
- डॉ. श्रीगोपाल काबरा
पुरखों की हवेली
शेखावाटी के सेठ प्रसिद्ध थे। दिसावर में काम काज, व्यापार। कलकत्ता, मद्रास, मुम्बई, देश का कोई ऐसा बड़ा नगर नहीं था जहां शेखावाटी के सेठ नहीं थे। कर्मठ, जुबान के पक्के, उनकी पगड़ी की प्रतिष्ठा थी। रुक्का चलता था- कागज के टुकड़े पर लिखी रकम और सेठ के हस्ताक्षर, हुण्डी होती थी। प्रतिष्ठान - आफिस-गद्दी होती थी। गांव से कोई भी व्यक्ति चि_ी ले कर आता तो उसके रहने-खाने की व्यवस्था होती थी। उसके लिए काम या रोजगार का यथासंभव प्रयास होता था। गांव में हवेली होती थी। परिवार वहीं रहता था। हवेली से जुड़ा हर व्यक्ति परिवार का सदस्य होता था। जोसण मां, नायण काकी, मालण काकी, मणिहारण दादी। गांव के प्रति आस्था होती थी, लगाव होता था। गांव की बेटी अपनी बेटी होती थी। दूसरे गांव बरात गई है तो उस गांव में अपने गांव की ब्याही बेटी को न्योता जाता था। रिश्ते नाते व्यापक होते थे, उनमें अपनापन होता था।
गांव के रास्ते तीन व्यक्ति चल रहे थे। बड़ी हवेली को देख एक ने पूछा, 'आ हेली कुण की?' साथ वाले ने कहा,'बड़ा सेठ ......की। ' रास्ते चल रहे तीसरा व्यक्ति जो सेठ के परिवार के भाइयों में से एक थे, तुनक कर बोले 'ओ क्यां को बड़ो सेठ? ई सै पांच गुणा पिसा तो आज म्हारै कनै है।'
'खाली पीसा होणै से बड़ो कोनी हुवै। थारै खाता में एक पीसा की तो धर्मादा की कलम कोनी, बड़ा सेठ की आज भी एक आना की धर्मादा की कलम है। तू सेठ है तो थारा घर में है, नगर सेठ तो ओ ही है। पीसा पर कुंडली मारया बेठ्यो सांप हु'वै, सेठ नहीं।'
सेठाणा, सेठ के धर्मादे की कलम से आंका जाता था, परमार्थ करने की क्षमता से। धर्मार्थ खाते में जमा रकम को और किसी काम में लेना पाप माना जाता था। अपनी आस्था के अनुरूप प्याऊ, कुआं, धर्मशाला, गौशाला, स्कूल व गांव के किसी परमार्थ के काम में चंदे की कलम के रूप में लिया जाता था। किस सेठ की चंदे की कलम कितने की होगी, समाज के लोग तय करते थे। परमार्थ के लिए पैसा देना सेठ की स्वत:स्फूर्त सामाजिक निष्ठा, सेठ का 'धर्म' होता था। गांव के मंदिर के बूढे पुजारी, सेठ को तुलसी चरणामृत देते हुए, 'ओ के सुणबा मैं आयो है'क थारो मुनीम, बेटी का ब्याव खातिर घर का गैणा गिरवी रख'र दूसरा सै रूप्या ब्याजूणा लिया है?' 'मनै तो मालूम कोनी।'
'कांई मालूम कौनी, क बीं की बेटी को ब्याव मंडग्यो है?'
