हरबर्ट स्पेंसर ने राज्य को स्टॉक एक्सचेंज कहा है जिस तरह से कोई ब्यक्ति अगर स्टॉक एक्सचेंज में अपना शेयर लगाता है तो उसी अनुपात में उसे लाभ होता है आज राज्य की यही स्थिति हो गयी है जिसमे करोड़पतियों की सहभागिता है और वही सरकार के हर अंगों पर कब्ज़ा किये बैठे हैं मंत्रिमंडल में, लोकसभा में, राज्यसभा में ,राज्यों की विधान सभाओं में कही भी गरीब और सामान्य जनता का प्रतिनिधित्वा रंच मात्र भी नहीं दिखता और होगा भी कैसे श्रम बेचकर जीवन यापन करने वाले, सदियों से पशुओं जैसी मेहनत कर वैसे ही जिंदगी बिताने वाले, राजनेताओं के रजनीतिक सभाओं में दिहाड़ी पर जाने वाले, फिर भी बद से बदतर जिंदगी जीने वाली जनता इतना पैसा कहाँ से ले आएगी जिससे वह भी स्टॉक एक्सचेंज में अपना चुनावी शेयर लगा सके और लाभ ले सके पर ये संभव कहाँ ? आधुनिक राजनीतिक वेत्ता माइकल फुकोहामा ने अपनी एक रचना ‘ऐंड ऑव दी हिस्ट्री’ में आज की लोकतांत्रिक व्यवस्था को सबसे मुफीद व्यवस्था मानते हुए दूसरी समाजवादी व्यवस्थाओं को जो गरीबों के समानता की बात करती है, के अंत की घोसणा कर दी l लेकिन मुझे नहीं लगता की दुनियाँ में इतने गरीबों एवं निर्धनों की संख्या बढ़ाने वाली लोकतांत्रिक राज्य व्यवस्था को ही अंतिम मन लिया जाये और मानव समानता और उनके बेहतरी के लिये उपलब्ध विकल्पों का बिना परिक्षण किये अंत की घोषणा कर दी जाए l