
किसी केमिकल से नहीं, टाइटेनियम ट्यूब से गुजरकर शुद्ध हो जाएगा पानी
भवनेश गुप्ता / जयपुर. पानी को शुद्ध करने (बैक्टिरिया मुक्त) के लिए अब किसी तरह की केमिकल की जरूरत नहीं रहेगी। बल्कि, पानी से ही क्लोरीन उत्पन्न होगा और उसी के जरिए पानी शुद्ध हो जाएगा। ऑस्ट्रेलिया की इस हाइड्रो-डिस तकनीक को राजस्थान में उपयोग करने के लिए जलशक्ति मंत्रालय के पेयजल और स्वच्छता विभाग से स्वीकृति मिल चुकी है।
पहले फेज की प्रक्रिया को मंजूरी दे दी गई है और अब दूसरी जांच रिपोर्ट माशेलकर कमेटी के पास पहुंच गई। कमेटी की हरी झंडी के बाद इस तकनीक को राजस्थान में पूरी तरह लागू करने राह खुल जाएगी। इसी के तहत ऑस्ट्रेलिया सरकार की टीम 20 सितंबर को जयपुर आएगी। इसमें साउथ ऑस्ट्रेलिया के मंत्री भी होंगे, जो सीएम और जलदाय मंत्री से मिलेंगे।
अभी एमएनआईटी में:
इंटरनेशनल सेंटर ऑफ एक्सीलेंस इन वाटर रिसोर्सेज मैनेजमेंट, साउथ ऑस्ट्रेलिया ने शहर के एमएनआईटी में हाइड्रो-डिस तकनीक का उपयोग किया है। इसमें राजस्थान सेंटर ऑॅफ एक्सीलेंस इन वाटर रिसोर्सेज मैनेजमेंट भी शामिल है।
टाइटेनियम ट्यूब
- इसमें पेयजल लाइन के बीच में ही टाइटेनियम की ट्यूब जोड़ देते हैं। इस ट्यूब में विशेष प्रकार का लेप लगा हुआ है। पानी को इस ट्यूब में से गुजारा जाता है
-पानी के गुजरते समय हल्की मात्रा में विद्युत प्रवाहित करवाई जाती है।
- विद्युत की कम मात्रा से पानी में मौजूद लवण टूट जाते हैं और स्वत: ही क्लोरीन बन जाता है। यही क्लोरीन पानी से बैक्टिरिया खत्म करता है।
नई तकनीक के फायदे
- पानी को शुद्ध करने की इस प्रक्रिया में किसी तरह के ठोस या तरल केमिकल मिलाने की जरूरत नहीं होती।
- जब कैमिकल ही नहीं है तो पेयजल लाइन की लाइफ ज्यादा हो जाएगी।
- स्वास्थ्य पर किसी तरह का विपरीत प्रभाव नहीं।
अभी क्लोरिनेशन
- तरल रूप में क्लोरीन को सीधे पानी की टंकी में डाला जा रहा।
- नमक से सोडियम हाइपो क्लोराइट बनाते हैं। इसमें नमक में पानी मिलाकर उसमे करंट प्रवाह कराते हैं, इसके जरिए जो सॉल्यूशन बनकर आता है, उसमें तरल क्लोरीन की मात्रा अधिक हो जाती है।
- क्लोरीन डाई ऑक्साइड पाउडर के रूप में होता है, जिसे पानी मिलाकर शुद्ध करने का काम होता है।
इसके नुकसान
- तरल क्लोरीन लीकेज होने पर वातावरण में फैलने और हादसा होने की आशंका बनी रहती है।
- पाइपलाइन चौक और खराब होने की स्थिति बनी रहती है, क्योंकि क्लोरीन जमा होता रहता है।
- निर्धारित मात्रा से अधिक होने पर स्वास्थ्य के लिए हानिकारक। कैंसर होने तक की आशंका बनी रहती है। कई बैक्टिरिया को खत्म करने मेें सक्षम नहीं।
हाइड्रो-डिस तकनीक के जरिए क्लोरोनाइजेशन प्रक्रिया बेहतर है। इसका उपयोग राजस्थान में भी हो, इसके लिए जलशक्ति मंत्रालय के पेयजल और स्वच्छता विभाग में मंजूरी की प्रक्रिया चल रही है। जलदाय विभाग की तकनीकी समिति ने भी मंजूरी दे दी है। साउथ ऑस्ट्रेलिया की टीम अगले माह जयपुर आएगी।
अरुण श्रीवास्तव, निदेशक, वाटर एंड सेनिटेशन सपोर्ट ऑर्गेनाइजेशन
Published on:
08 Sept 2019 04:16 pm
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