआ, अरब का बहुत बुरा हाल था। चारों ओर अराजकता का माहौल था, जो शक्तिशाली होता उसी का राज चलता था। क़बीले एक दूसरे पर हमले करते और हारने वाले क़बीले के लोगों को दास बना लेते। इतनी सी बात पर पीढिय़ों तक जंग चलती थी कि एक सरदार के ऊँट ने दूसरे के ऊँट से पहले पानी पी लिया, और दोनों ओर से सैंकड़ों लोग मारे जाते। न्याय मालदारों और बलशाली लोगों का दास था। यदि किसी बड़े आदमी ने कोई अपराध किया होता तो उसे हल्की सज़ा दी जाती या छोड़ दिया जाता, और यदि अपराधी कोई साधारण व्यक्ति होता तो उसे कड़ी सज़ा दी जाती।

महिलाओं की स्थिति भी दयनीय थी, उन्हें सम्पत्ति समझा जाता था। जब किसी व्यक्ति का देहान्त हो जाता तो उसकी जायदाद के साथ ही उसकी पत्नियाँ भी वारिसों में बांट दी जाती थीं। बेटी का पैदा होना शर्म की बात समझी जाती थी और अधिकतर उसे पैदा होते ही जीवित ज़मीन में गाड़ दिया जाता। ब्याज का चलन आम था। साहूकार गऱीब व्यक्तियों को उधार देते और जीवन भर उनका ख़ून चूसते। अरब लोग शराब के ऐसे रसिया थे कि बच्चे, बूढ़े, जवान, स्त्री, पुरुष सभी शराब पीते थे।

हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का जन्म
हजरत मुहम्मद सल्ल. का जन्म मक्का शहर के प्रतिष्ठित घराने क़ुरैश में हुआ। जन्म से पहले ही उनके पिता का देहान्त हो गया। पहले दादा अब्दुल मुत्तलिब और फिर चचा अबू तालिब ने उनका लालन पालन किया। वे बचपन से ही धीर, गंभीर शान्त चित्त और बुद्धिमान थे। बड़े हुए तो अपनी सच्चाई और अमानतदारी के लिए प्रसिद्ध हुए। लोग उन्हें सादिक (सत्यवादी) और अमीन (अमानतदार) पुकारने लगे। कबीलों को आपस में लड़ते देखते और उन्हें तरह तरह की बुराइयों में लिप्त देखते तो बहुत चिन्तित होते। इसी हाल में वे चालीस वर्ष के हो गए। चिंतन मनन करने के लिए हिरा नामक गुफ़ा में जा बैठते।

वहीं जिब्रईल नामक एक फ़रिश्ते के माध्यम से ईश्वर ने उन्हें संदेश दिया कि आपको इस सृष्टि के रचयिता ने अपना दूत बनाया है और अब आपका कत्र्तव्य है कि आप इस संदेश को बिना किसी कमी-बेशी लोगों तक पहुँचाएं और इसके अनुसार एक आदर्श जीवन बिताएं। ईश्वर ने उन पर कवित्र क़ुरआन नामक ग्रंथ अवतरित किया जिसमें 23 वर्षों में उतारे गए ईश्वर के आदेश लिखे गए हैं। वे स्वयं लिखना-पढऩा नहीं जानते थे अत: जब जब भी ईश्वर की ओर से कोई संदेश आता वे किसी लिखने वाले को बुला कर उसे लिखवा लेते। अत: कुरआन ठीक ठीक उसी रूप में है जिस रूप में वह अवतरित हुआ था।

ईश्वर ने स्वयं ही इस ग्रंथ की रक्षा का दायित्व लिया है अत: इसमें किसी भी प्रकार का फेर बदल होना असम्भव है। मक्का में ईश्वरीय संदेश का प्रचार करते हुए उन्हें और उनके साथियों को मक्का वासियों ने बहुत सताया और उन पर तरह तरह से अत्याचार किए। फिर वे ईश्वर के आदेश से मदीना चले गए। ईश-दूत के मदीना जाने की घटना को च्हिजरतज् कहा जाता है। इसी समय से चन्द्र आधारित हिजरी केलेण्डर का प्रारम्भ हुआ। मदीना के वासियों ने उनका खुले हृदय से स्वागत किया। उन्होंने मदीना में एक आदर्श राज्य की स्थापना की। परन्तु मक्का वासियों ने वहां भी उन्हें चैन से नहीं रहने दिया।

