जयपुर। केके बिड़ला फाउंडेशन का बिहारी पुरस्कार प्राप्त करना किसी भी लेखक के लिए बड़े गौरव की बात है। इसकी परंपरा में विजयदान देथा, नंद चतुर्वेदी, नंद किशोर आचार्य, प्रभा खेतान जी, डॉ सत्यनारायण जैसे लेखक रहे हैं। यही वजह है कि मैं आज विनम्र प्रसन्नता के साथ साथ एक दायित्व महसूस कर रही हूं कि अब मेरे हर लिखे शब्द पर यह सम्मान मानदंड बन कर खड़ा रहेगा, अब मेरे सरोकार स्वांत: सुखाय नहीं रह सकते। यह पुरस्कार मुझे याद दिलाता रहेगा कि जिस राज्य में जन्म लेने के कारण मुझे यह मिला है, उसके उन अनछुए कोनों और मरुस्थल के अंधड़ों में संघर्षरत जीवन को नये सिरे से और नये अर्थों के साथ मैं अपनी रचनाओं में लाऊं।
सफेद चादरों वाले ठंडे बिस्तरों पर वो अंत्याक्षरी का खेल, वो कहानियां और संग में हुंकारा…
मैंने भारत के सबसे रूमानी और खूंरेज इतिहास के पन्नों पर दर्ज शहर चित्तौडग़ढ़ में अपनी कलम-पट्टी पकड़ी थी। मीरां के गीत जहां अनपढ़ स्त्रियां सहज ही गाती हों। जैसा कि विश्वास पाटिल सर ने कहा- हम भारतीय लेखक आख्यानों से सदियों से परिचित हैं, बाद में इसे नॉवल कह कर हम पश्चिम से आयातित कह लें।
यह मेरा अखंड विश्वास है कि इतिहास के खंडहरों के साये में जो लोग जन्म लेते हैं, उनकी रगों में अजीब किस्म की रूमानियत रिस आती है। वह छतों पर सोने का आपसी भरोसे वाला समय था… आपस में जुड़ी छतों पर शाम से छिडक़ाव हो जाता… सफेद चादरों वाले ठंडे बिस्तरों पर अंताक्षरी खेली जाती, कहानियां सुनी और सुनाई जातीं। हवेलियां, फड़ चित्रकारी, लोकनाट्य ( गवरी, वीर तेजाजी) , बहुरूपिया स्वांग आदि मेरी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा रहे। सर्दियां आईं नहीं कि घर के आंगन में अलाव लगे, अलाव के निकट बैठ गेहूं – अनाज, मूंगफली भूनते – टूंगते हमारी दुर्गा बाई मम्मी की ‘टूरिंग अनुपस्थिति’ में हमारे घर पर रुकतीं और कहानी सुनाना शुरू करतीं।
” हुंकारों भरबो मत भूलजो सा।”
” हूं….”
“एक राजकुंवरी थी। लील कंवर।”
“हूं….”
