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जनता का हित राज्य और सरकार के ऊपर बाध्यकारी

आज राज्य एक निर्विवाद रूप से सारे संगठनों में सर्वोच्च संगठन है, इसके अधिकार सम्पन्नता को देखकर कई विद्वानों ने तो इसे संगठनों का संगठन तक कह डाला है और ये अतिशयोक्तिपूर्ण भी नहीं लगता।

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Prashant Srivastava

Jan 11, 2017

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प्रो. कविराज, राजनीति शास्त्र विभाग, लखनऊ यूनिवर्सिटी, लखनऊ
: आज राज्य एक निर्विवाद रूप से सारे संगठनों में सर्वोच्च संगठन है, इसके अधिकार सम्पन्नता को देखकर कई विद्वानों ने तो इसे संगठनों का संगठन तक कह डाला है और ये अतिशयोक्तिपूर्ण भी नहीं लगता। अपने बनने के समय से ही राज्य और सरकार ने अपने शक्तियों में अतुलनीय वृद्धि कर ली है और शक्तियों की भूख अभी भी जारी है l आखिर राज्य के इतने शक्तिशाली होने के पीछे कारण क्या है ? और राज्य के इस शक्ति को कोई चुनौती क्यों नहीं देता ? दरअसल राज्य की यह उन्मुक्ति उसके सृजन के कारणों में ही निहित है l राज्य जैसी शक्तिशाली संस्था का धीरे-धीरे विकास हुआ है या की एक दिन अचानक ही इसका निर्माण हुआ है वैसे ही जैसे हम अपनी जरूरत की चीजें बनाते है, रहने के लिए घर चलने के लिए सायकिल इत्यादि, राजनीति शास्त्र के बहुत से विद्वान् राज्य के विकासवादी और बहुत से विद्वान् राज्य के निर्माण की तरफदारी करते हैं लेकिन राज्य के उद्देश्यों के प्रति दोनों दृष्टीकोण के समर्थकों की राय एक है और वह है राज्य के अंदर रहने वाले या राज्य को बनाने वाले नागरिकों के जीवन की बेहतरी और सतत बेहतरी l


जनहित के आधार पर काम करने वाली संस्था का उद्देश्यपूर्ण ढंग से निर्माण भी किया गया होगा इसलिए मै भी राज्य के सृजन के निर्माणवादी प्रक्रिया का समर्थन करता हूँ इस विचार के साथ की राज्य का जन्म विधिवत एक ऐसी घटना के साथ शुरू हुआ होगा जो एक दिन एक निश्चित उद्देश्य के लिए आहूत की गयी होगी या फिर एक दिन कोई शक्तिशाली, निर्भीक, और चालाक मनुष्य ने कमजोर लोंगों को अपने पीछे –पीछे आने और अपनी बात मानने के शर्त पर उनके देखभाल करने की जिम्मेदारी अपने ऊपर ली होगी और उसी दिन से जनता और सरकार का और जहां वो बस गये होगे वहां राज्य का सृजन हुआ होगा l मनुष्य एक ही साथ राज्य और समाज दोनों से एक साथ जुड़ा हुआ है l यह भी सत्य है की राज्य का अस्तित्व समाज के बाद और समाज से ही है, समाज राज्य की तुलना में अधिक प्राचीन है और इसका सृजन विकासवादी प्रक्रिया से ही हुआ है लेकिन समाज के पास कोई विशेष अधिकार नहीं है वहीं राज्य के पास आधुनिक दुनियां में निर्विवाद और महत्वपूर्ण अधिकार है l


सवाल ये है कि राज्य को इतनी शक्ति क्यों मिली है ?और इसकी वैधता क्या है ?राजनीति के पिता कहे जाने वाले अरस्तू के अनुसार राज्य का विकास और तमाम अनुबंधवादी विचारकों के मत में राज्य का सृजन अपने नागरिकों के बेहतरी के लिए हुआ है और इसके लिए राज्य एक साधन की भूमिका निभाता है l जनता के हित के लिए विकासवादी और निर्माणवादी दोनों राज्य को एक साधन के रूप में लेते है लेकिन यहाँ अनुबंधवादी राज्य के रोल को साधन के रूप में बेहतरीन ढंग से प्रस्तुत करते हैं l उनका तर्क है की राज्य और जनता में इसी बात को लेकर करार था की राज्य जनहित का और जनता राज्य को वैधानिकता प्रदान करने तथा अपने उपर शासन करने का अधिकार प्रदान करेगी। यही वजह है की राज्य नागरिकों के उपर शासन चलाता है।




आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता खुद सरकार बनाती है और सत्ता में अप्रत्यक्ष और प्रत्यक्ष रूप से शामिल होती है l हालांकि प्राचीन यूनानी राजनीतिक चिंतकों ने लोकतांत्रिक पद्धति को सबसे घटिया माना था l जनता राज्य बनाते समय अपने सारे अधिकार और मत राज्य को इसलिए सौंप दिये कि राज्य उनके हित की रक्षा करेगा लेकिन भारत में राज्य और सरकार की स्थिति बिलकुल बदल गयी है कमोवेश यही स्थिति पूरे दुनिया में हो गयी है जिसमे जनता समय –समय पर अपने अधिकार और मत तो राज्य को सौंप देते है लेकिन राज्य उनके प्रति हुए समझौते पर अमल नहीं कर रहा है।