कई बार हमले किए गए, परन्तु बहुत कम संख्या-बल और बहुत कम युद्ध सामग्री और हथियारों के बावजूद उन्होंने सत्य और न्याय के दुश्मनों पर विजय प्राप्त की। हजरत मुहम्मद सल्ल. ने 13 साल मक्का में और लगभग 10 साल मदीना में ईश्वरीय संदेश का प्रचार किया। ईश्वरीय मार्गदर्शन के अनुरूप एक आदर्श समाज की स्थापना की। एक आदर्श राज्य की स्थापना की जिसमें हर व्यक्ति के साथ समान रूप से न्याय होता था और सभी के लिए प्रगति के समान अवसर उपलब्ध थे।

पड़ोसी कबीलों एवं देशों के साथ शान्ति संधियाँ कीं। न्याय पर आधारित अर्थ व्यवस्था कायम की, ब्याज का लेन-देन अवैध घोषित किया। शराब को निशेध किया, व्याभिचार के सभी रास्ते बन्द किए। नारी को सम्मानपूर्ण जीवन का अधिकार दिया, उसे स्वतंत्र रूप से सम्पत्ति रखने और अपना जीवन साथी चुनने का अधिकार दिया। मां के पैरों तले जन्नत (स्वर्ग) बताया, बेटी को जीने का अधिकार दिया और उसकी परवरिश करने पर स्वर्ग की शुभ सूचना दी। अकारण किसी भी मनुष्य की जान लेना ***** (अवैध) और जघन्य अपराध करार दिया।

मदीना में
मदीना में यहूदी बसते थे जो यह मानते थे कि ईश-दूत तो केवल उन्ही के वंश आ सकते हैं अत: उन्होंने हजरत मुहम्मद सल्ल. को ईश-दूत मानने से इनकार कर दिया और हर प्रकार से विरोध किया। फिर भी ईश-दूत ने उन पर भरोसा करते हुए उनके साथ सन्धियां कीं। परन्तु यहूदियों ने उन्हें धोखा दिया। मदीना और आस पास के ईसाई कबीलों के साथ भी संधियां की गईं। उन्हें न केवल पूर्ण सुरक्षा प्रदान की गई अपितु उन्हें सामान्य नागरिक के पूरे अधिकार दिए गए। यही नहीं उनके निजी धार्मिक कानूनों में किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं किया गया। सीना क्षेत्र के ईसाईयों को अभय-पत्र लिख कर दिया जिसमें स्पष्ट लिखा था कि उनके पादरियों एवं न्यायाधीशों को पदों से नहीं हटाया जाएगा। उनकी सम्पत्ति को कोई हानि नहीं पहुंचाई जाएगी। यदि कोई मुसलमान उनके चर्च से एक कील भी बिना अनुमति के ले गया तो वह ईश्वर और उसके दूत का शत्रु माना जाएगा।

रिश्तेदार और पड़ोसी के अधिकार
हजरत मुहम्मद सल्ल. को ईश्वर ने रिश्तों को जोडऩे का आदेश दिया और बताया कि रिश्तों को काटने वाला स्वर्ग में नहीं जाएगा। उन्होंने पड़ोसियों का सम्मान करने और अच्छा व्यवहार करने का आदेश दिया चाहे वे किसी भी धर्म को मानते हों। स्वयं भी अपने पड़ोसियों का बहुत ध्यान रखते और जब भी काई अच्छी चीज घर में बनती तो उसमें से कुछ पड़ोसियों के यहां अवश्य भेजते। कुरआन पड़ोसियों, माता-पिता, रिश्तेदारों तथा अजनबियों के साथ दयालुता और सम्मान के साथ व्यवहार करने की आवश्यकता पर जोर देता है। हजरत मुहम्मद सल्ल. ने कहा कि रिश्तों को काटने वाला स्वर्ग में नहीं जाएगा। उन्होंने रिश्तदारों का हक अदा करने का आदेश दिया चाहे वह किसी अन्य धर्म में आस्था रखता हो और चाहे वह तुम्हारे अधिकारों का हनन ही क्यों न करता हो। उन्होंने कहा कि एहसान (उत्तम व्यवहार) यह है कि तुम उसका भी हक अदा करो जो तुम्हें वंचित करे।

