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सूरौठ की गणगौर की सवारी में झलकता जयपुर का अंदाज

The style of Jaipur is reflected in the Gangaur ride of Surouth-राजा सवाई रामसिंह द्वितीय के समय शुरू थी सवारीराजसी ठाठ से निकलती है ईसर-गणगौर की शोभायात्रा

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सूरौठ की गणगौर की सवारी में झलकता जयपुर का अंदाज

सूरौठ की गणगौर की सवारी में झलकता जयपुर का अंदाज


सूरौठ (हिण्डौनसिटी). सूरौठ कस्बे में गणगौर की सवारी में आज भी रिसासत कालीन अंदाज कायम है। ईसर-गणगौर की सवारी में जयपुर की गणगौर माता की सवारी के झलक देखने को मिलती है। दो सौ वर्ष से निकल रही गणगौर की सवारी में रिवाज और रीतियां भी रियासतकाल की कायम की हुई हैं। सूरौठ में भी जयपुर की भांति दो दिन ईसर-गणगौर की सवारी निकलती है। बुजुर्गों के अनुसार जयपुर के तत्कालीन राजा रामसिंह द्वितीय के शासलकाल में रिसायत के सूरौठ ठिकाने में जयपुर की तर्ज पर ईसर गणगौर की सवारी निकालने की शुरुआत कराई गई थी। राजपूताना संस्कृति से ओतप्रोत इस त्योहार पर कस्बे में मेला भी भरता है।
बुजुर्गों के अनुसार सूरौठ के ठिकानेदार रहे फतेहसिंह के समय में जयपुर की भांति के गणगौर की सवारी निकलती थी। तब से चैत्र सुदी तीज व चौथ को गणगौर माता व ईसर की सवारी निकालने के साथ चार दिवसीय मेला भरता है। देशी रियासतों का विलय के बाद सूरौठ ठिकानादार परिवार द्वाराईसर-गणगौर की सवारी निकाली जाती रही। ईसर-गणगौर की सवारी में ठिकानेदार परिवार से जुड़े लोग दो सदी पुराने रियासती अंदाज को जीवंत किए हुुए हैं। कई वर्षों से गणगौर की सवारी पुराने गढ़ के साथ सूरौठ महल से भी निकलने लगी है। ऐसे में मेले में एक शोभायात्रा ईसर-गणगौर की दो प्रतिमाएं निकलती हैं। महल व गढ़ से शाम को राजसी अंदाज में गहनों से लकदक गणगौर माता की आदम कद प्रतिमा ईसर के साथ बाहर आती है। सवारी के आगे बंदूक व हथियारबंद लोग रियसतीकालीन झलक बनाते हैं। कस्बे के बाजारों से निकल रात को वापसी में गांधी स्मारक के पास महादेव मंदिर में राजपूत समाज के लोगों द्वारा ईसर-गणगौर को पानी पिलाने की परम्परा का निभाते हैं। बुजुर्गों के अनुसानुसार रियासत काल में गांधी स्मारक के पास बाग में गणगौर की सवारी का पानी परने के लिए ठहराव होता था। वर्तमान में ग्रामपंचायत व पंच-पटेलों की समिति गणगौर सवारी निकालने में सहयोग करती है। सर्वसमाज के लोग मेला व्यवस्थाओं को संभालते हैं।

यों निकालते है दो दिन सवारी-
कस्बा निवासी वेदप्रकाश शर्मा ने बताया कि पैराणिक कथाओं के अनुसार होली केे बाद माता पार्वती (गणगौर) पीहर आई थी। ईसर (महादेव) उन्हें लिवाने ससुराल आए। महादेव का ससुराल में दो दिन का ठहराव होने से सभी जगह दो दिन ईसर के साथ गणगौर की राजसी सवारी निकाली जाती है। दूसरे दिन की सवारी में गणगौर को ईसर के साथ ससुराल के लिए विदा किया जाता है। घरों में भी महिलाओं द्वारा दूसरे दिन मिट्टी के ईसर-गणगौर को सिरा (कुए व तालाब ) कर विदा किया जाता है।