जनता से अधिकार मिलते ही समाज मोटी-मोटा दो वर्ग में विभाजित हो जा रहा है एक शासक जो सारी आधुनिक सुख सुविधाओं से भरपूर और दूसरा शासित वर्ग जो मूलभूत सुविधाओं से वंचित है l मूलभूत सुविधा देशों की अर्थ व्यवस्था के आधार पर निर्धारित होती है लेकिन रोटी कपड़ा और मकान सारे देशों में स्वीकार्य है l आज़ादी के 70 साल बाद भी भारत में लगभग 80% अवादी अपने रोजमर्रा की जरूरत से भी महफूज है गरीब मजदूरों को जाड़े और वरसात में भी सर छिपाने के लिए घर तक नहीं है, शहरों में तो स्थिति और भी ख़राब है हजारों लोग भीख माँगते है ,सड़क पर ही सो जाते है सरकारें तरस खा के रेन बसेरा बनवा देती है हजारों लाखों नौनिहाल कुपोषित है जो बच गये वो सड़को पर है उन्हें पढ़ने लिखने की कोई ब्यवस्था तक नहीं पूरा भविष्य सड़कों पर आखिर हम अस्सी फिसद जनता के साथ क्या कर रहें हैं ? लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपरिहार्य सिद्ध करने के लिए समय-समय पर समारोह पूर्वक चुनाव की रस्मअदायगी की जाती है ताकि जनता में इस विश्वास का आभास हो की सरकार उसी की है और वो भी सरकार में बराबर शामिल है, ऐसे देशकी जनता भला सरकार में भागीदारी और बराबरी का एहसास भला कैसे कर सकती है जो सदियों से सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से न सिर्फ विभाजित है बल्कि उंच नीच के दंश से पीड़ित है l


आर्थिक सुदृढ़ता अगर समाज के सारे लोंगो के पास होती तो जातीय ऊच नीच की सोच कुछ कम होती या इतना तीब्र न रहती और रजनीतिक सत्ता तक पहुँच भी ज्यादातर लोंगो की हो जाती लेकिन आर्थिक विषमता की खाई इतनी बढ़ गयी है की अमीर और अमीर और गरीब और गरीब होता जा रहा है हालात ये हो गएँ हैं कि देश के 67% संशाधनों पर भारत के केवल 873 परिवारों का आधिपत्य है या ये कहिये कि कब्ज़ा है बाकी लगभग सवा अरब लोगों के पास केवल 33% संसाधन ही जीवन यापन के लिए बचा है l


हरबर्ट स्पेंसर ने राज्य को स्टॉक एक्सचेंज कहा है जिस तरह से कोई ब्यक्ति अगर स्टॉक एक्सचेंज में अपना शेयर लगाता है तो उसी अनुपात में उसे लाभ होता है आज राज्य की यही स्थिति हो गयी है जिसमे करोड़पतियों की सहभागिता है और वही सरकार के हर अंगों पर कब्ज़ा किये बैठे हैं मंत्रिमंडल में, लोकसभा में, राज्यसभा में ,राज्यों की विधान सभाओं में कही भी गरीब और सामान्य जनता का प्रतिनिधित्वा रंच मात्र भी नहीं दिखता और होगा भी कैसे श्रम बेचकर जीवन यापन करने वाले, सदियों से पशुओं जैसी मेहनत कर वैसे ही जिंदगी बिताने वाले, राजनेताओं के रजनीतिक सभाओं में दिहाड़ी पर जाने वाले, फिर भी बद से बदतर जिंदगी जीने वाली जनता इतना पैसा कहाँ से ले आएगी जिससे वह भी स्टॉक एक्सचेंज में अपना चुनावी शेयर लगा सके और लाभ ले सके पर ये संभव कहाँ ? आधुनिक राजनीतिक वेत्ता माइकल फुकोहामा ने अपनी एक रचना ‘ऐंड ऑव दी हिस्ट्री’ में आज की लोकतांत्रिक व्यवस्था को सबसे मुफीद व्यवस्था मानते हुए दूसरी समाजवादी व्यवस्थाओं को जो गरीबों के समानता की बात करती है, के अंत की घोसणा कर दी l लेकिन मुझे नहीं लगता की दुनियाँ में इतने गरीबों एवं निर्धनों की संख्या बढ़ाने वाली लोकतांत्रिक राज्य व्यवस्था को ही अंतिम मन लिया जाये और मानव समानता और उनके बेहतरी के लिये उपलब्ध विकल्पों का बिना परिक्षण किये अंत की घोषणा कर दी जाए l

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इस प्रकार के सिर्फ समारोह पूर्ण चुनावी सभा के मुकाबले हमें किसी अधिक वास्तविक सहभागिता सुनिश्चित करने वाली व्यवस्था की खोज करनी आवश्यक है क्योंकि इस व्यवस्था में तो जनसहभागिता के नाम पर सिर्फ गरीब जनों को चिलचिलाती धूप में पंक्ति में खड़े होकर अपने तथाकथित प्रतिनिधियों को चुनना ही राजनीतिक सहभागिता मन लिया जाता है l दुनियां में उपस्थिति सारे लौकिक सुखों को पांच सितारा होटल में बैठकर आनंद लेने की स्वीकृति, बड़े स्तर के रजनीतिक और आर्थिक भ्रस्टाचार, भाई –भतीजावाद, क्रोनि कैपिटलिज्म और तमाम ऐसे ही घिनौने कृत्यों को करने का लाइसेंस मिल जाता है। मुझे नहीं लगता की ऐसा दुर्भाग्यपूर्ण, अमीरी गरीबी की चौड़ी खाई को और अधिक चौड़ी करने वाली व्यवस्था ही उचित है, समय रहते ही इस व्यवस्था का विकल्प तलाशने की जरूरत है जिससे जनता ने जिन उद्देश्यों की पूर्ति के निमित्त राज्य का निर्माण किया था वो संभव हो सके।

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(लेखक लखनऊ यूनिवर्सिटी में कार्यत हैं, यह उनके निजी विचार हैं)

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