
-सालों तक जगाई साक्षरता की अलख, अब अंधेरे में जीवन काट रहे 17 हजार प्रेरक
प्रदेश में निरक्षरता का कलंक मिटाने वाले 17 हजार प्रेरक अब अंधेरे में जीवन जीने वाले को मजबूर हैं और पिछले 53माह से बेरोजगार हैं। साक्षर भारत मिशन के तहत संविदा के आधार पर प्रतिमाह 2 हजार रुपए का मानदेय पर सेवा करने वाले प्रेरकों का भविष्य अंधकार में है। साक्षरता की अलख जगाने वाले इन प्रेरकों को सरकार बाहर का रास्ता दिखा चुकी है। साक्षर भारत मिशन कार्यक्रम बंद होने के बाद शुरू किए जा रहे नए पढऩा लिखना कार्यक्रम में सेटअप होने के बाद भी इन्हें नियुक्ति नहीं दी गई ऐसे में अब इन्हें नव भारत साक्षरता कार्यक्रम से आस है है जिसमें उन्हें लगाया जाएगा और पूर्व की तरह महात्मा गांधी सार्वजनि पुस्तकालय और वाचनालय के संचालन की जिम्मदेारी पुन: प्रेरकों को दी जाएगी।
ऐसे बंद हुई योजना
आपको बता दें कि देश के 50 फीसदी से कम महिला साक्षरता वाले जिलों में अंतरराष्ट्रीय महिला साक्षरता दिवस पर 8 सितम्बर 2009 को राजस्थान के कोटा को छोड़ सभी जिलों में साक्षर भारत अभियान लागू किया गया। 2001 की जनगणना को आधार माना गया। इसके तहत प्रदेश के 17 हजार प्रेरकों ने 7500 लोक शिक्षा केंद्र पर नौ साल तक असाक्षर महिला पुरुषों को साक्षर करने का दायित्व निभाया। 30 मार्च 2018 को यह अभियान समाप्त कर दिया गया और साथ ही समाप्त हो गया इन 17 हजार प्रेरकों का अनुबंध। जिससे इनकी नौकरी पर संकट खड़ा हो गया। सबसे महत्वपूर्ण है कि महज दो हजार रुपए के मासिक मानदेय पर प्रति पंचायत दो प्रेरक एक पुरुष और एक महिला प्रेरक कार्यरत थे। जो नवसाक्षरों को साक्षर बनाने में जुटे थे।
1985 से कर रहे थे काम
गौरतलब है कि इससे पूर्व प्रदेश में निरक्षरता के कलंक को मिटाने के लिए 1985 में प्रौढ़ शिक्षा योजना लाई गई थी। फिर इसके स्थान पर अनौपचारिक शिक्षा लाई गई। जिसमें प्रेरकों को 105 रुपए मासिक मानदेय दिया जाता था। 31 मार्च 2001 में इसे बंद कर सतत शिक्षा और साक्षरता कार्यक्रम शुरू किया गया। इसके लिए प्रदेश में साक्षरता केंद्र बनाकर प्रेरकों और सहप्रेरकों को लगाया गया। इसके बाद अप्रेल 2011 में साक्षर भारत के नाम से इस कार्यक्रम को शुरू किया
गया, जिसमें हर ग्राम पंचायत में एक महिला और एक पुरुष प्रेरक को नियुक्ति दी गई। कार्यक्रम के तहत प्रेरकों को 700 रुपए मासिक मानदेय के रूप में दिए जाते थे। इसी बीच तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने 10 जुलाई 2003 को दौसा जिले के बनियाना ग्राम पंचायत से महात्मा गांधी सार्वजनिक पुस्तकालय का उद्घाटन किया और इसे चलाने की जिम्मेदारी प्रेरकों को सौंपी गई। आपको बता दें कि इसके लिए उन्हें कोई मानदेय नहीं दिया जाता था। प्रेरक बिना किसी मानदेय के इन पुस्तकालयों का संचालन करते थे। मार्च 2018 में साक्षर भारत अभियान को भी बंद कर दिया गया।
मानदेय भी बकाया
गौरतलब है कि 2018 में साक्षर भारत मिशन बंद होने से प्रत्येक शिक्षा केंद्र पर एक पुरुष व एक महिला प्रेरक की सेवाएं भी समाप्त कर दी गईंए लेकिन उनका प्रतिमाह केंद्र सरकार से मिलने वाला दो हजार रुपए का मानदेय अब तक बकाया है। बताया जाता है कि प्रदेश में करीब 17 हजार प्रेरकों का मानदेय अटका हुआ है। बकाया मानेदय के लिए प्रेरकों ने कई बार ज्ञापन दिएए लेकिन उन्हें अग्रेषित करने के अतिरिक्त अधिकारियों ने अन्य कोई रुचि भी नहीं दिखाई। फरवरी 2020 में एक बार फिर सरकार ने प्रेरकों का बकाया भुगतान करने के आदेश तो जारी किए लेकिन भुगतान की प्रक्रिया शुरू नहीं हो पाई। मानदेय नहीं मिलने से कोरोना काल में प्रेरक आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं।
अब नव भारत साक्षरता कार्यक्रम से आस
बेरोजगारी की मार झेल रहे इन प्रेरकों को अब केंद्र सरकार की ओर से शुरू किए जा रहे नव भारत साक्षरता कार्यक्रम से आस बंधी है। उनकी मांग है कि इस कार्यक्रम में उन्हें नियुक्ति दी जाए, जिससे एक बार फिर उन्हें नौकरी मिल सके और वह फिर लोगों को साक्षर करने में अपना योगदान दे सकें। साथ ही इनका कहना है कि पहले की तरह महात्मा गांधी सार्वजनिक पुस्तकालय और वाचनालयों के संचालन की जिम्मेदारी इन्हें दी जाए क्योंकि केंद्र सरकार की योजनाओं में 60 फीसदी राशि केंद्र और 40 फीसदी राज्य सरकार वहन करती है। अगर सरकार चाहे तो हर ग्राम पंचायत पर चलने वाले महात्मा गांधी सार्वजनिक पुस्तकालय और वाचनालयों को चालू रख कर प्रेरकों को रोजगार दे सकती है।
इनका कहना है,
प्रदेश के 17 हजार प्रेरक बेरोजगार हैं। एक तरफ सरकार अलग अलग विभागों में भर्ती प्रक्रिया शुरू कर रही है लेकिन प्रेरकों की ओर उनका ध्यान नहीं है।
मदन लाल वर्मा,
प्रदेशाध्यक्ष, राजस्थान प्रेरक संघ
Published on:
08 Sept 2022 05:37 pm
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