सवा साल पहले तक जो ङ्क्षजदगी हिम्मत और हौसलों से भरी हुई थी वो अब बोझ लगने लगी है। जिस आंगन में कभी बच्चों के सुनहरे भविष्य के ख्वाब बुने जा रहे थे। वहां अब 'बेबसीÓ का आलम है। यहां एक दिन सब कुछ ठीक हो जाने की केवल 'उम्मीदÓ ही बची है। जमा पूंजी तो इलाज में कब की ही खर्च हो चुकी है। इस परिवार को आर्थिक मदद के लिए किसी 'मसीहाÓ का भी इंतजार है। यह पीड़ा है मण्ड्रेला के कृष्ण कुमार मेघवाल के परिवार की।
कृष्ण कुमार मूलरूप से गांव तातीजा का रहने वाला है। परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होने के कारण बचपन में कृष्ण मण्ड्रेला में अपनी बहन के आकर रहने लगा था। बाद में शादी करके मण्ड्रेला में ही बस गया। 25 वर्षीय कृष्ण कुमार मजदूरी करके परिवार चला रहा था। करीब सवा साल पहले तक मजदूरी के दौरान छत की पट्टी टूटकर उसके ऊपर गिर गई।
गंभीर रूप से घायल हुए कृष्ण को स्थानीय अस्पताल से जयपुर रैफर किया गया। तब उसकी रीढ़ की हड्डी में फैक्चर होने का पता चला। चिकित्सकों ने रीढ़ की हड्डी का ऑपरेशन भी किया, मगर सुधार नहीं हुआ और इसके बाद तो कृष्ण की जिंदगी घर पर चारपाई तक सिमट कर रह गई।
आठ सदस्य, कमाने वाले था अकेला
कृष्ण के परिवार में चार बेटी व दो बेटे हैं। सबसे बड़ी बेटी 11 साल की है। साथ ही कृष्ण कमाने वाला घर में अकेला था। अब उसकी यह स्थिति हो जाने पर यह परिवार पेट भरने की भी समस्या से जूझने लगा है।
पूर्व प्रधान कर रही मदद
परिवार की मदद रिश्तेदारों के साथ-साथ चिड़ावा की पूर्व प्रधान गायत्री पूनिया भी कर रही हैं। पूनियां ने परिवार की तीन बड़ी बेटियों की शिक्षा का बीड़ा उठा रखा है। वे तीनों को अपने स्कूल ग्रामोत्थान सीनियर सैकण्डरी में पढ़ा रही हैं।