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एससी/एसटी आरक्षण पर सियासी बवाल, अखिलेश, मायावती, प्रियंका ने घेरा भाजपा को, दिया बड़ा बयान

अनुसूचित जाति व जनजाति को सरकारी नौकरियों में आरक्षण व प्रमोशन दिए जाने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने देशभर में नया सियासी भूचाल ला दिया है।

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लखनऊ

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Abhishek Gupta

Feb 10, 2020

Akhilesh yadav

Akhilesh yadav

लखनऊ. अनुसूचित जाति व जनजाति के लोगों को सरकारी नौकरियों में दिए जाने वाले आरक्षण व प्रमोशन को लेकर आए सुप्रीम कोर्ट के बयान ने देशभर में नया सियासी भूचाल ला दिया है। तमाम विपक्षी दल इसे केंद्र सरकार की साजिश बताकर भाजपा को घेरने में लगे हैं, तो वहीं केंद्र सरकार उल्टा कांग्रेस पर निशाना साध रही है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी, यूपी प्रभारी प्रियंका गांधी, यूपी अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू, बहुजन समाज पार्टी सुप्रीमो मायावती व समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कोर्ट के फैसले से अपनी असहमति जताते हुए केंद्र सरकार से उचित कदम उठाए जाने की मांग की है।

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भाजपा सरकार आरक्षण को कर रही कमजोर- अखिलेश
अखिलेश यादव ने अपने आधिकारिक ट्विटर अकाउंट पर कुछ तस्वीरें साझा करते हुए कहा कि हमारे देश में सदियों से वंचित दमित-दलित समाज को बराबरी का हक़ देने के लिए आरक्षण एक कारगर उपाय रहा है। वर्तमान भाजपा सरकार लगातार इसे कमजोर कर रही है. हम एस.सी., एस.टी. आरक्षण के साथ-साथ जातियों की गणना के समर्थन में हमेशा रहे हैं ताकि सबको उनके संख्यानुपात में उनका हक़ मिल सके।

केंद्र सरकार कदम उठाए- मायावती

बसपा सुप्रीमो मायावती ने कहा कि कल माननीय कोर्ट ने प्रमोशन में आरक्षण को लेकर जो कुछ कहा है। उससे बी.एस.पी. कतई भी सहमत नहीं है। अतः केन्द्र सरकार से मांग है कि वह इस मामले में तत्काल सकारात्मक कदम उठाये। अर्थात् पूर्व की कांग्रेसी सरकार की तरह इसे लटकाये ना।

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प्रियंका ने भाजपा का आरक्ष खत्म करने का तरीका-

कांग्रेस राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने तीन बिंदुओं में भाजपा पर हमला करते हुए कहा कि भाजपा का आरक्षण खत्म करने का तरीका समझिए-

1. आरएसएस वाले लगातार आरक्षण के खिलाफ बयान देते हैं।

2. उत्तराखंड की भाजपा सरकार सुप्रीमकोर्ट में अपील डालती है कि आरक्षण के मौलिक अधिकार को खत्म किया जाए।

3. उत्तर प्रदेश सरकार भी तुरंत आरक्षण के नियमों से छेड़छाड़ शुरू कर देती है।

4. भाजपा ने पहले दलित आदिवासियों पर होने वाले अत्याचार के खिलाफ बने कानून को कमजोर करने की कोशिश की।

4. अब संविधान और बाबासाहेब द्वारा दिए बराबरी के अधिकार को कमजोर कर रही है।

अजय कुमार ल्ललू ने जताई चिंता-

अजय कुमार लल्लू ने उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग द्वारा पीसीएस समेत अन्य परीक्षाओं की भर्ती में आरक्षण के प्रावधान में किये गये बदलावों पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि इस बदलाव से प्रदेश के लाखों की संख्या मे अन्य पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति और जनजाति के अभ्यर्थी प्रभावित होंगे। दरअसल यूपीपीएससी ने निर्णय लिया है किसी परीक्षा में जिनमे प्रारंभिक परीक्षा, मुख्य परीक्षा, साक्षात्कार और स्क्रीनिंग परीक्षा शामिल है। उसमें किसी भी स्तर पर अन्य पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के आरक्षण का लाभ लेने की स्थिति के संबंध में अभ्यर्थी को उसी की श्रेणी में चयनित किया जाएगा भले ही अंतिम चयन परिणाम में उसका कटऑफ अनारक्षित वर्ग के बराबर या अधिक हो। अजय कुमार लल्लू ने कहा कि यूपीपीएससी के द्वारा आरक्षण के प्रावधान में बदलाव करना संविधान में वर्णित न्याय की संकल्पना यानी ‘‘सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक न्याय’’ का खुला उल्लंघन है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 16 (4) में राज्य के सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों तो उचित अवसर प्रदान करने के लिए राज्य को निर्देशित करता है। इसी के तहत अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़ा वर्ग और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को आरक्षण मिला हुआ है।

भारत की कम्युनिस्ट पार्टी बताया निराशाजनक-

- भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माले) ने सरकारी नौकरियों व प्रोन्नतियों में दलित-आदिवासियों को आरक्षण देने को अनिवार्य करने के बजाए उसे राज्य सरकारों के विवेक पर छोड़ने वाले ताजा आदेश को निराशाजनक बताते हुए इसके लिए भाजपा और उसकी सरकार की नीतियों को जिम्मेदार ठहराया है। पार्टी राज्य सचिव सुधाकर यादव ने इस आदेश को सामाजिक न्याय के खिलाफ बताया। उन्होंने कहा कि इस आदेश के व्यवहारिक क्रियान्वयन में नौकरियों में वंचित समूहों को आरक्षण मिलना ही बंद हो जाएगा। भाजपा और उसका पितृ संगठन आरएसएस यही चाहते भी हैं। कई मौकों पर आरएसएस प्रमुख इसका इजहार भी कर चुके हैं। न्यायालय के ताजा आदेश की पृष्ठभूमि में उत्तराखंड का एक मामला था, जहां भाजपा की सरकार है। मनुस्मृति में विश्वास करने वाले संघ, भाजपा यदि दलितों-आदिवासियों के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रसित न होते, तो उसके अधिवक्ता शीर्ष न्यायालय में आरक्षण के खिलाफ पैरवी न किये होते।

यह था मामला-

2012 में उत्तराखंड में तब की कांग्रेस की सरकार ने सरकारी नौकरी में अनुसूचित जाति एवं जनजाति को आरक्षण दिए बगैर भरने का फ़ैसला किया था। मामला न्यायालय में जाने पर उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने सरकार की अधिसूचना को खारिज कर दिया और सरकार को सरकारी नौकरियों की रिक्तियों में वर्गीकृत श्रेणी के मुताबिक़ आरक्षण कोटे का प्रावधान करे। इस पर रविवार को सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि राज्य सरकार आरक्षण देने को बाध्य नहीं है। ऐसा कोई मूल अधिकार नहीं है, जिसके आधार पर कोई व्यक्ति प्रमोशन में आरक्षण का दावा कर सके। न्यायालय कोई परमादेश नहीं जारी कर सकता है, जिसमें राज्य को आरक्षण देने का निर्देश दिया गया हो।