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राजस्थान का वीर सपूत शैतान सिंह: वो परमवीर मेजर जो मरने तक मशीन गन चलाता रहा

1962 के भारत-चीन युद्ध में मेजर शैतान सिंह देश के लिए शहीद हाे गए थे। शैतान सिंह का जन्म 1 दिसंबर 1924 काे राजस्थान के जाेधपुर जिले में हुआ था।

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 Major Shaitan Singh

जयपुर। 1962 के भारत-चीन युद्ध को देश के इतिहास का सबसे भीषण युद्ध माना जाता है। इस युद्ध में भारत ने कम संसाधनों के बावजूद चीन का सामना किया और कई मोर्चों पर उसके दांत खट्टे किए।

युद्ध में भारत ने अपने कई वीर सपूत भी खोए, इनमें से ही एक थे मेजर शैतान सिंह। शैतान सिंह 1962 में महज 37 वर्ष की आयु में देश के लिए शहीद हाे गए थे। मेजर शैतान सिंह का जन्म 1 दिसंबर 1924 काे राजस्थान के जाेधपुर जिले में हुआ था।

शैतान सिंह के पराक्रम की वजह से जाना जाता है रेजांग ला दर्रे का युद्ध
37 वर्षीय शैतान सिंह के नेतृत्व में 13वीं कुमाऊंनी बटालियन की सी कंपनी ने 16000 फीट ऊंचाई पर स्थित रेजांग ला दर्रे में चीनी सैनिकों का सामना किया था। रेजांग ला दर्रे के युद्ध को मेजर शैतान सिंह के पराक्रम की वजह से जाना जाता है।

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123 सैनिकों के साथ शैतान सिंह अपनी पोस्ट पर सुरक्षा में तैनात थे। तभी करीब दो हजार से अधिक चीनी सैनिकों ने शैतान सिंह और उनके साथियों की पोस्ट पर हमला कर दिया। भारत के हर जवान के पास केवल 400 राउंड गोलियां थीं और हथगोले भी बेहद कम थे, जबकि चीनी सैनिकों के पास आपार संसाधन थे।

जान की परवाह किए बिना अपने सैनिकों का हौसला बनाए रखा
युद्ध के दौरान मेजर शैतान सिंह ने अपनी जान की परवाह किए बिना अपने सैनिकों का हौसला बनाए रखा और गोलियों की बौछार के बीच एक प्लाटून से दूसरी प्लाटून जाकर सैनिकों का नेतृत्व किया। इसी दौरान उनके कई गोलियां लग गईं।

उनके साथी हवलदार ने उनसे कहा कि वे नीचे चलें जिससके इलाज शुरु किया जा सके। लेकिन शैतान सिंह ने इलाज की बजाय सैनिकों का हौंसला बढाते रहे। एक के बाद एक सैनिक शहीद हो रहे थे। अपने साथियों काे मरता देख शैतान सिंह का खून खौल उठा और घायल अवस्था में भी उन्होंने बंदूक उठा ली।

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शैतान सिंह और उनके साथियों ने अपने प्राण भारत माता के लिए न्यौछावर कर दिए। कहा जाता है कि सुबह के समय चीनी सेना ने हमला किया था और दिन भर की लड़ाई के बाद चीनी सेना को लगा कि भारत की यह टुकड़ी संख्याबल में उतनी छोटी नहीं है जैसा वह सोच रहे थे। इसके बाद चीनी सैनिक पीछे हटने लगे।

अंतिम सांस लेते हुए भी रायफल के ट्रिगर पर थीं सैनिकों की उंगलियां
शैतान सिंह आैर उनके साथियाें के शव बर्फ से ढंक गए और उनकी कहानी शायद ही दुनिया तक पहुंच पाती। लेकिन दो महीने बाद जब चुशूल गांव के गड़रिए रजांगला दर्रे पर जब भेड़ चराने गए तो उन्हें सैनिकों के शव नजर आए। इस बात का पता जब भारत सरकार को चला तो एक फौजी टुकड़ी वहां पहुंची।

इस टुकड़ी ने पाया कि अंतिम सांस लेते हुए भी शैतान सिंह और बाकी भारतीय सैनिकों की उंगलियां रायफल के ट्रिगर पर थीं। कई जवानों के हाथों में हथगोले भी थे। थोड़ी दूरी पर करीब 1000 से अधिक चीनी सैनिकों की लाशें भी मिलीं।

शव मिलने के बाद मेजर शैतान सिंह के पार्थिव शरीर को जोधपुर स्थित उनके पैतृक गांव ले जाया गया, जहां पूरे सैनिक सम्मान के साथ उन्हें अंतिम विदाई दी गई। उनकी इस बहादुरी के लिए सरकार ने उन्हें मरणोपरांत देश के सर्वोच्च वीरता सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया।

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