
गुमनामी बाबा और नेताजी सुभाष चंद्र बोस दो अलग-अलग व्यक्ति
लखनऊ नेताजी सुभाष चंद्र बोस के रूप में प्रचारित और चर्चित गुमनामी बाबा उर्फ भगवानजी दो अलग अलग व्यक्ति हैं पर दोनों की ढेर सारी खूबियां एक जैसी है। जस्टिस विष्णु सहाय आयोग की रिपोर्ट गुरुवार को विधानमंडल के शीतकालीन सत्र के आखिरी दिन दोनों सदनों में पेश की गई। इस रिपोर्ट में उन्होंने कहाकि गुमनामी बाबा, नेताजी सुभाष चंद्र बोस नहीं हैं।
फैजाबाद के रामभवन में रहने वाले गुमनामी बाबा की हकीकत जानने के लिए हाईकोर्ट के निर्देश पर अखिलेश सरकार ने जस्टिस विष्णु सहाय आयोग का 28 जून 2016 को गठन किया था। आयोग ने 19 सितंबर 2017 को अपनी रिपोर्ट राज्यपाल को सौंपी थी। इस रिपोर्ट को विधानमंडल के शीतकालीन सत्र में गुरुवार को दोनों सदनों में पेश की गई।
गुमनामी बाबा के बारे में आयोग ने अपनी रिपोर्ट में उल्लेख किया है कि गुमनामी बाबा सुभाष चंद्र बोस के अनुयायी थे। जिस समय इसका प्रचार होने लगा था कि वह सुभाष चंद्र बोस हैं, उन्होंने अपना मकान बदल लिया था।
रिपोर्ट के निष्कर्ष में बताया गया कि गुमनामी बाबा बंगाली थे और बंगला, अंग्रेजी व हिंदी भाषाओं के अच्छे जानकार थे। वह एक असाधारण मेधावी व्यक्ति थे। राम भवन के जिस भाग में वह निवास करते थे उसमें बड़ी संख्या में मिलीं बंगला, अंग्रेजी और हिंदी की किताबें इसकी गवाही देती हैं।
गुमनामी बाबा को युद्ध, राजनीतिक और सामयिक विषयों की गहरी जानकारी थी। उनमें प्रचंड आत्मबल और आत्मसंयम था, जिसने उन्हें जीवन के अंतिम 10 वर्षों में अयोध्या और फैजाबाद में पर्दे के पीछे रहने के योग्य बनाया था। जो लोग पर्दे के पीछे से उनसे बात करते थे, वे उनसे सम्मोहित हो जाते थे। वह पूजा और ध्यान में पर्याप्त समय व्यतीत करते थे। संगीत, सिगार और भोजन के प्रेमी भी थे। भारत में शासन की स्थिति से उनका मोहभंग था। रिपोर्ट में कहा गया है कि ऐसे लोग बहुत ही कम होते हैं जो अपनी पहचान जाहिर होने के बजाय मृत्यु को पसंद करते हैं।
Published on:
20 Dec 2019 03:39 pm
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