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गांव की पगडंडियों से चलकर ये बन गए आईएएस, प्रेरणास्पद है इनकी सफलता की कहानी

किसी का सपना पहले प्रयास में पूरा हो गया तो किसी को लंबा इंतजार करना पड़ा।  

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Farmer Son Anubhav

लखनऊ. कोई किसान का बेटा है। कोई बिन बाप का है। किसी ने घोर गरीबी देखी है तो किसी ने अपने लक्ष्य के लिए सुख-सुविधाओं का त्याग कर दिया। किसी का सपना पहले प्रयास में पूरा हो गया तो किसी को लंबा इंतजार करना पड़ा। संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षा में विशिष्ट स्थान हासिल करने वाले युवाओं ने नया आयाम रचा है।
इलाहाबाद के एक किसान के बेटे अनुभव सिंह की आईएएस में आठवीं रैंक आयी है। ग्रामीण पृष्ठभूमि के अनुभव ने आईआईटी से इंजीनियरिंग की है। अभी यह भारतीय राजस्व सेवा में हैं।

अब दूसरे प्रयास के बाद उनका आईएएस बनने का सपना पूरा हुआ है। महज 23 साल की उम्र में उन्होंने वह मुकाम हासिल कर लिया जिसके पूरा होने में लोगों की पूरी उम्र निकल जाती है। अनुभव के पिता धनंजय सिंह किसान हैं। मां सुषमा सिंह एक कॉलेज में क्लर्क हैं। अनुभव के परदादा इलाहाबाद के धनुपुर ब्लाक के प्रमुख थे। जबकि दादा पारसनाथ हंडिया के दसेर में सार्वजनिक इंटर कॉलेज में वाइस प्रिंसिपल थे। हालांकि अनुभव के पिता धनंजय सिंह पूरी तरह से खेती किसानी पर ही आश्रित हैं। अनुभव ने प्रारंभिक शिक्षा हंडिया तहसील के एक छोटे से गांव दसेर से पूरी की है। इलाहाबाद शहर के एक स्कूल से हाईस्कूल और इंटरमीडिएट के बाद इनका चयन आईआईटी रुडक़ी में हो गया। यहां से उन्होंने सिविल इंजिनियरिंग में बीटेक की पढ़ाई की। अनुभव ने अपने पहले ही प्रयास में सिविल सेवा परीक्षा क्रेक की और 683 रैंक के साथ सफलता हासिल की थी।
जौनपुर के सूरज के सिर पर नहीं है पिता का साया
जौनपुर के सूरज कुमार राय अपने गांव में सूरज की तरह चमक रहे हैं। वह आईएएस में अपने चयन के पीछे संयुक्त परिवार के सदस्यों के साथ पिता स्व. महेन्द्र राय को प्रेरणा मानते हैं। मुफ्तीगंज इलाके के पेसारा गांव के निवासी सूरज कुमार राय को आईएएस परीक्षा में 117वीं रैंक मिली है। सूरज ने मोतीलाल नेहरू इंजीनियरिंग कॉलेज से इंजीनियरिंग की है। इनका चयन सहायक कमांडेंट के पद पर भी हुआ है। सूरज का कहना है कि पढ़ाई के लिए घंटे कोई मायने नहीं रखता। जितने समय पढ़ाई करते हैं उसमें ध्यान लगाना ज्यादा मायने रखता है।

सीरत ने जो ठाना उसे पूरा किया
कहते हैं अगर कुछ शिद्दत से ठान लिया जाए तो कोई भी चीज़ नामुमकिन नहीं होती। बस जरूरत होती है उम्मीद बनाए रखने की। इलाहाबाद के एक गांव की सीरत फातिमा ने तो इन लाइनों को चरित्रार्थ कर दिया है। पहले वह टीचर बनीं। गांव से शहर आईं। फिर शादी और घर-परिवार के बीच चौथे प्रयास में आईएएस बन गयीं। उनकी रैंक 810 वीं रैंक है। मूल रूप से इलाहाबाद के जसरा के पवर गांव की रहने सीरत के पिता अब्दुल गनी लेखपाल हैं। मां गृहणी हैं। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से बीएससी सीरत ने बीटीसी के बाद सरकारी टीचर बन गयीं। इलाहाबाद के नुमायाडीह कौडि़हार में प्राथमिक स्कूल में सीरत बेस्ट टीचरों में गिनी जाती हैं।
शिक्षक का बेटा बना आईएएस
उन्नाव. जिले में एक शिक्षक के बेटे ने संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा में सफला प्राप्त की है। गंगा किनारे स्थित पुरवा गांव के आशीष कुमार ने संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा में ८१७वां स्थान प्राप्त किया है। बाढ़ विभीषिका से जूझते इस गांव में कच्चे मकान में टपकती छत के नीचे रहने वाले आशीष कुमार की परवरिश हुई है। आशीष को यह उपलब्धि नौवीं बार में मिली है। आशीष ने युवाओं को संदेश देते हुए कहा कि मेहनत करते रहिए यही आपको प्यादे से वजीर बना है।