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शहादत दिवस पर विशेष : ‘खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी’

18 जून 1858 को रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों से लड़ते हुए अपने प्राणों की आहुति दे दी थी

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Hariom Dwivedi

Jun 18, 2016

Rani Laxmi bai

Rani Laxmi bai

बीके गुप्ता
झांसी. घोड़े की सवारी, पीठ पर बंधा दत्तक पुत्र, दांतों से दबी घोड़े की लगाम और दोनों हाथों से तलवार चलाकर अंग्रेजों का मुकाबला करती रानी झांसी की वीरगाथा का चित्रण सुभद्रा कुमारी चौहान ने अपनी कविता में बहुत खूब किया है। उनकी रचना 'बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी' लोगों के दिलोदिमाग से उतरती ही नहीं हैं। काशी की मनु ने झांसी की रानी बनकर सन 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए। 18 जून 1858 को रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों से लड़ते हुए अपने प्राणों की आहुति दे दी थी।

काशी में 1835 में हुआ था जन्म
काशी में 19 नवंबर 1828 को मोरोपंत तांबे की पत्नी भागीरथ बाई के एक कन्या का जन्म हुआ। उसका नाम मनु रखा गया। मनु के पिता काशी से बिठूर बाजीराव पेशवा के पास चले गए। बचपन में अपने सौंदर्य के कारण उन्हें छबीली कहा जाता था। बाजीराव की कोई संतान नहीं थी। इसलिए उन्होंने एक बालक को गोद लिया, जो बाद में नाना साहब कहलाया। छबीली का बचपन नाना के साथ घुड़सवारी और युद्धादि खेल में बीता।
बचपन में ही दिखा दिया था युद्ध कौशल
एक बार गंगातट के खुले मैदान में नाना ने मनु को तलवार युद्ध की चुनौती दे डाली। दोनों में तलवारबाजी शुरू हुई। सभी लोग खड़े-खडे यह नजारा देखते रहे। देखते ही देखते मनु ने नाना पर ऐसा वार किया कि नाना बिना तलवार के ही भूमि पर गिर पड़े और मनु की तलवार नाना के सीने पर थी। इसके बाद नाना ने कभी मनु की तलवार क्षमता और युद्ध संचालन पर संदेह नहीं किया। उन्हें मनु पर गर्व था कि वह युद्ध संचालन में एक कुशल योद्धा थी।

राजा गंगाधर राव से विवाह के बाद मनु बन गईं रानी लक्ष्मीबाई
मनु से छबीली और छबीली से झांसी की रानी लक्ष्मीबाई। यही मोरोपंत की पुत्री मणिकर्णिका का भाग्य था। झांसी के राजपुरोहित तात्या दीक्षित ने मनु की कुंडली देखी। उसने झांसी के राजा गंगाधर राव के साथ मनु के विवाह का प्रस्ताव रखा। पेशवा बाजीराव ने भी विवाह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। समय आने पर यह विवाह बड़ी धूमधाम से झांसी के गणेश मंदिर मेंहुआ। मनु ने राजा गंगाधर राव को वरमाला पहनाई। राजकीय सम्मान के साथ मनु को नया नाम मिला झांसी की रानी लक्ष्मीबाई।

'अपनी झांसी नहीं दूंगी' का किया था ऐलान
राजा गंगाधर राव की मृत्यु के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी के गवर्नर जनरल लार्ड डलहौजी ने विलय का सिद्धांत बनाया और उसके तहत रानी लक्ष्मीबाई के दत्तक पुत्र दामोदर राव के राजसिंहासन पर बैठने का अधिकार खारिज करके झांसी को अपने अधीन कर लिया। रानी को साठ हजार रुपये पेंशन दिए गए और झांसी के महल को छोड़ने का आदेश दे दिया। तभी रानी ने ऐलान किया कि मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी। उन्होंने झांसी की रक्षा के लिए स्वेच्छा सैनिकों को मजबूत किया। इसमें सुंदर, मुंदर, जुही जैसी महिला सैनिकों के साथ गुलाम गौस खां, दोस्त खां, खुदा बख्श, दीवान रघुनाथ सिंह और दीवान जवाहर सिंह आदि थे।

झांसी का परित्याग और कालपी की ओर कूच
20 मार्च 1858 का वह काला दिन। इसी दिन अंग्रेजी सेनानायक जनरत ह्यूरोज ने फौज के साथ झांसी के किले को घेर लिया था। तीन दिन की घेराबंदी के बाद 23 मार्च को युद्ध शुरू हुआ। रानी लक्ष्मीबाई, उनकी सेना और जनता ने अंग्रेजी फौज का डटकर मुकाबला किया। हजारों लोग आहत और हताहत हुए। इसके बावजूद रानी ने हार नहीं मानी। दुर्भाग्यवश दूल्हाजू जैसे देशद्रोहियों ने ओरछा द्वार खोल दिया। अंग्रेजों ने नगर में मारकाट मचा दी। नगर युद्धस्थल में बदल गया। दस दिन तक मारकाट, आगजनी और लूटपाट होती रही। 4 अप्रैल को रानी किले से बाहर निकलीं और अपने विश्वस्त सिपाहियों के साथ कालपी की ओर कूच कर गईं।

कालपी में अंग्रेजों से हुआ महासंग्राम
झांसी से रानी लक्ष्मीबाई कालपी पहुंची। वहां तात्या टोपे, राव साहब, बख्तबली और अन्य प्रमुख सेनानायकों से वह मिलीं। सबने मिलकर ग्वालियर किले पर अधिकार करने की योजना बनाई। दूसरी ओर झांसी के किले पर विजय प्राप्त करने के बाद अंग्रेजी सेना भी कालपी पहुंची। वहां अंग्रेजी फौज ने कालपी के किले को घेर लिया। कालपी में अंग्रेजी सेना में घमासान युद्ध हुआ। अंग्रेजों को पीछे हटना पड़ा। जनरल डवाकर घायल होकर भाग खड़ा हुआ। इसी बीच दामोदर राव को पीठ पर बांधे हुए और दांतों से घोड़े की लगाम पकड़े रानी लक्ष्मीबाई युद्ध करती हुई अंग्रेजों से दूर चली गई। उनके साथ उनके विश्वासपात्र सैनिक भी थे।

ग्वालियर संग्राम में घिरीं रानी पर अंग्रेजों के क्रूर प्रहार
झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के नेतृत्व में सभी सेनानायकों ने सरलता से ग्वालियर किले पर अधिकार कर लिया। ग्वालियर के राजा सिंधिया अंग्रेजों की शरण में आगरा चले गए। ग्वालियर की सेना और जनता ने रानी का स्वागत किया और सहायता की। 17 जून 1858 को अंग्रेजों की एक बड़ी फौज ने ग्वालियर को घेर लिया। दोनों सेनाओं में घमासान हुआ। रानी लक्ष्मीबाई किले से बाहर निकली और आगे बढ़ने ली। अंग्रेज उनका पीछा कर रहे थे। रानी का घोड़ा नया था। वह स्वर्ण रेखा नाला पार नहीं कर सका। रानी के चारों ओर फिरंगी सैनिक थे। इसी बीच सैनिकों ने रानी झांसी पर हमला कर दिया। इससे रानी अचेत हो गईं। इसी बीच रानी के सैनिकों ने अंग्रेजों की टुकड़ी का सफाया किया और रानी को लेकर सैनिक आगे बढ़ गए। वहां गंगादास की कुटी में रानी ने सैनिकों से अपनी चिता बनवाई और खुद अग्नि प्रज्ज्वलित करके खुद को बलिदान कर दिया।

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