'नई, आ तो ठा है।'
'तो फेर, ओर के मालूम होणो हो? कोई गैर की नहीं, थारा मुनीम की बेटी है। कांई कमी आयगी? गांव मैं थू-थू हो'री है।'
शाम को आरती में सेठानी आई। पुजारी से मिली तो बोली, 'भूल होगी। पिछता रया है। भूल तो म्हारी ज्यादा है। मुनीमजी की बेटी को ब्याव मैं करस्यूं, कन्यादान भी।' यह होती थी रिश्ते नातों की सामाजिक मान्यता और मर्यादा।
राजस्थान के शेखावटी क्षेत्र के गांव लोसल में हमारी सौ साल पुरानी आलीशान पुश्तैनी हवेली आज भी खड़ी है। आज भी कमरों में सफेद झाक्क एराइस का फर्श वैसे ही मौजूद है। हवेली में पांच चौक हैं, खुले आंगन वाले, ऊपर आसमान दिखता है।
शेखावाटी की हवेली में अमूमन दो या तीन चौक होते हैं। हमारी हवेली में बड़े बड़े पांच चौक होने के कारण हमें बड़ी हवेली वालों के नाम से जाना जाता था। चौक की दीवारें आज भी उन्हीं रंगीन चित्रों से अटी हैं जो सौ साल पहले उकेरे गए थे। हवेली की बाहरी दीवारों पर भी अधिकांश चित्र मौजूद हैं। चित्रात्मक रंगीन हवेलियां शेखावाटी की अपनी विशिष्टता है, सेठाने की पहचान। हवेली में घुसते ही पहले खुले चौक में एक ओर विशाल बरगद का पेड़ आज भी खड़ा है। बरगद के चबूतरे पर चिलम पीते हाळी, ठाकर की जगह अब बस हवेली की रखवाली के लिए रखा माली है, और पास की कोठरी में उसका परिवार। दूसरे चौक के दोनों ओर दो बड़ी-बड़ी बैठकें हैं। तीसरे चौक के चारों ओर तिमंज्जिली मुख्य हवेली है जिसके दर्जनों कमरे, साळ, चौबारे, सूने पड़े हैं।
कोनों में सेठानियों के बड़े कमरे हैं जिनमें आज भी ब्रिटेन, जर्मनी में छपी रंगीन तसवीरें टंगी हैं। पीछे के चौथे छोटे चौक में रसोइयां और चौके हैं जहां आसन पाटे पर बैठ कर खाना खाया जाता था। उसके बाहर, पांचवे चौक में, गाय बैलों के ठाण और रथ भेली के ठांव बने हुए हैं। ठाणों में गायें तो नहीं रंभाती लेकिन पुराने रथ, ऊंट की जीन, उसके गले और पांव के घुंघरूं अब भी पड़े हैं। तीन मंजिली, 5 चौक की 101 साल की हवेली आज भी खड़ी है। 80 साल पहले, 1936 में इसी हवेली में मेरा जन्म हुआ था। विशाल बरगद का पेड़ हवेली की सभी गतिविधियों का साक्षी। मेरी बचपन की यादों का गवाह।
हमारे पिताजी अपने भाइयों में सबसे बड़े थे। दादाजी के बाद परिवार के मुखिया। परिवार और गांव में बड़ा भाया के नाम से जाने जाते थे। जो रौब और दबदबा था उसकी आज तो कोई कल्पना भी नहीं कर सकता। बहुत ही क्रोधी स्वभाव के गुस्सैल व्यक्ति थे। घर में ऐसा कोई लड़का नहीं है जिसने उनसे मार न खाई हो।
मैं 5-6 साल का था तब का वाकया है। सबसे बड़े भाई, मुझासे 8 साल बड़े, की किसी हरकत पर पिताजी इतने नाराज हुए कि पिटाई के बाद बरगद की डाल से रस्सा बंधवा कर भाई साब को उल्टा लटकवा दिया और फिर जाकर बैठक में बैठ गए।
पूरी हवेली में किसी की हिम्मत नहीं, उनसे कुछ कहे या करे। सब बेहाल, चुप। पोळ में खाट पर लेटी दादी, खिड़कियों झारोंखों से झाांकती महिलाएं। तभी दादी बोली, सुक्खा को बुलाओ। हवेली में हल्ला मच गया, सुक्खा काका! सुक्खा काका! पीछे से कोई भाग कर गया और सुक्खा काका को बाड़े से बुला लाया। सुक्खा काका हमारे हाळी थे। पिताजी के बचपन के साथी, उनसे उम्र में कुछ बड़े। हट्टे कट्टे गठीले सुक्खा काका सीधे गए और भाईजी को खोलने लगे। पिताजी बैठक से चीखे, 'के करे है! खबरदार!' और उठ कर आ गए।