बस यहीं से गहरा लगाव हुआ कहानी के कहानीपन से। राजस्थान का देय कि मैं लोक-कलाओं के ज्यादा निकट रही… चौक पर गवरी लोक-नाट्य हो रहा है, हम सडक़ पर फ्रॉक समेटे बैठे हैं, सुबह से शाम तक मगन देख रहे हैं… शिव की गाथा। शहर में ‘मीरां महोत्सव’ हो रहा है, कठपुतली कला के भागीरथ देवीलाल सामर आ रहे हैं, कठपुतलियां बनाने का बाल शिविर लग रहा है लोककला मण्डल में, जहां न केवल हैण्ड पपेट बनानी है, अपनी स्क्रिप्ट भी लिखनी है।
मेरी जिला शिक्षा अधिकारी मां और बी.डी.ओ. पिता हमेशा अपनी-अपनी जीपों में टूर पर रहते थे। बड़ी बहनें हॉस्टल में। मैं और मेरा भाई घर पर। किताबों के लिए पूरी लाइब्रेरी उपलब्ध थी, कोई सेंसर नहीं था, जो मिलता सो पढ़ डालते। आठवीं-नवीं में ही शंकर का ‘चौरंगी’, बिमल मित्र का ‘साहिब बीवी और गुलाम’, खांडेकर का ‘ययाति’। हिन्द पॉकेट बुक से छपी अनूदित नॉबकॉव की ‘लॉलिटा’, स्वाइग की ‘एक अनाम औरत का खत’, हॉथार्न की ‘द स्कारलेट लैटर’ पढ़ डाली थीं। सच कहूं तो मैं एक एकलव्य थी और किताबें द्रोण। किताबों ने ही सिखाया कि किसी अटपटी सी बात को भी किस कदर सलीके से कहा जा सकता है।
बिहार के पाठक सबसे जागरूक, केरल ने मुझे चौंकाया
बिहार! वहीं से सर्वाधिक चिट्ठियां आईं सवाल भी। वहां आम पाठक भी खूब जागरूक हैं। पटना पुस्तक मेले में जाकर भी देखा कि वहां आम जन के भीतर कितनी ललक है, वे किताब खरीदते हैं, पढ़ते हैं, फिर लेखक को चिट्ठी भी लिखते हैं। दूसरे केरल जाकर मुझे हैरानी हुई कि वहां केरल हिंदी प्रचार सभा ने हिंदी को आमजन तक पहुंचाया है। वहां हिंदी पढऩे की ललक नयी पीढ़ी में जगी है। वहां लेखक का खूब सम्मान होता है।
जो बंजारे होते हैं…उनके पैरों के छाले टीसते हों, पर झोले में हर रंग के गीत भी होते हैं…
वायुसेना अधिकारी की पत्नी होने के कारण, विविध जगहों पर रहने के अनुभव बहुत मिले। हम लंबे समय कश्मीर में रहे, मेरा पहला उपन्यास कश्मीर पर आया ‘शिगाफ’। उसके बाद अनवरत चल निकला लेखन का सिलसिला। यह सच है कि जो बंजारे होते हैं भले उनके पैरों के छाले टीसते हों, पर उनके झोले में हर रंग के गीत होते हैं।
कश्मीर हो या आसाम मैं कहीं भी रहूं, राजस्थान मेरी रगों में बहता रहा है। मेरी कहानियों में वह लौट-लौट कर आता है। कभी समूचा तो कभी कोलाज बनकर। मरुस्थल की पृष्ठभूमि पर ‘कठपुतलियां’ वह कहानी थी, जिसने मुझे बतौर लेखक दुबारा स्थापित किया। स्वांग का बहुरूपिया कलाकार गफूरिया चित्तौडग़ढ़ के मेरी किशोरावस्था की सबसे शोख स्मृतियों का हिस्सा है। घाणेराव की कुरजां डाकण मेरी कहानियों के चर्चित पात्र हैं।
मुझे लगता है कहानी लिखना वक्त की मीनारों पर बैठीं आवारा रूहों को अपनी देह पर बुलाने जैसा होता है। कहानी क्या है? महज कुछ संवाद, कुछ गुफ्तगू, कुछ आवाजें या फिर अमल या हरकतें। फिर भी जिस कहानी को महसूस करने और लिखने में लेखक की पांच इंद्रियां कम पड़ती हों और उस कहानी को महसूस करने के लिए पाठक की भी पांचों अनुभूतियां काम आ जाएं बल्कि उसे दो चार अनुभूतियां और जगानी पड़ जाए, तो वही सच्ची कहानी है।
