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अनूठी परंपरा : यहां भंडारे में जूठी पत्तल उठाने की लगती है बोली, जिसकी कीमत सबसे ज्यादा उसी को मिलता है मौका

गणगौर पर्व के दौरान चलने वाले भंडारे में जूठी पत्तल उठाने के लिए बाकायदा बोली लगाई जाती है।

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अनूठी परंपरा : यहां भंडारे में जूठी पत्तल उठाने की लगती है बोली, जिसकी कीमत सबसे ज्यादा उसी को मिलता है मौका

अकसर आपने किसी भंडारे या सार्वजनिक भोज में देखा होगा कि, भोजन करने के बाद संबंधित शख्स को अपनी पत्तल खुद उठाकर कचरा दान में डालनी होती है। हालांकि, इनमें कई लोग ऐसे भी देखे होंगे जो भोज के दौरान अपनी ही जूठी पत्तल या बर्तन उठाने से कतराते हैं। खैर ये तो हो गई एक आम बात, लेकिन मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में होने वाले गणगौर पर्व के दौरान चलने वाले भंडारे में जूठी पत्तल उठाने के लिए बाकायदा बोली लगाई जाती है। जिसकी बोली सबसे ज्यादा होती है, उसे ही जूठी पत्तल उठाने का मौका दिया जाता है।

आपको बता दें कि, जिले के अंतर्गत बड़ी संख्या में रहने वाले गुरुवा और कहार समाज के लोग इस काम को करना पुण्य का कार्य समझते हैं। जूठी पत्तल के लिए लगाई जाने वाली बोली का पैसा अगले वर्ष माता के भंडारे के लिए इस्तेमाल किया जाता है। यह अनूठी परंपरा सिर्फ निमाड़ के खंडवा में ही मनाई जाती है।

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मालवा और निमाड़ में बेहद प्रसिद्ध है गणगौर पर्व

इन दिनों निमाड़ और मालवा में प्रसिद्ध गणगौर पर्व की धूम है। गणगौर पर्व पर रणु और धनियर राजा को शिव-पार्वती मानकर पूजा की जाती है। आयोजन बाकायदा किसी विवाह समारोह से कम नहीं होता। इसमें मेहंदी की रस्म के साथ साथ झालरिया गीत गाए जाते हैं। रणु बाई को बेटी की तरह मानकर यहां खूब मान - मनुहार होती है। 9 दिनों तक चलने वाला ये पर्व होली के बाद शुरू होता है। इस पर्व में होली की राख और गेहूं मिलाकर माता की मूठ यानी घटस्थापना की जाती है। इसके बाद बांस की टोकरी में मिटटी डालकर गेंहू बोए जाते हैं। इस काम को बाड़ी कहते हैं, जिसे आठ दिनों तक सींचा जाता है। आठवें दिन दर्शन के लिए इस स्थान को खोला जाता है। इसके बाद लोग इन्हें लेकर अपने घर जाते हैं और नेवैद्य लगाने और भंडारा करने के बाद माता को पानी पिलाने और झालरिये देने बाग-बगीचे में ले जाया जाता है। इस तरह गणगौर पर्व मनाया जाता है।


इस बार बंगाली वेशभुषा में माता का शृंगार

इस वर्ष गुरुवा और कहार समाज ने गणगौर माता को बंगाली संस्कृति के रंग में रंगा है। जिस तरह से बंगाली दूल्हा और दुल्हन वेशभूषा धारण करते हैं, वैसी ही वेशभूषा गणगौर माता को पहनाई जाती है। गणगौर माता बैठाने वाली साधना सोमनाथ का कहना है कि, हम हर साल भारतीय संस्कृति के अनुसार अलग - अलग जगहों की वेशभूषा में माता का शृंगार करते हैं। इस बार हमने बंगाली वेशभुषा में माता का शृंगार किया है।

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80 साल पुरानी है जूठी पत्तल उठाने की परंपरा

गुरुवा और कहार समाजजनों की मानें तो जूठी पत्तल उठाना पुण्य काम है। समाज के सोमनाथ काले का कहना है कि, जूठी पत्तल उठाने की परंपरा लगभग 80 साल से निभाई जाती आ रही है। इसे उनके बुजुर्गों ने शुरू किया था। जूठी पत्तल उठाने की ये परंपरा समाज में सामाजिक समरसता को बढ़ाती है। इससे समाज का एक धनी व्यक्ति भी जूठी पत्तल उठाने की बोली लगाकर समाज के गरीब व्यक्ति की जूठी पत्तल सहर्ष उठाता है। अब हर पंगत पर बोली लगती है। इस बार से आने वाले साल के लिए होने वाले माता के भंडारे का अनाज और अन्य जरूरत की चीजों की बोली लगाई गई है। बोली की राशि का उपयोग आगामी साल में होने वाले भंडारे में किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि, माता की पूजा में जो लोग भोजन करने आते हैं, उनकी जूठी पत्तलें उठाने पर उन्हें माता का विशेष आशीर्वाद मिलता है।