सुक्खा काका ने भाईजी को खोल कर खड़ा किया और पिताजी से बोले, 'रीसा मरर्यो है! खबरदार! क्यंू बा'र थारा पग बांध'र तनै उल्टो लटका द्यूं जणा कस्यो'क लाग सी?' पिताजी का मुंह लाल बम लेकिन मुंह से एक बोल नहीं निकला। चुपचाप बैठक में चले गए। आज कौन विश्वास करेगा कि एक हाळी, सेठ-मालिक को ऐसा कह सकता है। लेकिन सुक्खा हाळी नहीं, 'काका' थे। तब घर के नौकर-चाकरों से ऐसे ही रिश्ते होते थे। हवेली के पीछे के चौक में रसोइयां थी। रसोई में ऊंचा चौका। चौके के कोने में लकड़ी का चूल्हा। सामने आसण पाटा लगा कर बैठकर खाने की जगह।
बाहर एक कोने में बरतन मांजने की जगह। वहां पाटे पर आसन जमा कर बरतन मांजने को बैठी भोळ्या (भोला) की मां। उसका बेटा भोला हवेली का एक नौकर। भोळ्या की मां जबसे हवेली बनी तब से ही थी। हवेली में सबसे बुजुर्ग महिला।
नई बहू ब्याह कर हवेली में आई। नेगचार, पूजा घर में धोक दिलवाने के बाद पांव लगने के लिए ले जाया गया। सबसे पहले भोळ्या की मां के पास, वहीं बरतन मांजने की जगह। उसने बरतन अलग कर हाथ धोए। पल्लू से हाथ पोंछे। बहू ने पांव लग, पांव लगनी दी। भोळया की मां ने आशीर्वाद और पल्लू की गांठ खोल कर दस्तूरी दी। किसी ने बताया 'बीनणी अ घर में सैं-से बड़ी है, दादी सास सैं भी बड़ी।' फिर उसे क्रमश: सबके पांव लगने को ले जाया गया।
परिवार में एक दादाजी के जन्म के समय ही उनकी मां की मृत्यु हो गई थी। उस वक्त चौके में जो ब्राह्मणी जोसण खाना बनाती थी उसका दूध पीता नवजात शिशु था। जोसण ने अपने बच्चे के साथ उन दादाजी को भी दूध पिला कर बड़ा किया। 'जोसण मां' बन गई। परिवार की मां। उनके घर का सब प्रबंध हवेली से होता था। हवेली में गेहूं की बोरियां आती तो एक बोरी जोसण मां के यहां। दिसावर से आम की पेटी आती तो आम जोसण मां के यहां भेजे जाते। हर जात-जड़ूला, शादी-ब्याव, हर पारिवारिक आयोजन पर उन्हें मां का दस्तूर दिया जाता। उनके बेटे बेटियों को भाई, बहन, बुआ, उनके मरने के बाद भी माना गया, रिश्ता निभाया गया।
पुरखों की हवेली अब सूनी पड़ी है।
परिवार की पांचवी छठी पीढ़ी चल रही है। पड़दादा का परिवार। लोग देश में सब जगह फैले हुए हैं। आखिर में एक दादी इसी बड़ी हवेली में अकेली रहती थी, बड़ी सेठाणी, अपने पुराने ठसके के साथ। बेटे-पोते मिलने आते रहते। दादी जैसा कहतीं, वैसा ही होता। रुपए-पैसे से वे किसी पर निर्भर नहीं थीं, फिर भी सभी नियमित भेजते रहते थे। पास के घर में बैंक था।
मैनेजर खुद आकर रुपए दे जाता, चैक ले जाता। अपनी देखभाल का पूरा इंतजाम उन्होंने कर रखा था। शरीर साथ दे रहा था। अपने आखिरी समय और उसके बाद क्या करना है, उन्होंने घर के जोशीजी को सब लिखवा दिया था। गांव के एक रिश्तेदार सेठ जिनके पास उनका रुपया पैसा रहता था, जो सब हिसाब किताब रखते थे। सब कुछ उनकी इच्छा के अनुरूप ही किया गया। उसके बाद जो हवेली में ताला लगा, सूनी हो गई।
इस बार तय हुआ कि सावन में बरसात होने के बाद कुछ दिन आकर हवेली में रहा जाए। बैठक में ही इंतजाम कर दिया गया। कहां तो एक बड़ा गद्दा, तकिए, मसंदे, रस्सी से खिंचता झाालर वाला पंखा, और कहां अब डबल बैड, डनलप के गद्दे, तकिए, सोफा सेट, डाइनिंग टेबल और कुर्सियां, बिजली का पंखा, कूलर।
