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वन्दना! सांस्कृतिक प्रस्तुति से खमत-खामणा। देखिए…

जयपुर. सामूहिक क्षमापना के दिन जैन समाज की ओर से पूरे प्रदेश में विभिन्न जैन मंदिरों में कई कार्यक्रम हुए। ऐसे में दसलक्षण पर्व का महत्व बताते हुए सांस्कृतिक कार्यक्रम का मंचन किया गया। इसी में से एक चुनिन्दा सामूहिक क्षमापना की सांस्कृतिक प्रस्तुति समाज में क्षमा भाव को ध्यान में रखते हुए प्रस्तुत की गई। गीत-संगीत के बीच प्रस्तुत एक बानगी। इसमें सभी जीवों से क्षमा मांगी गई। सभी जीव मुझे क्षमा करें संसार के सभी जीवों से मेरी मैत्री है, मेरा किसी से वैर विरोध नहीं है। मैं अपने पापों की आलोचना करता हूं। निन्दा, जुगुप्सा और गर्हा द्वारा मन-वचन-काया से प्रतिक्रमण कर पापों से निवृत्त होकर चौबीसी तीर्थंकर परमात्मा को वंदना व नमस्कार किया गया।

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जयपुर. सामूहिक क्षमापना के दिन जैन समाज की ओर से पूरे प्रदेश में विभिन्न जैन मंदिरों में कई कार्यक्रम हुए। ऐसे में दसलक्षण पर्व का महत्व बताते हुए सांस्कृतिक कार्यक्रम का मंचन किया गया। इसी में से एक चुनिन्दा सामूहिक क्षमापना की सांस्कृतिक प्रस्तुति समाज में क्षमा भाव को ध्यान में रखते हुए प्रस्तुत की गई। गीत-संगीत के बीच प्रस्तुत एक बानगी। इसमें सभी जीवों से क्षमा मांगी गई।
सभी जीव मुझे क्षमा करें
संसार के सभी जीवों से मेरी मैत्री है, मेरा किसी से वैर विरोध नहीं है। मैं अपने पापों की आलोचना करता हूं। निन्दा, जुगुप्सा और गर्हा द्वारा मन-वचन-काया से प्रतिक्रमण कर पापों से निवृत्त होकर चौबीसी तीर्थंकर परमात्मा को वंदना व नमस्कार किया गया। प्रस्तुति में बताया गया कि छदमस्तों से भूल होना स्वाभाविक है, अत: खमत-खामणा – क्षमायाचना करते हैं। हमने क्रोध, मान, माया, लोभ, राग-द्वेष से जानबूझकर, अनजाने में मन-वचन-काया के तीनों योगों से किसी का मन दुखाया हो, दूसरों से दुखवाया हो या दुखाने वालों का अनुमोदन किया है तो हम अंत: करण पूर्वक खमत-खामणा करते हैं। आप हमें बड़े दिल से क्षमा करें।