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पारंपरिक प्याली से ‘तंदूरी और बबल्स’ तक पहुंची हमारी चाय

दार्जिलिंग की चाय को 'चाय की शैंपेन' कहा जाता है। दक्षिण भारत में तमिलनाडु (नीलगिरि), केरल और कर्नाटक मिलकर देश का लगभग 17% चाय उत्पादन करते हैं।
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कोलकाता

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MUKESH VYAS

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Updated: 21 May 2026, 3:40 PM IST

tea prices impact exports

भारतीय चाय पर संकट (इमेज सोर्स- IANS)

दुनिया भर में महक रही है देश की माटी की खुशबू

आज जब दुनिया अंतर्राष्ट्रीय चाय दिवस मना रही है, तो भारतीय चाय उद्योग न सिर्फ देश के भीतर अपनी जड़ों को नया रूप दे रहा है, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी सफलता के नए रिकॉर्ड दर्ज करा रहा है। पश्चिम बंगाल की सिलीगुड़ी नीलामी खिड़की से लेकर दुनिया के कोने-कोने तक, चाय एक बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुकी है। चाय की खेती के लिए 20 से 30 का तापमान और सालाना 150 से 250 सेमी की भारी वर्षा की आवश्यकता होती है। इसके पौधों के लिए अम्लीय और अच्छे जलभराव रहित ढलानी क्षेत्र की जरूरत होती है, ताकि जड़ों में पानी न रुके। यही कारण है कि पहाड़ियों और ढलानों पर चाय के बागान खूब फलते-फूलते हैं।

कोलकाता. देश के कुल चाय उत्पादन का लगभग 83% से अधिक हिस्सा उत्तर-पूर्वी भारत (असम और पश्चिम बंगाल) क्षेत्र से आता है। असम की 'असम वैली' और 'कछार' क्षेत्र तथा पश्चिम बंगाल के 'दार्जिलिंग', 'डूआर्स' और 'तराई' क्षेत्र अपनी विशिष्ट सुगंध के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं। दार्जिलिंग की चाय को 'चाय की शैंपेन' कहा जाता है। दक्षिण भारत में तमिलनाडु (नीलगिरि), केरल और कर्नाटक मिलकर देश का लगभग 17% चाय उत्पादन करते हैं। भारतीय चाय बोर्ड के ताजा आंकड़ों के अनुसार, भारतीय चाय के निर्यात ने हाल ही में 280 मिलियन किलोग्राम (लगभग 28 करोड़ किलो) का सर्वकालिक रिकॉर्ड स्तर छुआ है, जिससे देश को लगभग 8,488 करोड़ रुपए से अधिक की विदेशी मुद्रा प्राप्त हुई है।

चाय का बदलता स्वरूप: 'टपरी' से 'कैफे' और 'हेल्थ-शॉट' तक

भारतीयों के दिलों पर राज करने वाली चाय ने समय के साथ खुद को पूरी तरह 'री-इन्वेंट' किया है। कभी घर की रसोइयों और नुक्कड़ की टपरियों तक सीमित रहने वाली कड़क दूध-चीनी वाली चाय आज एक लग्जरी और लाइफस्टाइल स्टेटमेंट बन चुकी है। नुक्कड़ की दुकानों पर अब पारंपरिक चाय के साथ-साथ 'तंदूरी चाय', 'चॉकलेट चाय' और 'मसाला क्रश चाय' जैसे नए प्रयोग युवाओं को लुभा रहे हैं। वहीं देश के महानगरों और अब छोटे शहरों में भी 'चाय कैफे' तेजी से लोकप्रिय हुए हैं, जहां चाय की दर्जनों किस्में कॉर्पोरेट बैठकों का हिस्सा बन रही हैं। लोगों में स्वास्थ्य के प्रति सजगता बढ़ने से फिटनेस के दौर में अब ग्रीन टी, माचा टी, कैमोमाइल, हिबिस्कस (गुड़हल) और वाइट-टी, वेलनेस टी की मांग में भारी उछाल आया है। इसे अब लोग बीमारी से बचाव और 'डिटॉक्स' के रूप में अपना रहे हैं। इसी क्रम में ताइवान से आई 'बबल टी' (टैपिओका बॉल्स से बनी ठंडी चाय) ने भारतीय युवाओं के बीच एक नया बाजार खड़ा कर दिया है।

भारत से निर्यात होने वाली कुल चाय में लगभग 96% हिस्सेदारी 'ब्लैक टी'

भारत से निर्यात होने वाली कुल चाय में लगभग 96% हिस्सेदारी 'ब्लैक टी' (काली चाय) की होती है। इसके अलावा ग्रीन टी और हर्बल टी का निर्यात भी धीरे-धीरे बढ़ रहा है। दुनिया का सबसे बड़ा चाय उत्पादक होने के बावजूद चीन में भारतीय 'असम ऑर्थोडॉक्स' (पारंपरिक पत्ती वाली चाय) की मांग में अप्रत्याशित उछाल आया है। रूस पारंपरिक रूप से भारतीय चाय के सबसे बड़े बाजारों में से एक रहे हैं। अमेरिका और ब्रिटेन के साथ हुए नए व्यापार समझौतों के बाद प्रीमियम दार्जिलिंग और नीलगिरि की चाय की मांग और मजबूत हुई है। जबकि राजनीतिक उथल-पुथल के बावजूद भारतीय मर्चेंट निर्यातकों ने ईरान और तुर्की जैसे खाड़ी देशों में अपनी मजबूत पैठ बनाए रखी है।

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भारतीय चाय का वैश्विक डंका

भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चाय उत्पादक देश है और दुनिया का सबसे बड़ा चाय उपभोक्ता भी है (यहां उत्पादित कुल चाय का लगभग 80% हिस्सा घरेलू बाजार में ही पी लिया जाता है)। भारतीय चाय मुख्य रूप से जिन देशों की सुबह को तरोताजा कर रही है उनमें इराक, यूएई, चीन, रूस, सीआईएस, अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देश प्रमुख रूप से शामिल है। इराक और यूएई (संयुक्त अरब अमीरात) वर्तमान में भारतीय चाय के सबसे बड़े खरीदार बनकर उभरे हैं, जहां पारंपरिक और सीटीसी चाय की भारी मांग है।