मंहगे और सुंदर हैं, लेकिन इस बैठक में मखमल में टाट के पैबंद से लगते हैं। बैठक इतनी बड़ी है कि यहीं बेडरूम, ड्राइंग रूम, डाइनिंग रूम सब। बाहर बाथरूम और टायलेट का सेट पहले ही बन चुका है। जरूरी भी था, कारण अब सुबह उठ कर कुएं बावड़ी तो जाया नहीं जा सकता, हालांकि वे अब भी हैं। रसोई में गैस चूल्हा आ गया है। खाना स्वादिष्ट तो लगता है लेकिन चूल्हे की भोभर में मंद आंच पकती दाल या कच्चे जलते कोयले से देशी घी की लूण धूणी दी गई पापड़ की चूरी, सोगरी, मूली की बात और थी। अंगारे पर रखी रोटी पर सूं सूं करते मक्खन वाली सूस्यां रोटी और दही की जगह अब टोस्ट मिलते हैं। आसन पाटे की जगह टेबल पर बैठ कर खाना, फूहड़-सा लगता है।
सावन का सोमवार। बरसात हो चुकी है। मौसम सुहावना है। इसी के लिए तो आए हैं। चलो अपने खेत पर चलते हैं। वहीं दाल-बाटी बनवा कर खाएंगे। टीलों पर गए। बड़ा सुखद लग रहा था। आंखें सावन की डोकरी (बीरबहूटी) को ढ़ूढ रही थीं। बरसात होते ही उन तपते धोरों में से कैसे अनगिनत लाल मखमली डोकरियां निकल कर ठुमकने लगती थीं, सदा अचंभा होता था। बचपन में गीली मिट्टी के घरोंदे बनाने के साथ सावन की डोकरी की मखमली स्मृति गहरे से जुड़ी थी। सावन के झाूले, सावन की डोकरी। लेकिन आश्चर्य! दूर-दूर तक एक भी नजर नहीं आई।
सुख्खा काका से पूछा तो कहने लगे-अब कहां सावन की डोकरी, सब खत्म हो गई। कीटनाशक सब को लील गए। कहने लगे, हवेली के आंगन में जो बूढ़ा बरगद है उस पर गौर किया? कैसे शाम होते ही रैन बसेरा करने आई गौरया और मैनाओं से चह चहाता था। और अब, मालूम ही नहीं पड़ता कब शाम हो गई। कबूतर तो खाली हवेलियों में खूब हैं लेकिन बाकी पक्षी खत्म हो रहे हैं। कीटनाशक मिला दाना खाकर मोर मरते हैं। चील, गिद्ध समाप्त हो रहे हैं। जानवरों के शव हफ्तों सड़ते रहते हैं, **** नोचते रहते हैं। घर-घर में कैंसर जैसी बीमारियां हो रही हैं।
जवानों और बच्चों को लकवा हो रहा है। इन्हीं की कोई सुध नहीं लेता तो सावन की डोकरी को कौन पूछे?
सुक्खा काका के गुस्से का असल कारण मुझो तब मालूम हुआ जब हवेली लौटने पर बरगद पर चिडिय़ाओं के बारे में मंैने माली से पूछा।
कीटनाशक सुक्खा काका के जवान बेटे को लील गया था। बेटे की झाोंपड़ी में कीटनाशक रखा था। फर्श पर गिर गया। कुछ उसने कपड़े से समेट कर वापस डाला। उसकी तबियत खराब हो गई। सांस की तकलीफ हो गई, हाथ पांव ढ़ीले पड़ गए। अस्पताल में भर्ती करवाया। ठीक होकर घर आ गया लेकिन उसके एक महीने बाद ही घातक रक्त कैंसर से उसकी मौत हो गई। इलाज में ही घर लुट गया। उस समय तक भी कीटनाशक की हल्की गंध झाोंपड़ी में थी। श्मशान से लौटते ही सुख्खा काका ने उस झाोपड़ी को आग लगा कर नष्ट कर दिया था।
मुझो याद आई, रसेल कार्सन की लिखी 'साइलेन्ट स्प्रिंग', जिसमें उन्होंने अमरीका में हवाई जहाजों से व्यापक स्तर पर छिड़के गए कीटनाशकों के कारण विलुप्त हुए पक्षी, निर्जन वादियां और वीरान बहार का मार्मिक चित्रण किया है। साइलेंट स्प्रिंग - वीरान बहार।
हवेली से वापस जाते समय मन उदास था। लेकिन भित्त चित्रों की जीवंतता को देख कर लगा कि नहीं सब कुछ लुप्त नहीं हुआ है। बूढा बरगद अब भी आशान्वित है कि रैन बसेरा फिर होगा, धोरों पर सावन की डोकरी फिर ठुमकेगी।
Published on:
06 Sept 2017 02:13 pm
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