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ज्वाला का साक्षात रूप है पोकरण का मां जाज्वला मैया मंदिर

ऐसा ही एक मां जाज्वला देवी का मंदिर कस्बे के फलसूंड रोड पर स्थित है। जिसकी पश्चिमी व उत्तरी राजस्थान की मरुभूमि में एक अलग पहचान है।

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शक्ति और भक्ति के केन्द्र पोकरण ने एक तरफ परमाणु परीक्षण को लेकर विश्व में पहचान कायम की है, दूसरी तरफ यहां स्थित विभिन्न ऐतिहासिक मंदिरों के चलते आध्यात्मिक व देविक शक्ति को लेकर यहां कई ऐसे आस्था केन्द्रों का निर्माण हुआ है, जो देश के किसी भी क्षेत्र में नहीं है। ऐसा ही एक मां जाज्वला देवी का मंदिर कस्बे के फलसूंड रोड पर स्थित है। जिसकी पश्चिमी व उत्तरी राजस्थान की मरुभूमि में एक अलग पहचान है। पुष्करणा ब्राह्मण समाज के वेद व्यास व भारद्वाज ऋषि के वंशज व्यास जाति की कुलदेवी मां जाज्वला का मंदिर कस्बे के पूर्व दिशा की ओर आबादी क्षेत्र के निकट व फलसूंड-बाड़मेर रोड पर स्थित है। यह मंदिर स्थानीय ही नहीं जैसलमेर, जोधपुर, फलोदी, बीकानेर व नागौर क्षेत्र में निवास कर रहे व्यास जाति के लिए सबसे बड़ा आस्था का केन्द्र है। यहां सुबह शाम वैदिक मंत्रों के उच्चारण के साथ घंटे घडिय़ालों, कीर्तन व आरती के स्वर सुनाई देते हैं।

वर्षों से जल रही अखंड ज्योत

हिमाचल में ज्योति रूप में ज्वालाजी शक्ति पीठ में ज्वालाओं को देखकर आमजन ही नहीं वैज्ञानिक भी आश्चर्यचकित है। इसी ज्वाला देवी का एक ऐतिहासिक मंदिर मां जाज्वला देवी के रूप में कस्बे में स्थित है। मंदिर की स्थापना करीब 600 वर्ष पूर्व स्थानीय व्यास जाति के वंशजों की ओर से की गई। मंदिर में साक्षात देवी के रूप में गत कई वर्षों से अखण्ड ज्योत जल रही है। मंदिर की देखभाल व व्यवस्था स्थानीय व्यास ट्रस्ट की ओर से की जा रही है।

श्रद्धालुओं की रहती है रेलमपेल

व्यास बगेची परिसर में ही जाज्वला मैया मंदिर के ठीक सामने नर्बदेश्वर महादेव व शिरडी के सांई बाबा का मंदिर स्थित है। एक तरफ शिव मंदिर में वर्षभर में कई बार रुद्राभिषेक व सहस्त्रघट का आयोजन होता है। दूसरी तरफ चैत्र व शारदीय नवरात्रा के दौरान यहां दर्शनार्थियों की रेलमपेल लगी रहती है।

यह है मान्यता

मान्यता के अनुसार संपूर्ण देवताओं के शरीर से प्रकट हुए तेज से एकत्रित होकर मां जाज्वला का नारी रूप परणित होने का भी दुर्गा सप्तशती महापुराण में उल्लेख है और जाज्वला देवी सभी लोकों को प्रकाशित कर जीवों का कल्याण करती है। इसी देवी शक्ति मां जाज्वला के बारे में देवियाण ग्रंथ में लिखा है 'देवी मंगला रूप तू, ज्वालमाला, देवी कंढ़ला रूप तूं मेघ काला। देवी अनल रूप आकाश भस्मे, देवी मानवा रूप मृतलोक रमे।।’ अर्थात् हे देवी अग्नि में ज्वाला रूप और काले बादलों में बिजली रूप में आप ही है। आकाश में आप अनल पक्षी के रूप में भ्रमण करती है और मृत्यु लोक में मनुष्य के रूप में आप ही रमण करती हैं।

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