
शहर में सड़क के बीच लड़ते सांड
झालावाड़। राज्य सरकार ने पंचायत समिति स्तर पर निराश्रित नंदियों के संरक्षण के लिए वर्ष 2022-23 के बजट में नंदी शाला योजना की घोषणा की थी, लेकिन चार साल बाद भी जिले में यह योजना धरातल पर नहीं उतर सकी है। नतीजतन जिले के शहरों और गांवों में बेसहारा नंदी किसानों की फसलों को नुकसान पहुंचाने के साथ-साथ राहगीरों के लिए भी बड़ा खतरा बने हुए हैं। आए दिन सड़कों पर नंदियों के बीच होने वाली लड़ाई से लोग घायल हो रहे हैं और कई मामलों में जान तक जा चुकी है।जिले में 8 पंचायत समितियां होने के बावजूद अब तक एक भी नंदी शाला पूरी तरह संचालित नहीं हो सकी है। ऐसे में सरकारी घोषणाएं केवल कागजों तक सीमित नजर आ रही हैं। योजना का उद्देश्य निराश्रित नंदियों के संरक्षण के साथ किसानों और पशुपालकों को राहत देना था, लेकिन प्रशासनिक सुस्ती और भूमि संबंधी अड़चनों के कारण इसका लाभ लोगों तक नहीं पहुंच पाया।
पशुपालन विभाग के अनुसार योजना के तहत वर्ष 2022-23 में पहली बार आवेदन आमंत्रित किए गए थे। जिले की आठ पंचायत समितियों में से केवल दो स्थानों से ही पहल हुई। विभागीय अधिकारियों का कहना है कि नंदी शाला के लिए 10 बीघा भूमि की अनिवार्य शर्त के कारण अधिकांश संस्थाएं आवेदन ही नहीं कर पा रही हैं।
हालांकि झालरापाटन में निर्माणाधीन नंदी शाला का करीब 40 प्रतिशत कार्य पूरा हो चुका है। वहीं सुनेल पंचायत समिति क्षेत्र के हरनावदा गजा से आवेदन प्राप्त हुआ है, जिस पर प्रशासनिक स्वीकृति की प्रक्रिया चल रही है।
योजना के तहत प्रत्येक पंचायत समिति स्तर पर नंदी शाला निर्माण के लिए करीब 1.57 करोड़ रुपए की लागत निर्धारित की गई है। सरकार कुल लागत का 90 प्रतिशत तक अनुदान देती है, जबकि संस्था को केवल 10 प्रतिशत राशि का योगदान करना होता है।
निर्माण के लिए दो किश्तों में 40-40 प्रतिशत अनुदान और कार्य पूर्ण होने पर शेष राशि दी जाती है। इसके अलावा नंदियों के भरण-पोषण के लिए भी 12 माह तक अनुदान का प्रावधान है। जिले में संस्थाओं की रुचि नहीं दिखना कई सवाल खड़े कर रहा है।
फसलों को भी हो रहा भारी नुकसानग्रामीण क्षेत्रों में किसान रातभर खेतों की रखवाली करने को मजबूर हैं। नंदियों के झुंड खेतों में घुसकर मक्का, सोयाबीन, उड़द और अन्य फसलों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। किसानों का कहना है कि यदि पंचायत समिति स्तर पर नंदी शालाएं शुरू हो जाएं तो फसलोंऔर आमजन दोनों को राहत मिल सकती है।। ऐसे में सरकारी घोषणाएं केवल कागजों तक सीमित नजर आ रही हैं। योजना का उद्देश्य निराश्रित नंदियों के संरक्षण के साथ किसानों और पशुपालकों को राहत देना था, लेकिन प्रशासनिक सुस्ती और भूमि संबंधी अड़चनों के कारण इसका लाभ लोगों तक नहीं पहुंच पाया।
केस-1:
झालावाड़ शहर की इन्द्रा कॉलोनी निवासी कपिल शर्मा अपने मित्र के साथ खड़े थे। इसी दौरान लड़ते हुए नंदियों ने उन्हें नाले में गिरा दिया। गंभीर घायल कपिल की जयपुर ले जाते समय मौत हो गई।
केस-2:
झालरापाटन कस्बे में एक वृद्ध पर सांड ने हमला कर दिया। गंभीर रूप से घायल वृद्ध की उपचार के दौरान मौत हो गई।
केस-3:
झालावाड़ पशु चिकित्सालय के सामने आवारा गोवंश से टकराकर चाय विक्रेता मनोज की मौत हो गई।
नंदी शाला खोलने के लिए 10 बीघा भूमि की अनिवार्य शर्त होने के कारण कई संस्थाएं आवेदन नहीं कर पा रही हैं। झालरापाटन नंदी शाला का करीब 40 प्रतिशत कार्य पूरा हो चुका है। हरनावदा गजा से आवेदन प्राप्त हुआ है, जिस पर प्रशासनिक स्वीकृति की प्रक्रिया जारी है।
Updated on:
03 Jul 2026 07:45 pm
Published on:
03 Jul 2026 07:33 pm
