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हाइब्रिड बीजों से बंजर हो रही उपजाउ भूमि

जिले में किसान साल दर साल हाइब्रिड बीजों का उपयोग करते जा रहे हंै। इससे मिट्टी की उर्वरा शक्ति भी धीरे-धीरे खत्म होने लगी है।

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Ajay Shrivastava

Jun 14, 2016

Low production capacity

Multinational Hybrid Seeds

कोण्डागांव.
जिले में किसान साल दर साल हाइब्रिड बीजों का उपयोग करते जा रहे हंै। इससे मिट्टी की उर्वरा शक्ति भी धीरे-धीरे खत्म होने लगी है। मानसून के दस्तक देने के साथ ही मल्टीनेशनल हाइब्रिड बीज कंपनियों के नुमाइंदे ग्रामीण इलाकों के किसानों को लुभाने उनके खेतों तक पहुंच रहे है।


जिले में इन दिनों दो दर्जन से अधिक कंपनियों के बीज खुले बाजार में बिक रहे है, किसान भी अधिक उत्पादन के लालच में लगातार हाइब्रिड बीजों का उपयोग करते जा रहे है।


जिससे उत्पादन में तो अन्य बीजों की अपेक्षा किसान को लाभ हो रहा है, लेकिन यह लाभ अधिक समय के लिए नहीं रह जाएगा। जानकारों के मुताबिक लगातार हाइब्रिड बीज का उपयोग करते रहने से एक समय के बाद जमीन से उत्पादन की क्षमता कम हो जाती है, इसका मुख्य कारण हाइब्रिड ब्रीज में लगने वाले खाद व दवाइयों की अधिक मात्रा है।


जिले में धान की अपेक्षा स्थानीय किसान मक्का की फ सल कही अधिक मात्रा लेते है। कृषि विभाग के दस्तावेजों के अनुसार वर्तमान में जिले में 80 से अधिक हाइब्रिड बीजों के दुकान संचालित हो रहे है।


भविष्य में उत्पादन हो सकता है कम

कृषि वैज्ञानिक डॉ. आदिकांत प्रधान के मुताबिक लगातार हाइब्रिड बीजों के उपयोग करने से भूमि की पोषक तत्व कम हो जाता है जिससे उत्पादन में कमी देखने को मिल सकता है। अन्य बीजों के लेने से जो पोषक तत्व पांच साल से कम होने पर वह हाइब्रिड बीज लेने से एक से दो साल में ही उतनी ही पोषक तत्व की कमी होती है। जिसके लिए अधिक मात्रा में रायानिक खादों का उपयोग करना पड़ेगा जिससे आने वाले समय में भूमि बंजर होने का खतरा हो सकता है।


गांव की एक संस्था कर रही संरक्षण

जिले के गोलावंड इलाके की संस्था धरोहर वर्षो से देशी किस्म की विलुप्त होती धान की प्रजातियों के बीजों को संरक्षित करने में जुटी हुई है। संस्था के पास 200 से अधिक विभिन्न किस्म की प्रजातियों के बीज संरक्षित कर रखे गए है। संस्था के शिवनाथ यादव ने बताया कि आजकल विभिन्न तरह के हाईब्रीड बीज बाजार में उपलब्ध तो है, लेकिन इनमे वो स्वाद नहीं जो दशी प्रजाति में है, इसीलिए हम लोग विलुप्त होती धान की प्रजातियों को संग्रहित व संरक्षित करने में लगे हुए है। मांग के आधार पर लोगों को बीज देते भी है।


कर्ज में डूब रहे किसान

महंगाई और फ सलों के उत्पादन में कमी के चलते किसान कर्ज में डूबते जा रहे है। खेती-किसानी में हुए कर्ज व खेती संबंधी अन्य परेशानियों के चलते जिले के दो किसानों ने मौत को गले भी लगा लिया है। बाजार में 80 से 90 रुपए प्रतिकिलो की लागत लगाने वाली धान की हाइब्रिड बीज किसानों के हाथ में पहुंचते-पहुचते 250 से 300 रुपए प्रतिकिलो तक हो जाती है ऐसा ही कुछ खाद व दवाइयों की बिक्री में देखने को मिल रहा है।


बीएस बघेल, सहा.संचालक कृषि
: जैविक पद्वति से खेती करने को प्रोत्साहन दिया जा रहा है, प्रमाणित रिसर्च बीजों में हाइब्रिड बीज की तुलना में कम खाद व दवाई की जरूरत होती है। वही प्रमाणित बीजों के उत्पादन को लगतार दो से तीन वर्षो तक बीज के रूप में लिया जा सकता है, लेकिन हाइब्रिड बीज से हुए उत्पादन को बीज के रूप में उपयोग नहीं किया जा सकता है।


ये है सरकारी आंकड़े

कृषि विभाग से मिली जानकारी के मुताबिक वर्ष 2015-16 में धान का रकबा 27585 हेक्ट. रोपा व मक्का का रकबा 31350 हेक्ट. था। जो वर्ष 2016-17 में बढ़कर 73795 हेक्ट. व मक्का 31577 हेक्ट. रखा गया है। वहीं जिले में कृषि भूमि का पीएच मान 7 से कम है।


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बीते साल की बिक्री

एक निजी हाइब्रिड बीज पैदा करने वाली कंपनी के मुताबिक वर्ष 2015-16 में धान की हाइब्रिड बीज 300 मिट्रिक टन व मक्का 450 मिट्रिक टन से अधिक की बिक्री जिलेभर में हुई थी।

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