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युद्घ में कभी नहीं हारे ये महाराणा, आज भी गौरवगाथा कहता है विजय स्तंभ

महाराणा कुंभा एेसे राजा थे जिनकी तलवार की चमक से दुश्मन कांप उठते थे तो उनके द्वारा कला के क्षेत्र में किए योगदान को भुलाना असंभव है।

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Maharana Kumbha

जयपुर। राजस्थानी योद्घाआें के शौर्य की अद्भुत कहानियां बरसों से लोगों के दिलों में गूंज रही है। यहां के जांबाज योद्घाआें ने अपने बाहुबल आैर तलवार की चमक से न सिर्फ पूरी दुनिया को हैरत में डाला बल्कि कला आैर संस्कृति के एेसे नायाब नमूने पेश किए जिस पर आज भी लोग गर्व करते हैं। महाराणा कुंभा एक एेसे ही राजा थे जिनकी तलवार की चमक से दुश्मन कांप उठते थे तो उनके द्वारा संगीत, साहित्य आैर स्थापत्य कला के लिए किए गए योगदान को भुलाना असंभव है।

मेवाड़ के महाराणा कुंभा को महाराणा कुंभकर्ण के नाम से भी जाना जाता है। वे महाराणा मोकल के पुत्र थे। पिता की हत्या के बाद 1433 में मेवाड़ के सिंहासन पर आसीन हुए आैर उन्होंने 1468 तक मेवाड़ पर राज किया। महाराणा कुंभा ने सत्ता हासिल करने के बाद अपने पिता के हत्यारों से बदला लिया आैर अगले सात सालों में सारंगपुर, नागौर, नराणा, मोडालगढ़, बूंदी जैसे कर्इ मजबूत किलों को जीत लिया। कुंभा ने दिल्ली के सुल्तान सैयद मुहम्म्द शाह आैर गुजरात के सुल्तान अहमदशाह को भी कर्इ युद्घों में हराया।

यहां तक की मेवाड़ में निर्मित 84 दुर्गों में से 32 का निर्माण महाराणा कुंभा ने करवाया था। अपने 35 साल के शासन में उन्होंने कुंभलगढ़ जैसे एक से बढ़कर एक दुर्ग दिए जिन्हें आज भी अजेय समझा जाता है। वहीं विजय स्तंभ कर्इ शताब्दियों के बाद आज भी महाराणा कुंभा के गौरवपूर्ण शासन की याद दिलाता है। इसे महाराणा कुंभा ने महमूद खिलजी के नेतृत्व वाली मालवा आैर गुजरात की सेनाआें को हराने के बाद बनवाया था। 122 फीट ऊँचा यह स्तंभ शानदार स्थापत्य कला का नमूना है। साथ ही कुंभा के बनवाए दुर्गों में बहुत से मंदिर आैर कर्इ तालाब हैं।

युद्घ में कभी न हारने वाले महाराणा कुंभा को संगीत का भी अच्छा ज्ञान था। उन्होंने संगीतराज, संगीत मीमांसा, सूड प्रबंध जैसे ग्रंथों की रचना की । इसके अतिरिक्त वे वेद, मीमांसा आैर न्याय मेें भी पारंगत थे। यही नहीं वे नाटयशास्त्र के ज्ञाता आैर वीणावादन में भी कुशल थे। कुंभा के शासनकाल को मेवाड़ का स्वर्णकाल माना जाता है।

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