रागी जत्था जसविंदर ने 'सूरा सो पहिचानिअै जु लरै दीन के हेत, पुरजा-पुरजा कटि मरै कबहु न छाडै खेतु
गाकर साध-संगत को निहाल किया। ज्ञानी रेश्म सिंह जी रुद्दर पुर वालों ने बाबा बन्दा सिंह बहादुर जी के जीवन पर प्रकाश डालते हुए बताया कि सिख इतिहास की महान शख्शियत जिसको सिख जगत में सिखों का पहला बादशाह के नाम से याद किया जाता है।
बाबा बन्दा सिंह बहादुर जी का जन्म 27 अक्टूबर 1670 को कश्मीर के जिला पुछँ के शहर रजौड़ी में हुआ था। आपके पिता जी का नाम रामदेव जी बचपन से ही शिकार खेलने की लग्न लग गई क्योंकि जंगली इलाके में शिकारी स्वभाव होना जरुरी है नही तो आप शिकार हो जाओगे। एक दिन आप से एक गर्भवती हिरनी का शिकार हो गया आंखों के सामने हिरनी और बच्चे ने दम तोड़ दिया आप का दिल टूट गिया आपने कमान तोड़ दी तीर फेंक दिये शिकारी वेषभूषा उतार दी और घर बाहर त्याग कर बैरागी बन गये।
उन्होंने मैदानी इलाके का भ्रमण किया और जानकीदास साधु के चेले बन गये। इस साधु ने आप का नाम माधोदास रख दिया। बैरागियों के साथ अलग-अलग स्थानों की यात्रा के कुछ समय बाद आप का मिलाप गुरु गोबिन्द सिंह जी से हुआ गुरु जी के एक सवाल पूछने पर माधोदास ने बड़े चाव एवं सत्कार से कहा हजूर मै तो आपका बन्दा (सेवक) हूँ गुरु जी ने उन्हें अमृतपान कराकर बन्दा सिंह बनाकर “बहादुर“ का खिताब दिया और पंजाब भेजने से पहले मौजूदा हकूमत से टक्कर लेने से पहले पूर्ण रुप से तैयार कर लिया और उन्हे एक नगाड़ा ,झन्डा और अपने पास से तीर दिए बाबा बन्दा सिंह बहादुर ने पंजाब में मौजूदा हाक्मों को पराजित कर खालसा राज स्थापित किया।
सन 1710 ई0 को सरहंद पर हमला करके छोटे साहिबजादों के कातिलों का मौत के घाट उतार कर लगभग 6 साल तक पंजाब की धरती पर बाबा बन्दा सिंह बहादुर ने राज किया। दीवान की समाप्ति के उपरान्त लखनऊ गुरूद्वारा प्रबन्धक कमेटी के अध्यक्ष राजेन्द्र सिंह बग्गा जी द्वारा साध संगत को बन्दा सिंह बहादुर सिंह जी के जीवन की संक्षिप्त इतिहास पुस्तिका निशुल्क वितरित की।