न्याय
एक बार ईश-दूत के सामने एक बड़े कबीले की फातिमा नामक महिला का मुकदमा लाया गया जिसने चोरी की थी। कई लोगों की ओर से सिफारिश आई कि इस महिला को छोड़ दिया जाए, क्योंकि यदि इसे दण्ड दिया गया तो विद्रोह हो सकता है। उन्होंने उत्तर दिया कि यदि इसके स्थान पर स्यवं मेरी बेटी फातिमा भी होती तो उसे भी वही दण्ड दिया जाता।

दूसरे खलीफा हजरत उमर (ईश्वर उन से राजी हो) के समय में एक यहूदी के पुत्र ने मिस्र के गवर्नर अम्र बिन आस के पुत्र के साथ घुड़-दोड़ की जिस में वह जीत गया। परन्तु गवर्नर के बेटे ने उसे कोड़े मारते हुए कहा कि 'मैं बड़े आदमी का बेटा हूं।'

हजरत उमर (ईश्वर उन से राजी हो) ने तुरन्त गवर्नर ओर उनके पुत्र को अपने दरबार में बुलाया और उनसे पूछा कि क्या यह मिस्रवासी सच कह रहा है? जब गवर्नर के पुत्र ने स्वीकार किया तो उन्होंने यहूदी पुत्र से कहा 'इसे उसी तरह कोड़े मारो जैसे इसने तुम्हों मारे थे।'

जब वह मिस्री अपना बदला ले चुका तो हजरत उमर (ईश्वर उन से राजी हो) ने उससे कहा कि जरा इसके पिता को भी कुछ कोड़े लगाओ जिसने इसका पालन गलत तरीक़े से किया है। परन्तु उसने जवाब दिया कि मैं अपना बदला ले चुका। तब हजरत उमर (ईश्वर उन से राजी हो) ने कहा 'ऐ अम्र इनकी मांओं ने तो इन्हें आजाद ही पैदा किया था, तुमने इन्हें कब से दास बना लिया?

युद्ध में शत्रुओं के साथ व्यवहार
हजरत मुहम्मद सल्ल. ने ईश्वर के निर्देशानुसार युद्ध और शान्ति के नियम बनाए। युद्ध में बूढ़ों, बच्चों, महिलाओं और जो लडऩे न आएं उन सब की हत्या को अवैध घोषित किया। जीते हुए प्रदेश के खेतों, पेड़-पौधों और सम्पत्ति को नष्ट करने से मना किया। युद्ध के प्रति पैगंबर मुहम्मद का दृष्टिकोण न्याय और मानवता का उदाहरण है। उन्होंने मुसलमानों को युद्धबंदियों के साथ मानवीय व्यवहार करने का निर्देश दिया, यहां तक कि पहला युद्ध जो बद्र के स्थान पर लड़ा गया था, के दौरान जब मक्का के कुछ लोग बन्दी बनाए गए तो उन्होंने उनके साथ नर्मी का व्यवहार करने का आदेश दिया। उन्होंने रात के समय उनके बंधन ढीले करवा दिए ताकि वे आराम से सो सकें, यद्यपि उनमें वे लोग थे जिन्होंने उन्हें सताया था और उनकी हत्या का षड्यंत्र किया था।

उस समय युद्ध बन्दियों को धन के बदले रिहा करने का चलन था। अत: उन्होंने उन्हें बन्दियों में से अधिकांश को उनके सम्बन्धियों द्वारा धन अदा करने पर छोड़ दिया। कुछ बन्दी ऐसे थे जिनके पास देने के लिए कुछ न था। ईश-दूत ने उनसे कहा कि तुम हमारे दस-दस बच्चों को लिखना-पढऩा सिखा दो तो तुम्हें छोड़ दिया जाएगा। अन्तिम ईश-दूत हजरत मुहम्मद सल्ल. का सम्पूर्ण जीवन एक आदर्श है। आज पूरी मानवता जिन संकटों से घिरी हुई है उनसे निकलने का एकमात्र मार्ग उनके आदर्श को अपनाने में ही है।