चाहती हूं मल्टीलिंगुअल महिला साहित्योत्सव करना
हिंदी की पहली वेब पत्रिका शुरू की थी। अब चाहती हूं कि कोई मल्टीलिंगुअल महिला साहित्योत्सव शुरू किया जाए। मुझे लगता है, पूरे भारत की अलग-अलग भाषाओं में लिखने वाली महिलाओं में संवादहीनता है। हमें अगर अन्य संस्कृति में झांकना है तो एक-दूसरे के साहित्य के जरिये ही यह संभव है। बल्कि एक ही भाषा की महिलाओं में भी संवादहीनता बहुत है। जब वे एक प्लेटफॉर्म पर मिलेंगी, तो कुछ नई बातें और समाधान सामने आएंगे।
इंग्लैंड में लेखक होना, सम्मान की बात
(मनीषा हाल ही प्रभा खेतान फांउंडेशन के कलम कार्यक्रम के सिलसिले में इंग्लैंड में थीं) भारतीयता के प्रति ललक तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर है, लेकिन हम अपने लेखन में भारतीयता को उसके मूल रूप से कितना ला पा रहे हैं? हालांकि सलमान रश्दी, अरुंधति राय, अनीता देसाई, झुम्पा लाहिड़ी ऐसे नाम हैं, जिन्होंने अपने लेखन में भारत को रेखांकित किया है। मुझे लगता है कि अगर लेखन मौलिक है और अंतरराष्ट्रीय अपील का है, तो हां अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पसंद किया जाता है। लेकिन हिंदी लेखन वहां तक पहुंचे उसमें अनुवादों की कमी बहुत बड़ी समस्या है। लेकिन वहां रह रहे पाकिस्तानी हिंदी-उर्दू साहित्य में खूब रुचि लेते हैं।
इंग्लैंड में लेखक होना एक बहुत सम्मान का विषय है, स्कॉटलैंड में मैंने राइटर्स म्यूजियम देखा। यॉर्कशायर में एमिली ब्रोंटे का घर, स्ट्रेटफोर्ड में शेक्सपीयर का घर और बाथ में जेन ऑस्टेन का घर देखा, जहां उनके सामान सहेजे रखे थे। और भारत में लेखक मानो सबसे अंतिम प्रतिनिधि हो समाज का, कोई तवज्जो ही नहीं। प्रेमचंद जी का घर, निर्मल जी के घर उपेक्षित पड़े हैं। लंदन में शेक्सपियर, चाल्र्स डिकेन्स के पुराने पब तक सहेज कर रखे हैं। वहां जाकर एक सुकून मिला कि लेखक होना उल्लेखनीय तो है।
मल्लिका का मूक आह्वान
बनारस के लोगों और भारतेंदु परिवार के सदस्यों ने मुझे आमंत्रित किया था। (उपन्यास ‘मल्लिका’ में भारतेंदु एक अहम किरदार हैं) वह अनुभव जीवन सबसे अनूठा अनुभव था। मल्लिका की उपस्थिति की कल्पना सिहराती रही। चौखंभा की वह पतली-पतली गलियां, एक मुहाने पर भारतेंदु भवन था।
उस रोज बनारस के बहुत से लोग उस भवन में बहुत दिनों बाद एकत्र हुए थे और मल्लिका की भारतेंदु जी के जीवन में भूमिका पर चर्चा हुई। सभी अभिभूत थे कि बहुत दिनों बाद वे पतली गलियों में पैदल चल कर पहुंचे थे। भारतेंदु जी का कमरा, वह छत देखी। गली के पीछे मल्लिका का घर तो ढहा कर कुछ और बना दिया गया है, लेकिन भारतेंदु भवन में उनके वंशजों ने पुरानी सब चीजें सहेज रखी थीं। मुझे बार बार लगा कि छतों की उस भूलभुलैया में मल्लिका कहीं खड़ी मेरा मूक आह्वान कर रही हैं। संयोग ये था कि मेरी कल्पना की भारतेंदु हवेली और इस हवेली में कोई अंतर न था। मैं वे पल कभी नहीं भूल सकती हूं।