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रास आ रही पपीता की बागवानी, किसानों की बढ़ी आमदनी

Papaya horticulture is becoming popular, increased income of farmers गांव बाईजट्ट में परम्परागत खेती के साथ रोपे पौधे

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अनिल दत्तात्रेय
हिण्डौनसिटी. सूरौठ क्षेत्र के गांव बाईजट्ट में किसानों को परम्परागत खेती के साथ बागवानी भी रास आने के लगी है। खाद्यान्न की फसल के साथ खेत में फलोत्पादन होने से किसानों की आमदनी बढ़ गई है। क्षेत्र में आधा दर्जन किसान सीजन की फसल के साथ पपीता की बागवानी कर रहे हैं। देशी किस्म की पपीता की मांग के चलते किसानों के जीवन खुशहाली की मिठास घुलने लगी है।
बाईजट्ट गांव के किसान राधेश्याम रावत, राजाराम सहित अन्य किसानों ने दो वर्ष पहले खेतों का दोहरा उपयोग कर परम्परागत खेती के साथ बागवानी की शुरुआत की। इसके चलते किसानों ने खेतों में मेड़ और सिंचाई की नाडियोंं के किनारे के देशी किस्म के पपीता के पौधे रोपे। आधा दर्जन किसानों ने करीब 6 बीघा क्षेत्रफल के खेतों में पपीता के करीब 1500 पौधे रोप दिए। एक वर्ष के अंतराल में पौधों के बड़े होने फल लगना शुरू हो गया। अन्य किस्मों की तुलना में मीठा और बीजों से भरे सुनहरे गूदेदार स्वादिष्ट पपीता की क्षेत्र की मंडियों में खूब मांग हैं। आस-पास की मंडियों में थोक फल विक्रेता गांव पहुंचकर पपीता की खरीदारी कर रहे हैं। कई किसान सूरौठ, हिण्डौन व बयाना की मंडी में पपीता भेज रहे हैं। पपीता के फलोत्पादन के एक सीजन में किसानों को 2 से 5 लाख रुपए की आमदनी हो रही है। बाइजट्ट गांव के किसानों के नवाचार से प्रेरित हो आस-पास अन्य गांवों के किसान भी पपीता की बागवानी के प्रति रुझान दिखा रहे हैं। किसानों को बागवानी की ओर कदम बढ़ाने से उद्यानिकी विभाग के अधिकारी भी उन्हें प्रोत्साहित कर रहे हैं।

जैविक खाद का कर रहे उपयोग-
किसान राधेश्याम व देवीसिंह ने बताया कि पपीता की बागवानी में पौध तैयार करने से लेकर फल आने तक रासायिक उर्वरक व कीट नाशक का प्रयोग नहीं किया है। उन्होंने पौधों में केवल वर्मी कम्पोस्ट, देशी खाद आदि डाल कर आर्गेनिक बागवानी की है। वहीं फलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीट और मच्छरों को गोंद प्लेट पर बल्व की रोशनी से नियंत्रित किया है।

खुद तैयार किए बीज और पौधे-
किसान राधेश्याम ने बताया कि उन्होंने दो वर्ष पहले के हिण्डौन फल मंडी से खराब(सड़े गले) पपीते खरीद कर बीज तैयार किए। साथ ही गत जून-जुलाई माह में डिस्पोजेबल गिलासों में बीज डाल कर पौध तैयार की। बाद में पौधों को खेत में रोपा गया। एक वर्ष बाद पौधो में फूल आने के बाद फल आना शुरू हो गया। पपीता में अक्टूबर से मई तक फल आते हैं।

इनका कहना है-
सूरौठ के बाइजट्ट गांव में किसान पपीता की बागवानी कर रहे हैं। इससे उन्हें अच्छी आमदनी भी हो रही है। अन्य फलों की भी बागवानी के लिए किसानों को प्रोत्साहित किया जा रहा है।
रामलाल जाट, उपनिदेशक
उद्यानिक विभाग करौली।